क्या FIR से पहले प्रारंभिक जांच ज़रूरी है? जानिए धारा 194 BNSS क्या कहती है?

BNSS 194 in hindi

जब भी किसी व्यक्ति के साथ अपराध होता है, उसका पहला कदम पुलिस के पास जाना होता है। लेकिन हकीकत यह है कि कई पुलिस थानों में शिकायत लेते समय कहा जाता है – “पहले जांच करेंगे, फिर FIR होगी।” यह बात सुनकर आम नागरिक भ्रमित हो जाता है कि क्या FIR उसका अधिकार नहीं है?

पहले भी CrPC के समय में पुलिस FIR टालने की कोशिश करती थी, लेकिन अब BNSS, 2023 के लागू होने के बाद पुलिस के पास एक नया शब्द आ गया है – प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) । कई मामलों में इसका उपयोग सही है, लेकिन कई बार इसका दुरुपयोग FIR दर्ज न करने के बहाने के रूप में किया जा रहा है।

इस ब्लॉग का उद्देश्य यह साफ़ करना है कि कानून वास्तव में क्या कहता है और पुलिस की प्रैक्टिस कहाँ तक सही है। FIR कब अनिवार्य है, कब सीमित प्रारंभिक जांच हो सकती है और नागरिक को क्या करना चाहिए।

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FIR क्या है और इसका कानूनी महत्व क्या है?

FIR यानी फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट, पहली आधिकारिक सूचना है, जो किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी पुलिस को देती है। FIR का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया को शुरू करना है।

FIR दर्ज होते ही पुलिस को जांच का अधिकार और कर्तव्य दोनों मिल जाते हैं। FIR के बाद ही गिरफ्तारी, साक्ष्य संग्रह और चार्जशीट जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं।

बहुत लोग FIR और GD (जनरल डायरी) या साधारण शिकायत को एक जैसा समझते हैं, जबकि FIR का कानूनी महत्व कहीं अधिक है। GD में दर्ज सूचना पर जरूरी नहीं कि जांच शुरू हो, लेकिन FIR में जांच अनिवार्य हो जाती है।

पीड़ित के लिए FIR न्याय की पहली सीढ़ी है, वहीं आरोपी के लिए भी यह जरूरी है क्योंकि इसी से उसे कानूनी सुरक्षा, बेल और निष्पक्ष जांच का अधिकार मिलता है।

प्रारंभिक जांच क्या होती है?

प्रारंभिक जांच वह शुरुआती जांच होती है जो पुलिस FIR दर्ज करने से पहले करती है। इसका मकसद सिर्फ यह समझना होता है कि –

  • शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं, या
  • मामला केवल निजी या सिविल विवाद का है।

यह कोई पूरी जांच नहीं होती। इसमें दोषी या निर्दोष होने का फैसला बिल्कुल नहीं किया जाता। सरल शब्दों में, यह सिर्फ यह देखने के लिए होती है कि FIR दर्ज करनी चाहिए या नहीं।

BNSS में FIR और प्रारंभिक जांच के बारे में क्या कहा गया है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अनुसार नियम वही है जो पहले था – अगर दी गई जानकारी से संज्ञेय अपराध बनता है, तो पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होती है।

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लेकिन BNSS यह भी मानता है कि कुछ संवेदनशील मामलों में FIR दर्ज करने से पहले पुलिस को थोड़ी-सी प्रारंभिक जांच करने की जरूरत हो सकती है। यह बात इन आधारों से समझी जाती है—

  • धारा 173 BNSS – पुलिस को दी गई सूचना से संबंधित प्रावधान
  • धारा 194 BNSS – कुछ खास परिस्थितियों में पुलिस द्वारा की जाने वाली प्रारंभिक जांच
  • संविधान के सिद्धांत, जिनकी व्याख्या अदालतों ने अपने फैसलों में की है

सरल शब्दों में, सामान्य मामलों में FIR तुरंत होती है, लेकिन कुछ खास मामलों में पुलिस पहले थोड़ी जांच करके स्थिति साफ कर सकती है।

धारा 194 BNSS – इसका कानूनी महत्व क्या है?

धारा 194 BNSS खास तौर पर उन परिस्थितियों में पुलिस की प्रारंभिक जांच और रिपोर्टिंग से जुड़ी है, जहाँ मामले सामान्य नहीं होते। उदाहरण के लिए:

  • संदिग्ध मौतें – जब किसी मौत में असामान्य या संदिग्ध स्थिति हो।
  • असामान्य मौतें – जैसे दुर्घटना, आत्महत्या या हत्या की संभावना।
  • जांच की जरूरत वाले मामले – जहाँ आपराधिक कार्रवाई से पहले तथ्य या सूचना की पुष्टि जरूरी हो।

इस धारा का मकसद FIR दर्ज करने में विलंब का अधिकार देना नहीं है, बल्कि यह एक कानूनी तरीका बताता है जिससे पुलिस कुछ मामलों में सीमित प्रारंभिक जांच कर सके। यानी, जब मामला संवेदनशील या जटिल हो, तो पुलिस बिना FIR किए पहले परिस्थितियों की जांच कर सकती है, ताकि आगे की कार्रवाई सही तरीके से की जा सके।

महत्वपूर्ण: धारा 194 BNSS संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने की अनिवार्य जिम्मेदारी को कभी भी कम नहीं करती।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

  • FIR दर्ज करना अनिवार्य है: अगर कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो पुलिस के लिए FIR दर्ज करना जरूरी है। इसे छोड़ना या देर करना कानून के खिलाफ है।
  • प्रारंभिक जांच सिर्फ अपवाद है: FIR से पहले थोड़ी जांच करना सामान्य नियम नहीं है। यह सिर्फ कुछ खास और संवेदनशील मामलों में ही किया जा सकता है।
  • सीमित परिस्थितियों में ही जांच की अनुमति: उदाहरण के लिए संदिग्ध मौतें, असामान्य मौतें या ऐसी स्थितियां जहां तथ्य जानना जरूरी हो। बाकी मामलों में FIR तुरंत दर्ज करनी होती है।
  • जांच समयबद्ध और कारण बताने वाली हो: पुलिस को जांच करते समय तय समय के भीतर निष्कर्ष देना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि जांच क्यों की गई।

प्रदीप निरंकारनाथ शर्मा बनाम गुजरात राज्य और अन्य। (2025)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जब शिकायत में साफ‑साफ संज्ञेय अपराध दिखता है, तो पुलिस कोFIR तुरंत दर्ज करना ही चाहिए – प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं होती।

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ललिता कुमारी (2014) के फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में FIR से पहले अनिवार्य रूप से जांच होनी चाहिए। यह सिर्फ तभी आता है जब शिकायत में अपराध स्पष्ट नहीं लगता

इस विशेष केस में क्या हुआ?
  • यहाँ एक रिटायर IAS अधिकारी के खिलाफ कई FIRs दर्ज हुई थीं। इन FIRs में कहा गया था कि उन्होंने सरकारी जमीन बाँटने में गड़बड़ी और पद का गलत इस्तेमाल किया।
  • अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि FIR दर्ज करने से पहले हर बार जांच होनी चाहिए, वरना यह उनके खिलाफ अनुचित और बार-बार की जा रही कार्रवाई है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
  • अगर आरोप में स्पष्ट संज्ञेय अपराध है, तो पुलिस को कोई जांच किए बिना FIR दर्ज करनी पड़ेगी
  • कोर्ट FIR से पहले जांच का नियम नहीं बना सकता, यह कानून का काम नहीं है।
  • अगर कोई FIR गलत तरीके से दर्ज हुई है, तो उसे अदालत में आगे चुनौती दी जा सकती है

कर्नाटक राज्य बनाम टी.एन. सुधाकर रेड्डी (2025) – प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट, 1988 के तहत FIR और प्रारंभिक जांच

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार कानून (PCA) में कोई प्रारंभिक जांच FIR दर्ज होने से पहले हर मामले में जरूरी नहीं होती। खासकर – अगर सूचना में साफ‑साफ संज्ञेय अपराध का स्पष्ट संकेत मिलता है, तो FIR तुरंत दर्ज की जानी चाहिए।

इस केस में पुलिस को एक सूत्र‑रिपोर्ट मिली जिसमें बताया गया कि आरोपी (जो एक सरकारी अधिकारी था) ने अपनी आमदनी से बहुत ज्यादा संपत्ति बना ली थीं। इस रिपोर्ट को पुलिस ने ध्यान से देखा और उस पर FIR दर्ज कर दी।

आरोपी ने FIR को हाई कोर्ट में चैलेंज किया और हाई कोर्ट ने FIR को रद्द कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया, और कहा कि हाई कोर्ट ने गलत फैसला लिया।

कौन‑कौन से मामलों में प्रारंभिक जांच कानूनी तौर पर की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के दिशा‑निर्देशों के अनुसार, कुछ खास मामलों में ही पुलिस FIR दर्ज करने से पहले छोटी जांच कर सकती है, जैसे:

  • मैट्रिमोनियल डिस्प्यूट
  • व्यापारिक लेन‑देन
  • मेडिकल नेग्लिजेंस
  • भ्रष्टाचार के आरोप
  • असामान्य देर से रिपोर्ट किए गए अपराध

ध्यान दें:

  • यह जांच 7–14 दिन से ज्यादा नहीं चल सकती।
  • जांच का कारण लिखित में रिकॉर्ड करना जरूरी है।
  • पुलिस अनिश्चितकाल तक FIR दर्ज करने से बच नहीं सकती।

प्रारंभिक जांच के दौरान शिकायतकर्ता के अधिकार

  • शिकायत देने का लिखित सबूत मिलना – पुलिस ने आपकी शिकायत दर्ज की या नहीं, इसका लिखित प्रमाण मिलना चाहिए।
  • देर होने का कारण जानना – अगर FIR या कार्रवाई में देरी हो रही है, तो आप कारण जान सकते हैं।
  • FIR ना बनने पर कॉपी प्राप्त करना – अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो उसका लिखित विवरण (कॉपी) मांग सकते हैं।
  • न्यायिक हस्तक्षेप मांगना – अदालत में जाकर न्यायिक मदद या आदेश प्राप्त कर सकते हैं। 
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निष्कर्ष

प्रारंभिक जांच पुलिस के लिए काम टालने का बहाना नहीं है और न ही यह न्याय से इनकार करने का तरीका है। BNSS के तहत प्रारंभिक जांच सिर्फ कुछ सीमित मामलों में सुरक्षा के तौर पर दी गई है, यह FIR का विकल्प नहीं है। कानून का उद्देश्य यह है कि एक तरफ झूठे मामलों का दुरुपयोग न हो, और दूसरी तरफ सच्चे पीड़ित को तुरंत न्याय मिले। आम नागरिक के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि कब जांच सही है और कब गलत। जब आपको यह जानकारी होती है, तो आप देरी पर सवाल उठा सकते हैं, जवाबदेही मांग सकते हैं और अपने अधिकारों की रक्षा बिना डर और भ्रम के कर सकते हैं

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FAQs

1. क्या पुलिस BNSS के तहत प्रारंभिक जांच का बहाना बनाकर FIR दर्ज करने से मना कर सकती है?

नहीं। अगर मामला संज्ञेय अपराध का है, तो पुलिस FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। धारा 194 BNSS के तहत जांच सीमित होती है और इसका गलत इस्तेमाल करके FIR टाली नहीं जा सकती।

2. किन मामलों में FIR से पहले प्रारंभिक जांच की जाती है?

प्रारंभिक जांच सिर्फ कुछ खास मामलों में होती है, जैसे: शादी-विवाद, व्यापार या पैसे से जुड़े मामले, मेडिकल लापरवाही, या अपराध की रिपोर्ट बहुत देर से की गई हो।

3. क्या BNSS में प्रारंभिक जांच पूरी करने की कोई समय-सीमा है?

हाँ। प्रारंभिक जांच उचित और तय समय के भीतर पूरी करनी होती है। पुलिस इसे बहाना बनाकर अनिश्चित समय तक FIR को नहीं टाल सकती।

4. अगर पुलिस प्रारंभिक जांच का गलत इस्तेमाल करे तो शिकायतकर्ता क्या कर सकता है?

शिकायतकर्ता वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क कर सकता है, मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दे सकता है, या हाई कोर्ट में पिटीशन दाखिल कर सकता है।

5. क्या प्रारंभिक जांच से आरोपी दोषी या निर्दोष तय होता है?

नहीं। प्रारंभिक जांच का मकसद सिर्फ यह देखना होता है कि FIR दर्ज करनी है या नहीं। इसमें न सबूतों की जांच होती है और न ही दोष या निर्दोष का फैसला।

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