लिव-इन पार्टनर ने धोखा दे दिया – जानिए कानूनी सुरक्षा कैसे मिलेगी?

Live-in partner cheated on you

भारत में सुप्रीम कोर्ट समेत कई अदालतों ने साफ कहा है कि दो बालिग (18 साल से ऊपर) लोग अगर अपनी मर्जी से साथ रहते हैं, तो वह लिव-इन रिलेशनशिप पूरी तरह कानूनी है।

लिव-इन रिलेशनशिप में दो लोग बिना शादी के पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं। इसमें भावनात्मक जुड़ाव, आर्थिक साझेदारी और सामाजिक पहचान सब कुछ जुड़ा होता है। जब ऐसा रिश्ता अचानक टूट जाता है या पार्टनर धोखा देकर किसी और से शादी कर लेता है, तो पीड़ित व्यक्ति केवल भावनात्मक ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी टूट जाता है।

सबसे बड़ा डर यही होता है – “मैं तो शादीशुदा नहीं हूँ, क्या मेरे पास कोई कानूनी अधिकार हैं?”

कई लोग सोचते हैं कि कानून केवल शादीशुदा पत्नी या पति को ही सुरक्षा देता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को भी कुछ महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण मिलता है। इस ब्लॉग का उद्देश्य यही है कि आप भ्रम और डर से बाहर निकलकर अपने अधिकार समझ सकें।

क्या आप को कानूनी सलाह की जरूरत है ?

लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता कब और कैसे मिली?

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को किसी एक दिन या किसी एक कानून से “कानूनी” नहीं बनाया गया। इसे धीरे-धीरे अदालतों के फैसलों और कानूनों के ज़रिये मान्यता मिली, खासकर साल 2005 के बाद।

सबसे बड़ा बदलाव डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 से आया। इस कानून ने पहली बार ऐसे रिश्तों को माना जो “शादी जैसे रिश्ते” हों।

एस. खुशबू बनाम कन्निअम्मल (2010)

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो बालिग लोग अगर अपनी मर्जी से बिना शादी के साथ रहते हैं, तो यह भारत में पूरी तरह कानूनी है।
  • कोर्ट ने माना कि बिना शादी साथ रहना व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है।
  • कोर्ट ने साफ किया कि समाज जिसे गलत मानता है, वह जरूरी नहीं कि कानून के हिसाब से भी गलत हो।
  • सिर्फ साथ रहने की वजह से किसी पर कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
  • इस फैसले ने लंबे समय से साथ रह रहे लोगों, खासकर महिलाओं को, मजबूत कानूनी सुरक्षा दी।

समय के साथ अदालतों ने यह भी कहा कि जो लाइव-इन रिश्ता लंबे समय का हो, स्थिर हो और पति-पत्नी जैसा हो, उसे कानून शादी जैसा ही संरक्षण देगा। कई मामलों में महिलाओं को मेंटेनेंस मिला है और ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को भी प्रॉपर्टी के अधिकार दिए गए हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सिर्फ शादी न होने के कारण कोई भी असली रिश्ते में रहने वाला व्यक्ति असुरक्षित न रह जाए।

क्या लिव-इन पार्टनर को धोखा देना कानूनी अपराध है?

लिव-इन रिलेशनशिप में हुआ हर धोखा अपने-आप में अपराध नहीं होता, लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में यह गंभीर कानूनी अपराध बन सकता है।

  • अगर कोई व्यक्ति शादी का झूठा वादा करके किसी को भावनात्मक रूप से फँसाता है और उसी भरोसे पर शारीरिक संबंध बनाता है, तो यह केवल नैतिक गलत नहीं बल्कि भारतीय न्याय संहिता के तहत यौन शोषण और धोखाधड़ी माना जा सकता है।
  • इसी तरह, अगर लिव-इन पार्टनर पैसे, प्रॉपर्टी या बिज़नेस के नाम पर धोखा देता है, जैसे इन्वेस्टमेंट के नाम पर पैसा लेकर भाग जाना, तो यह चीटिंग और क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट बन जाता है।
  • अगर किसी को धमकी, दबाव या डर में रखकर संबंध बनाए गए हों, तो वह जबरदस्ती और यौन अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
  • सबसे गंभीर स्थिति तब होती है जब कोई व्यक्ति लिव-इन में रहते हुए किसी और से चुपचाप शादी कर ले और अपने पार्टनर को अंधेरे में रखे। इसे कोर्ट अक्सर विश्वासघात और धोखाधड़ी मानती है, क्योंकि सामने वाले ने जीवन और भविष्य को लेकर निर्णय गलत जानकारी पर लिया होता है।
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अंत में, अदालत हमेशा यह जाँचती है कि रिश्ता दोनों की सहमति से और ईमानदारी से शुरू हुआ था या शुरू से ही किसी को धोखे में रखा गया था। अगर रिश्ता प्यार से शुरू हुआ और बाद में टूट गया, तो वह अपराध नहीं है; लेकिन अगर शुरुआत ही झूठ, चालाकी और छिपे इरादों से हुई थी, तो कानून इसे अपराध मानता है।

धोखा मिलने के बाद तुरंत क्या करें?

धोखा मिलने के बाद आपको घबराने के बजाय शांति से सही कदम उठाने चाहिए:

  • सबसे पहले अपने सारे चैट, मैसेज, फोटो और कॉल रिकॉर्ड सुरक्षित कर लें।
  • अगर पैसों का लेन-देन हुआ है तो उसकी बैंक स्टेटमेंट और ट्रांजैक्शन संभालकर रखें।
  • किसी भरोसेमंद दोस्त या परिवार के सदस्य को पूरी बात बता दें ताकि आप अकेले न रहें।
  • गुस्से या दुख में कोई जल्दबाज़ी वाला फैसला न लें।
  • जितनी जल्दी हो सके किसी अच्छे वकील से सलाह लें, ताकि आगे का सही कानूनी रास्ता तय हो सके।

क्या धोखा मिलने के बाद आप मेंटेनेंस का दावा कर सकते हैं?

हाँ। अगर आप अपने लिव-इन पार्टनर पर आर्थिक रूप से निर्भर थीं, तो कोर्ट उसे आपको हर महीने खर्चा (मेंटेनेंस) देने का आदेश दे सकती है। कोर्ट ने माना है कि लंबे समय तक साथ रहने वाली महिला कोई अजनबी नहीं होती। अगर उसके साथ पत्नी की तरह व्यवहार हुआ है, तो उसे आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

मेंटेनेंस कब तक मिलेगा? मेंटेनेंस तब तक मिल सकता है जब तक:

  • आप खुद कमाने लायक न हो जाएँ, या
  • आपकी दोबारा शादी न हो जाए, या
  • कोर्ट यह न माने कि अब आपको उसकी आर्थिक मदद की जरूरत नहीं है।
  • यानि जब तक आप आत्मनिर्भर नहीं हो जातीं, तब तक कानून आपकी आर्थिक सुरक्षा देता है।
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क्या करें अगर उसने शादी का वादा किया और फिर धोखा दिया?

अगर लिव-इन पार्टनर ने शादी का वादा करके संबंध बनाए और बाद में धोखा दिया या शादी से मुकर गया, तो यह सिर्फ भावनात्मक धोखा नहीं रहता, कई मामलों में यह कानूनी अपराध बन जाता है। ऐसे मामलों में महिला को तीन तरह के मजबूत कानूनी उपाय मिलते हैं:

1. आपराधिक कानून के तहत (Criminal Remedies)

भारतीय न्याय संहिता की धारा 69: अगर यह साबित हो जाए कि:

  • पुरुष ने शादी का झूठा वादा किया
  • उसी वादे के आधार पर महिला ने शारीरिक संबंध बनाए
  • और शुरू से ही उसकी शादी की मंशा नहीं थी

तो इसे “धोखे से प्राप्त सहमति” माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह रेप की श्रेणी में आ सकता है। ऐसा करने पर आरोपी को कम से कम 10 साल तक कि सजा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) के मामले में कहा कि अगर वादा शुरू से ही झूठा था, तो महिला की सहमति वैध नहीं मानी जाएगी।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 – क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट अगर किसी ने आपके पैसे, गहने या संपत्ति लेकर वापस देने से मना कर दिया, तो यह विश्वासघात है और इसके लिए कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होती है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 – चीटिंग अगर शादी का वादा करके किसी ने पैसे लिए, साथ रखा या भावनात्मक-शारीरिक फायदा उठाया, तो यह धोखाधड़ी है और इसके लिए आपराधिक सजा हो सकती है।

2. डोमेस्टिक वायलेंस लॉ

डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी कानूनी सुरक्षा मिलती है।:

  • अगर आपका लिव-इन पार्टनर आपको धोखा देकर छोड़ देता है
  • घर से निकाल देता है
  • पैसों की मदद बंद कर देता है
  • आपको परेशान करता है या धमकाता है

तो आप कोर्ट में जाकर कानूनी उपाए मांग सकती हैं:

  • प्रोटेक्शन आर्डर
  • रेसिडेंस आर्डर
  • मेंटेनेंस
  • कंपनसेशन

इन अधिकारों के लिए शादी होना जरूरी नहीं है। कानून लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला की भी उतनी ही सुरक्षा करता है।

3. सिविल कानून के तहत (Civil Remedies)

आप धोखे और भावनात्मक नुकसान के लिए डेमेजिस का केस कर सकती हैं। यह टॉर्ट लॉ और स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट कि धारा 39 के तहत किया जा सकता है।

अगर आपकी ज़िंदगी खराब हुई, शादी के मौके चले गए या मानसिक आघात हुआ तो कोर्ट मुआवज़ा दिला सकती है।

क्या आप पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकते हैं?

हाँ, आप पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवा सकते हैं अगर आपके लिव-इन पार्टनर ने आपको धोखा दिया या परेशान किया। इसके लिए आप निम्न शिकायतें कर सकते हैं:

  • धोखाधड़ी – अगर शादी का झूठा वादा किया गया या किसी तरह का फायदा उठाया गया।
  • विश्वासघात – अगर पैसे, गहने या संपत्ति लेकर धोखा किया।
  • घरेलू हिंसा – अगर मारपीट, धमकी या मानसिक तनाव दिया।
  • उत्पीड़न/हैरेसमेंट – लगातार परेशान करना या धमकाना।
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आपका वकील तय करेगा कि कौन सा कानूनी रास्ता सबसे सही और सुरक्षित है।

क्या होगा अगर लिव-इन रिलेशनशिप से बच्चे पैदा हों?

अगर लिव-इन रिलेशनशिप से बच्चे पैदा होते हैं, तो वे कानूनी रूप से वैध हैं। उनके अधिकार हैं:

  • पिता का नाम: बच्चे को पिता का नाम मिलने का अधिकार है।
  • मेंटेनेंस: पिता से बच्चों की देखभाल और खर्च के लिए पैसा माँगा जा सकता है।
  • विरासत का अधिकार: पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार बच्चे को है।

निष्कर्ष

लिव-इन पार्टनर से धोखा मिलना सिर्फ व्यक्तिगत चोट नहीं, बल्कि कानूनी सवाल भी है। भारतीय कानून यह नहीं मानता कि शादी न होने पर आप असहाय हैं। जब कोई आपके साथ जीवन बांटता है, घर साझा करता है और फिर विश्वास तोड़कर चला जाता है, तो कानून आपके सम्मान, सुरक्षा और अधिकार को बहाल करता है।

लिव-इन रिलेशनशिप भरोसे, जिम्मेदारी और साझेदारी पर आधारित होती है। जब कोई पार्टनर धोखा देता है या छोड़ देता है, तो आप कानूनी रूप से सुरक्षा, सहारा और न्याय मांग सकते हैं। सही कानूनी सलाह से आप अपने अधिकार सुरक्षित कर सकते हैं और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

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FAQs

1. क्या ब्रेक-अप के बाद लिव-इन पार्टनर को प्रॉपर्टी में हिस्सा मिल सकता है?

हाँ। अगर रिश्ता लंबे समय का था और आपने पैसे लगाए या आर्थिक रूप से निर्भर थे, तो कोर्ट मुआवज़ा या हिस्सा देने का आदेश दे सकती है।

2. क्या बिना बताए साझा घर से निकाला जा सकता है?

नहीं। जहाँ आप दोनों साथ रहते थे, वहाँ से आपको अचानक नहीं निकाला जा सकता। इसके खिलाफ आप कोर्ट से सुरक्षा ले सकते हैं।

3. अगर भावनात्मक या आर्थिक शोषण हुआ हो तो क्या केस कर सकते हैं?

हाँ। धोखा, शोषण या छोड़ देना होने पर आप घरेलू हिंसा कानून और सिविल कानून के तहत मदद ले सकते हैं।

4. क्या लिव-इन पार्टनर एक-दूसरे का सरनेम इस्तेमाल कर सकते हैं?

हाँ, कोई रोक नहीं है। लेकिन इससे अपने-आप शादी या विरासत के अधिकार नहीं मिलते।

5. क्या बिना काग़ज़ के लिव-इन रिश्ता साबित किया जा सकता है?

हाँ। चैट, फोटो, साथ के बिल, गवाह और सोशल मीडिया रिकॉर्ड से कोर्ट में रिश्ता साबित किया जा सकता है।

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