पति के घर छोड़कर चले जाने के बाद सबसे पहला और सबसे गहरा संकट होता है आर्थिक असुरक्षा। अचानक पत्नी के पास न पैसे होते हैं, न कोई स्थायी सहारा। अगर बच्चे हैं, तो चिंता और भी बढ़ जाती है – उनकी पढ़ाई, फीस, खाना, कपड़े, दवा, सब कुछ कैसे चलेगा?
अधिकांश महिलाएँ यह सोचकर चुप रह जाती हैं कि कोर्ट जाना बहुत लंबी प्रक्रिया है और फैसला आने में सालों लगेंगे। कई बार ससुराल या समाज का दबाव भी होता है कि “थोड़ा इंतज़ार कर लो” या “घर की बात बाहर मत ले जाओ।” लेकिन इस इंतज़ार की कीमत पत्नी और बच्चों को अपने जीवन स्तर, आत्मसम्मान और सुरक्षा से चुकानी पड़ती है।
भारतीय क़ानून इस सच्चाई को समझता है। क़ानून यह नहीं मानता कि मेंटेनेंस कोई एहसान है या तलाक के बाद ही मिलेगा। अगर पति पत्नी को छोड़ देता है, तो पत्नी को तुरंत आर्थिक सुरक्षा देने की व्यवस्था क़ानून में है।
इस ब्लॉग का उद्देश्य आपको यह बताना है कि यदि पति छोड़कर चला गया है तो पत्नी तुरंत मेंटेनेंस की मांग कर सकती है, कोर्ट केस के अंतिम फैसले से पहले भी आर्थिक राहत दे सकती है, और इस मामले में देर करना कई बार नुकसानदायक साबित होता है, क्योंकि कानून कभी भी पत्नी को बिना सहारे, बिना खर्च के और भूखा रहने के लिए मजबूर नहीं करता।
पति छोड़कर चला गया – कानून की नज़र में इसका क्या मतलब है?
कानून की भाषा में पति द्वारा पत्नी को छोड़कर चले जाना अक्सर डिज़र्शन की श्रेणी में आता है। इसका मतलब है कि पति बिना उचित कारण, बिना पत्नी की सहमति और बिना उसकी देखभाल की व्यवस्था किए उसे छोड़कर चला गया।
यह जरूरी नहीं कि पति हमेशा के लिए गया हो। अगर वह लंबे समय से संपर्क नहीं कर रहा, खर्च नहीं दे रहा और साथ रहने से इंकार कर रहा है, तो कानून इसे गंभीरता से लेता है।
टेम्पररी सेपरेशन और डिज़र्शन में फर्क है। अगर पति किसी मजबूरी (जैसे नौकरी, इलाज) से अलग है और खर्च दे रहा है, तो स्थिति अलग है। लेकिन अगर वह जिम्मेदारी से भाग रहा है, तो यह कानूनी रूप से गलत है।
यह नैतिक बहस का विषय नहीं है, बल्कि कानूनी दायित्व का प्रश्न है। पति का कर्तव्य है कि वह पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करे।
क्या मेंटेनेंस तुरंत माँगा जा सकता है?
हाँ, बिल्कुल। मेंटेनेंस तुरंत माँगा जा सकता है। पत्नी को मेंटेनेंस के लिए यह साबित करना ज़रूरी नहीं है कि:
- तलाक हो चुका हो
- पहले क्रूरता (मारपीट या उत्पीड़न) साबित की जाए
- कई साल अलग-अलग रहना पड़े
जैसे ही पति पत्नी का खर्च उठाने से मना करता है या लापरवाही करता है, उसी समय पत्नी का मेंटेनेंस माँगने का अधिकार बन जाता है।
कोर्ट यह बात अच्छी तरह समझती है कि ज़िंदगी और गुज़ारा करने के लिए इंतज़ार नहीं किया जा सकता। इसलिए ज़रूरत पड़ते ही पत्नी तुरंत कानूनी मदद लेकर मेंटेनेंस की माँग कर सकती है।
तुरंत मेंटेनेंस किन-किन कानूनों के तहत मिल सकता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (धारा 125 CrPC)
यह सबसे तेज़ और सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला कानून है, जिसके ज़रिए पत्नी तुरंत मेंटेनेंस माँग सकती है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत अगर पत्नी अपने खर्च खुद नहीं उठा पा रही है, तो वह मेंटेनेंस की मांग कर सकती है।
- पति अगर पत्नी का खर्च देने से मना करता है या लापरवाही करता है, तो वही काफी है।
- कोर्ट जल्दी सुनवाई करके अंतरिम मेंटेनेंस (तुरंत मिलने वाली सहायता) का आदेश दे सकती है।
इस कानून की सबसे बड़ी खास बात यह है कि यह किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। इस धारा के तहत मेंटेनेंस का अधिकार हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी महिलाओं को मिलता है।
इस कानून की सबसे बड़ी खास बात यह है कि यह किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। इस धारा के तहत मेंटेनेंस का अधिकार हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी महिलाओं को मिलता है। सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) 2 SCC 556 के फैसले ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC सभी धर्मों और महिलाओं पर लागू होती है, और यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानूनी रूप से विवाहित महिलाएं डिज़र्शन और उपेक्षा के खिलाफ सुरक्षा प्राप्त कर सकें।
यानी, धर्म कोई भी हो, अगर पति पत्नी का खर्च नहीं उठा रहा है, तो पत्नी इस कानून के तहत तुरंत कानूनी मदद ले सकती है।
डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005
यह कानून उन महिलाओं की सुरक्षा के लिए है, जिनके साथ पति द्वारा शारीरिक, मानसिक या आर्थिक अत्याचार किया जाता है:
- अगर पति आपको छोड़कर चला गया है
- आपको घर से निकाल दिया है
- खर्च के लिए पैसे देना बंद कर दिया है
- आपको मानसिक रूप से परेशान या धमका रहा है
तो आप इस कानून के तहत तुरंत अदालत की मदद ले सकती हैं।
इस एक्ट के तहत पत्नी यह मांग कर सकती है:
- मंथली मेंटेनेंस – अपने और बच्चों के खर्च के लिए (धारा 20)
- रहने के लिए घर या किराए का पैसा (धारा 19)
- प्रोटेक्शन ऑर्डर – ताकि पति दोबारा परेशान न कर सके (धारा 18)
- कंपनसेशन – मानसिक और भावनात्मक पीड़ा के लिए (धारा 22)
इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मेंटेनेंस और राहत अक्सर केस की शुरुआत में ही दे दी जाती है, ताकि महिला को तुरंत सहारा मिल सके।
हिन्दू मैरिज एक्ट, 1956 (हिंदू महिलाओं के लिए)
हिंदू महिलाओं को मेंटेनेंस का अधिकार हिन्दू मैरिज एक्ट, 1956 के तहत भी मिलता है।
धारा 24 के तहत:
- अगर पति-पत्नी के बीच कोई भी वैवाहिक मामला कोर्ट में चल रहा है
- और पत्नी के पास अपना खर्च चलाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं
- तो पत्नी अंतरिम मेंटेनेंस (केस के दौरान मिलने वाली राशि) मांग सकती है
इस धारा का उद्देश्य यह है कि केस चलते समय पत्नी को पैसों की वजह से परेशान न होना पड़े।
धारा 25 के तहत:
- कोर्ट पत्नी को स्थायी मेंटेनेंस दे सकती है
- यह मेंटेनेंस एकमुश्त या हर महीने दी जा सकती है
पति के छोड़कर जाने पर तुरंत अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करें?
- अपनी और बच्चों की वर्तमान आर्थिक स्थिति लिखित में तैयार करें: अपने खर्च, बच्चों की जरूरतें और आय-व्यय का पूरा विवरण लिखें ताकि कोर्ट में सटीक स्थिति प्रस्तुत हो।
- पति की आय, नौकरी, बिज़नेस से जुड़े सबूत इकट्ठा करें: सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट, व्यापार दस्तावेज़ इत्यादि जमा करें ताकि मेंटेनेंस की मांग मजबूत बने।
- सुरक्षित आवास की व्यवस्था करें: अस्थायी या स्थायी रूप से सुरक्षित जगह पर रहें, ताकि पति की गैर मौजूदगी में भी सुरक्षा सुनिश्चित हो।
- अनुभवी फैमिली लॉयर से तुरंत सलाह लें: कानूनी विशेषज्ञ की मदद लें, ताकि सही दिशा में कदम उठाएं और जल्द मेंटेनेंस की प्रक्रिया शुरू हो।
- सही कानूनी मंच चुनें: अदालत, महिला हेल्पलाइन या पुलिस/महिला आयोग के माध्यम से अपने केस की सही जगह तय करें।
- देरी न करें: अगर तुरंत कार्रवाई नहीं की, तो पति यह तर्क दे सकता है कि पत्नी पर कोई दबाव या परेशानी नहीं थी।
मेंटेनेंस की राशि कैसे तय होती है?
- पति की वास्तविक आय: कोर्ट पति की सैलरी, बोनस, व्यवसाय और अन्य स्रोतों से मिलने वाली पूरी आय का मूल्यांकन करके मेंटेनेंस तय करती है।
- उसका जीवन-स्तर: पति का वर्तमान जीवन-स्तर और रहन-सहन देख कर यह तय किया जाता है कि पत्नी उसी स्तर पर रह सके।
- पत्नी और बच्चों की ज़रूरतें: कोर्ट ध्यान देती है कि बच्चों की पढ़ाई, भोजन, कपड़े और पत्नी के रोजमर्रा के खर्च पूरे हों।
- स्कूल, किराया, मेडिकल खर्च: बच्चों की शिक्षा, घर का किराया, दवाई और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को ध्यान में रखकर राशि तय होती है।
यदि पति आय छुपाता है या कम दिखाता है, तो कोर्ट अनुमान और सबूत के आधार पर सही मेंटेनेंस तय करती है।
अगर पति कोर्ट के ऑर्डर के बाद भी मेंटेनेंस नहीं देता तो क्या करें?
अगर पति कोर्ट के मेंटेनेंस आदेश का पालन नहीं करता है, तो यह कानून के तहत सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।
- रिकवरी वारंट जारी हो सकता है – कोर्ट पति से पैसे जबरन वसूल सकती है।
- सैलरी अटैच की जा सकती है – पति की तनख्वाह से सीधे मेंटेनेंस की राशि काटी जा सकती है।
- बैंक अकाउंट अटैच किया जा सकता है – उसके बैंक खाते से पैसे निकलवाए जा सकते हैं।
- जेल भेजा जा सकता है – अगर वह फिर भी भुगतान नहीं करता, तो कोर्ट उसे जेल भेज सकती है।
साधारण शब्दों में कहें तो, मेंटेनेंस का आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी है और पति को भुगतान करना ही होगा।
क्या कामकाजी पत्नी भी मेंटेनेंस का दावा कर सकती है?
कामकाजी पत्नी भी मेंटेनेंस का दावा कर सकती है, अगर उसकी आय अपने और बच्चों के खर्च के लिए पर्याप्त नहीं है, पति की आमदनी उससे कहीं अधिक है, और कोर्ट केवल उसकी नौकरी देखकर नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक असंतुलन को ध्यान में रखती है।
चतुर्भुज बनाम सीताबाई (2007)
सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में स्पष्ट किया कि अगर पत्नी अपने पति से अलग रहती है, तो वह मेंटेनेंस का दावा कर सकती है, भले ही उसकी खुद की मासिक आमदनी हो। कोर्ट ने कहा कि अगर उसकी आय अपने और बच्चों के खर्च पूरे करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो वह मेंटेनेंस के हक़दार है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि “अपने आप का खर्च नहीं चला सकती” का मतलब यह नहीं है कि पत्नी पूरी तरह गरीबी में होनी चाहिए। बस इतना होना चाहिए कि उसकी आय पर्याप्त न हो, तब वह कानूनी रूप से मेंटेनेंस मांग सकती है।
अमित कुमार बनाम नवजोत दुबे 2013
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पत्नी को धारा 24, हिन्दू मैरिज एक्ट, 1956 के तहत अंतरिम मेंटेनेंस मिल सकता है, भले ही उसकी खुद की कमाई पति से ज्यादा हो।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी और बच्चों के रोज़मर्रा के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और जीवन की ज़रूरतों के लिए यह जरूरी है। कोर्ट ने यह भी बताया कि पत्नी को वैवाहिक घर जैसा समान जीवन स्तर पाने का अधिकार है।
सरल शब्दों में: कामकाजी पत्नी भी अपने और बच्चों के खर्च और सम्मानजनक जीवन के लिए मेंटेनेंस मांग सकती है, चाहे उसकी खुद की कमाई पति से ज्यादा क्यों न हो।
निष्कर्ष
पति द्वारा छोड़ दिया जाना सिर्फ भावनात्मक चोट नहीं है, बल्कि तुरंत आर्थिक और मानसिक असुरक्षा भी ला सकता है। लेकिन भारतीय कानून यह सुनिश्चित करता है कि पत्नी पर यह बोझ स्थायी न बने। मेंटेनेंस दान नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है, और पति के खर्च न देने पर इसे तुरंत माँगा जा सकता है।
जल्दी कदम उठाना, अपने अधिकार समझना और अनुभवी वकील की मदद लेना मुश्किल समय में स्थिरता और सम्मान सुनिश्चित कर सकता है। कानून उन महिलाओं की रक्षा करता है जो अचानक असहाय हो जाती हैं, और सही समय पर कार्रवाई से आप अपने जीवन का आराम, सुरक्षा और सम्मान वापस पा सकती हैं, बिना लंबे कोर्ट या तलाक की प्रक्रिया का इंतजार किए। आपका सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार तभी से शुरू होता है, जब पति खर्च देना बंद कर देता है, और इसे लागू कराने के सारे कानूनी रास्ते मौजूद हैं।
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FAQs
1. क्या मैं मेंटेनेंस तब भी मांग सकती हूँ जब पहली बार अलग रह रही हूँ?
हाँ। पत्नी को अलग रहने के तुरंत बाद भी मेंटेनेंस का अधिकार है, चाहे वह पति के साथ रहती हो या अलग।
2. क्या मेंटेनेंस के लिए तलाक की पेटिशन दाखिल करना जरूरी है?
नहीं। धारा 144 BNSS या डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट के तहत मेंटेनेंस तलाक से अलग माँगा जा सकता है।
3. क्या मैं मेंटेनेंस तब भी मांग सकती हूँ जब मेरी आमदनी थोड़ी है?
कोर्ट आर्थिक असंतुलन देखकर मेंटेनेंस देती है, भले ही आपकी खुद की आमदनी हो।
4. अंतरिम मेंटेनेंस कितनी जल्दी मिल सकता है?
अंतरिम मेंटेनेंस आमतौर पर आवेदन दाखिल करने के कुछ ही हफ्तों में मिल जाता है, ताकि आधारभूत जरूरतें पूरी हों।
5. अगर पति भुगतान नहीं करता तो मेंटेनेंस आदेश लागू हो सकते हैं?
हाँ। कोर्ट सैलरी, बैंक अकाउंट या संपत्ति अटैच कर सकती है, और जरूरत पड़ने पर पति को भुगतान के लिए मजबूर भी किया जा सकता है।



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