वैवाहिक रिश्ता भरोसे, साथ और सुरक्षा पर टिका होता है। जब कोई पति अचानक अपनी पत्नी को घर से बाहर निकाल देता है, तो यह सिर्फ रिश्ते को नहीं तोड़ता, बल्कि एक गंभीर कानूनी स्थिति भी पैदा करता है। यह केवल घर खोना नहीं होता बल्कि यह सुरक्षा, सम्मान और पहचान खोने जैसा होता है। उसके पास न पैसे होते हैं, न कपड़े, न बच्चे की व्यवस्था और न ही कोई सुरक्षित ठिकाना।
सबसे आम डर होता है – “अब मैं कहाँ जाऊँ?” “अगर वापस गई तो मुझे मारा जाएगा?” “क्या पुलिस मेरी मदद करेगी?”
उस समय बहुत-सी महिलाओं को यह पता नहीं होता कि कानून इसे निजी पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि उनके अधिकारों का उल्लंघन मानता है। भारत में पत्नी को अपने वैवाहिक घर में रहने का कानूनी अधिकार होता है, चाहे वह घर पति के नाम पर हो, किराये का हो या ससुराल वालों का। अक्सर महिलाएँ डर, शर्म और समाज की वजह से चुप रह जाती हैं। लेकिन यही चुप्पी उन्हें और कमज़ोर बना देती है। देरी करने से सबूत खत्म हो जाते हैं और पति अपने पक्ष में झूठी कहानी बना लेता है।
इस ब्लॉग का उद्देश्य यह है कि हर महिला यह जान सके कि घर से निकाले जाने के बाद उसके पास तुरंत, मज़बूत और प्रभावी कानूनी अधिकार हैं। कानून आपके साथ है- बस सही कदम सही समय पर उठाने की ज़रूरत है।
क्या पति आपको घर से ज़बरदस्ती निकाल सकता है?
अगर पति आपको घर से बाहर निकाल देता है, तो यह सिर्फ घरेलू झगड़ा नहीं बल्कि कानून के खिलाफ है। पति को यह अधिकार नहीं है कि वह:
- आपको घर से बाहर निकल दे,
- आपके कपड़े बाहर फेंक दे,
- घर के ताले बदल दे,
- आपको धमकाकर घर छोड़ने को कहे, या
- ज़बरदस्ती या मारपीट करके बाहर निकाले।
भले ही घर पति के नाम पर हो या ससुराल वालों के नाम पर, फिर भी आपको वहाँ रहने का कानूनी हक़ है।
पत्नी को अपने वैवाहिक घर में रहने का कानूनी अधिकार है?
डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 की धारा 17 के तहत हर शादीशुदा महिला को अपने वैवाहिक घर में रहने का अधिकार होता है। इसका मतलब है आपको अपने शेयर्ड हाउसहोल्ड से निकाला नहीं जा सकता।
शेयर्ड हाउसहोल्ड वह घर होता है जहाँ आप शादी के बाद अपने पति के साथ पत्नी के रूप में रहती थीं, चाहे वह घर पति के नाम पर हो, सास-ससुर के नाम पर हो, किराये का हो या कोई और जगह हो; इसलिए आपका पति यह कहकर आपको नहीं निकाल सकता कि यह उसका या उसके माता-पिता का घर है।
आपात स्थिति में पहले 24 घंटे में आपकी सुरक्षा के लिए क्या करें?
अगर पति या ससुराल वालों ने आपको अचानक घर से निकाल दिया है, तो पहले 24 घंटे आपके केस और आपकी सुरक्षा दोनों के लिए बहुत अहम होते हैं। इन घंटों में उठाए गए सही कदम आगे कोर्ट में आपकी बहुत मदद कर सकते हैं।
- सुरक्षित जगह पर जाएँ: सबसे पहले अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें। माँ-बाप, भाई-बहन, किसी करीबी दोस्त, रिश्तेदार या महिला शेल्टर होम में जाएँ। ऐसी जगह चुनें जहाँ आप बिना डर के रह सकें और कोई आपको नुकसान न पहुँचा सके।
- किसी भरोसेमंद व्यक्ति को तुरंत बताएं: जो हुआ है, उसे अकेले न झेलें। अपने परिवार, रिश्तेदार या किसी विश्वसनीय व्यक्ति को फोन करके पूरी बात बताएं। इससे आपके पास गवाह भी होंगे और मानसिक सहारा भी मिलेगा।
- सबूत इकट्ठा करें: जो कुछ भी हुआ है, उसके सबूत संभालकर रखें – चोटों की फोटो, टूटे हुए सामान की तस्वीरें, व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग, ऑडियो या वीडियो और अगर इलाज कराया है तो मेडिकल रिपोर्ट। ये सब आगे कोर्ट और पुलिस में बहुत काम आएंगे।
- महिला हेल्पलाइन या पुलिस से संपर्क करें: 181 (महिला हेल्पलाइन) या 112 पर कॉल करें और बताएं कि आपको घर से निकाल दिया गया है। वे आपकी शिकायत दर्ज कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस या सुरक्षा भी भेज सकते हैं।
- पूरी घटना लिखकर रखें: अगर संभव हो तो किस दिन, किस समय, किसने क्या कहा या किया – सब कुछ एक डायरी या कागज़ पर लिख लें। यह आपकी याददाश्त ताज़ा रखेगा और बाद में शिकायत या केस दर्ज करते समय बहुत मदद करेगा।
डोमेस्टिक वॉयलेंट की कंप्लेंट कैसे फाइल करें?
अगर पति या ससुराल द्वारा आपको घर से निकाल दिया गया है या आप पर हिंसा हो रही है, तो डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 की धारा 12 के तहत आप मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज करा सकती हैं। इस शिकायत के ज़रिए आप निम्न सुरक्षा और राहत मांग सकती हैं:
प्रोटेक्शन ऑर्डर (धारा 18): कोर्ट पति या किसी भी हिंसक व्यक्ति को आदेश दे सकती है कि वह आपको धमकाए, डराए या शारीरिक नुकसान न पहुँचाए। इसका मतलब है कि आपके खिलाफ कोई हिंसक व्यवहार नहीं किया जा सकता।
रेसिडेंस ऑर्डर (धारा 19): कोर्ट यह आदेश दे सकती है कि आपको घर में वापस आने की अनुमति हो। चाहे घर पति का हो, ससुराल का हो या किराए का, बिना कोर्ट के आदेश आपको बाहर नहीं निकाला जा सकता।
मेंटेनेंस (धारा 20): आप अपने रोज़मर्रा के खर्च, भोजन, कपड़े और बच्चों के खर्च के लिए कोर्ट से मेंटेनेंस की मांग कर सकती हैं। कोर्ट पति को यह खर्च देने का आदेश दे सकती है।
मुआवज़ा (धारा 22): अगर आप पर किसी तरह की शारीरिक या मानसिक हिंसा का प्रभाव पड़ा है, तो कोर्ट मुआवज़ा भी निर्धारित कर सकती है।
महत्वपूर्ण: इस प्रक्रिया में आपको अपने सारे सबूत इकट्ठा करने होंगे – चोट के फोटो, टूटे सामान, व्हाट्सएप चैट, मेडिकल रिपोर्ट आदि। यह कोर्ट में आपकी शिकायत को मजबूत बनाएगा।
पुलिस में शिकायत कब और कैसे करें?
अगर आपके साथ मारपीट हुई है, धमकी दी गई है, या आपको जबरन घर से बाहर निकाला गया है, तो तुरंत पुलिस में शिकायत करना ज़रूरी है। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की विभिन्न धाराएँ लग सकती हैं, जैसे:
- धारा 85 – पति या उसके परिवार द्वारा पत्नी को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना देना।
- धारा 115 – किसी को जानबूझकर चोट पहुँचाना।
- धारा 351 – धमकी देना या डराना।
अगर स्थानीय पुलिस शिकायत नहीं सुनती या कार्रवाई नहीं करती, तो आप:
- महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराएँ।
- SP (सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस) या DCP (डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस) से संपर्क करें।
- या संबंधित कोर्ट में पिटीशन दायर करें।
पुलिस में शिकायत करना केवल पहला कदम है। इसका उद्देश्य आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और कानूनी कार्रवाई की राह खोलना है।
अगर पत्नी के साथ बच्चों को भी निकल दिया जाए?
यदि पति या ससुराल महिला को उसके बच्चों के साथ घर से निकालते हैं, तो कानून और कोर्ट सख्ती से महिला के पक्ष में निर्णय लेती है। आम तौर पर बच्चों की फिजिकल कस्टडी मां के पास ही रखी जाती है, ताकि बच्चे देखभाल और सुरक्षा में रहें।
इसके अलावा, पढ़ाई, मेडिकल खर्च, स्कूल फीस, कपड़े, खाना और अन्य जरूरी खर्च पिता को देने पड़ते हैं। यह मेंटेनेंस /चाइल्ड सपोर्ट के रूप में दिया जाता है, ताकि बच्चे की दिनचर्या और जीवनस्तर प्रभावित न हो।
कोर्ट का उद्देश्य केवल महिला को ही सुरक्षा देना नहीं है, बल्कि बच्चों के भावनात्मक और शैक्षणिक कल्याण को भी सुनिश्चित करना है। पिता को अदालत द्वारा दिए गए आदेश का पालन करना अनिवार्य होता है, और यदि वह खर्च नहीं देता, तो कोर्ट के जरिए कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
सुरक्षा मिलने में कितना समय लगता है?
अगर आपातकालीन सुरक्षा की मांग की जाती है, तो कोर्ट आमतौर पर 2–7 दिन में आदेश दे सकती है। समय कोर्ट की व्यस्तता और मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। कानून यह समझता है कि जब महिला अचानक घर से बाहर हो जाए और असुरक्षित हो, तो तुरंत सुरक्षा की ज़रूरत होती है।
इससे साबित होता है कि भारतीय कानून और न्यायालय इस तरह की आपात स्थिति को गंभीरता से लेते हैं और महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने में कोई देरी नहीं होने देते।
रेसिडेंस और प्रोटेक्शन के अधिकार पर पर महत्वपूर्ण फैसले
एस.आर. बत्रा बनाम तरूणा बत्रा (2007) – सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी को शेयर हाउसहोल्ड में रहने का अधिकार है। यह अधिकार संपत्ति का अधिकार नहीं, बल्कि कानून द्वारा दिया गया सुरक्षा अधिकार है। इसका मतलब, पत्नी को बिना किसी संपत्ति के भी निकाला नहीं जा सकता।
सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2020) – सुप्रीम कोर्ट
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एस.आर. बत्रा वाले फैसले की सीमा को बढ़ाया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी ससुराल या पति के माता-पिता के घर में भी रह सकती है, अगर वह शादी के समय वहाँ पति के साथ रहती थी। यह महिलाओं को जबरन निकाले जाने से और अधिक सुरक्षा देता है।
प्रभाकर भट्ट बनाम अन्नू लांबा (2025) – दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी का शेयर हाउसहोल्ड में रहने का अधिकार तब भी कायम रहता है जब घरेलू हिंसा का सबूत न हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर का मालिक कौन है या हिंसा न होना इस अधिकार को रोक नहीं सकता। पत्नी को रहने, सुरक्षा, मेंटेनेंस और अन्य कानूनी राहत का दावा करने का अधिकार है। यह अधिकार संपत्ति के हक़ या वैवाहिक विवाद से स्वतंत्र है।
दिल्ली हाई कोर्ट के हाल ही के निर्णय (2025)
इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद शुरू हुआ निवास ही शेयर हाउसहोल्ड बनाता है, चाहे पति बाद में अपने माता-पिता से अलग क्यों न हो जाए। ससुराल वालों द्वारा निकाले जाने की अनुमति नहीं दी गई।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि तलाक के बाद घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत रहने का अधिकार खत्म हो जाता है, क्योंकि अब “घरेलू संबंध” समाप्त हो गया है। केवल तभी अधिकार बचता है जब कोई अन्य कानूनी आधार मौजूद हो।
निष्कर्ष
जब किसी महिला को उसके ससुराल या वैवाहिक घर से बाहर निकाल दिया जाता है, तो सिर्फ एक दरवाज़ा बंद नहीं होता – उसकी सुरक्षा, इज़्ज़त और ज़िंदगी की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाती है। ऐसे समय में कानून उसकी ढाल बनकर खड़ा होता है। कानून यह नहीं देखता कि घर किसके नाम है, बल्कि यह देखता है कि क्या किसी महिला को उसके हक़ के घर से गलत तरीके से निकाला गया है।
कानूनी उपाय सिर्फ झगड़ा सुलझाने के लिए नहीं होते, बल्कि महिला को संभलने का समय देते हैं। ताकि वह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सके और बिना डर के आगे का फैसला ले सके। रहने का हक, आर्थिक मदद और सुरक्षा कोई एहसान नहीं, बल्कि उसका कानूनी अधिकार है।
कानून का साफ संदेश है – कोई भी महिला सिर्फ रिश्तों के बिगड़ने की वजह से बेघर नहीं की जा सकती। शादी में समस्या आने का मतलब यह नहीं कि उसकी आवाज़ या उसका घर छिन जाए। सही जानकारी और कानून की मदद से वह इस मुश्किल समय को ताकत में बदल सकती है, और फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है।
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FAQs
1. क्या अगर घर ससुराल वालों के नाम पर है तब भी पत्नी रहने का हक़ मांग सकती है?
हाँ। घरेलू हिंसा अधिनियम के अनुसार, शादीशुदा महिला को अपने शेयर हाउसहोल्ड में रहने का अधिकार होता है, चाहे घर पति के नाम हो या ससुर-सास के नाम।
2. घर से निकाले जाने के बाद महिला को कौन-कौन से काग़ज़ संभालकर रखने चाहिए?
शादी का सबूत, आधार या पहचान पत्र, पुराने घर का पता, व्हाट्सएप मैसेज या धमकी के सबूत, अगर मारपीट हुई हो तो मेडिकल रिपोर्ट, और जिस घर में रहती थी उसकी जानकारी।
3. क्या पुलिस महिला को वापस घर दिलाने में मदद कर सकती है?
हाँ। घरेलू हिंसा की शिकायत या कोर्ट के सुरक्षा आदेश के साथ पुलिस महिला को सुरक्षित तरीके से घर में वापस दिला सकती है या पति को परेशान करने से रोक सकती है।
4. कोर्ट से सुरक्षा या घर में रहने का आदेश कितनी जल्दी मिल सकता है?
अगर महिला बेघर है या खतरे में है, तो कोर्ट कुछ ही दिनों में इंटरिम (तुरंत) आदेश दे सकती है।
5. अगर महिला अलग रह रही है तो क्या वह खर्च मांग सकती है?
हाँ। वह मेंटेनेंस, किराए का पैसा और अन्य खर्च पति से मांग सकती है, चाहे वह पति के घर में रह रही हो या नहीं।



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