स्टाकिंग केवल किसी का पीछा करना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा व्यवहार है जो किसी व्यक्ति की मानसिक शांति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा को गहराई से प्रभावित करता है। स्टाकिंग का शिकार व्यक्ति लगातार डर, चिंता और असुरक्षा की भावना में जीता है। कई मामलों में यह मानसिक उत्पीड़न धीरे-धीरे शारीरिक हिंसा में भी बदल सकता है।
BNS 2023 ने स्टाकिंग को गंभीरता से लेते हुए इसे स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में रखा है। पहले IPC के तहत सीमित प्रावधान थे, लेकिन अब कानून का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को सुरक्षा और आरोपी को सुधार का अवसर देना भी है। इस ब्लॉग का उद्देश्य आम नागरिक को यह समझाना है कि कानून क्या कहता है और व्यावहारिक रूप से इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है।
स्टॉकिंग को अलग अपराध क्यों बनाया गया?
कई सालों तक स्टॉकिंग को गंभीर अपराध नहीं माना जाता था। इसे सिर्फ “पीछा करना”, “बार-बार बात करने की कोशिश” या “ध्यान देना” कहकर टाल दिया जाता था। पीड़ितों—खासतौर पर महिलाओं, से उम्मीद की जाती थी कि वे बार-बार आने वाले कॉल, मैसेज, मिलने आना और निगरानी को सहन करें।
- लेकिन सच्चाई यह है कि स्टॉकिंग व्यक्ति के मन में डर और मानसिक तनाव पैदा करती है।
- उसकी निजी आज़ादी और प्राइवेसी का उल्लंघन करती है।
- कई बार आगे चलकर यौन अपराध या हिंसा जैसे गंभीर अपराधों में बदल जाती है।
इसी खतरे को समझते हुए, भारतीय कानून ने पहले IPC की धारा 354D में स्टॉकिंग को अपराध बनाया। अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के तहत भी यह अपराध बना हुआ है और धारा 78 में इसे और साफ शब्दों में परिभाषित किया गया है, ताकि कानून को सख्ती से लागू किया जा सके और पीड़ितों को बेहतर सुरक्षा मिल सके।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 78 क्या है?
धारा 78 BNS स्टॉकिंग को अपराध बताती है और इसके लिए सज़ा का प्रावधान करती है। सरल शब्दों में, स्टॉकिंग का मतलब है – किसी व्यक्ति का बार-बार पीछा करना, बिना इच्छा संपर्क करना, निगरानी रखना या परेशान करना, जबकि सामने वाला व्यक्ति साफ मना कर चुका हो या रुचि न दिखा रहा हो।
धारा 78 BNS के तहत कौन-से काम स्टॉकिंग माने जाते हैं?
अगर कोई व्यक्ति सामने वाले की मना करने के बावजूद बार-बार नीचे दिए गए काम करता है, तो वह स्टॉकिंग का अपराध माना जाएगा:
शारीरिक स्टॉकिंग
- किसी व्यक्ति का जगह-जगह पीछा करना
- उसकी कही आने और जाने पर नज़र रखना
- बिना जरूरत उसके घर, ऑफिस या रोज़ जाने वाली जगह पर जाना
- बार-बार सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देकर डर या परेशानी पैदा करना
बातचीत या संपर्क के ज़रिए स्टॉकिंग
- बार-बार फोन कॉल करना
- लगातार व्हाट्सएप मैसेज, ई-मेल या सोशल मीडिया मैसेज भेजना
- बिना मांगे गिफ्ट, चिट्ठी या मैसेज भेजना
- पीड़ित तक पहुंचने के लिए उसके दोस्तों या परिवार से संपर्क करना
ऑनलाइन या साइबर स्टॉकिंग
- सोशल मीडिया अकाउंट्स पर नज़र रखना
- फर्जी प्रोफाइल बनाकर मैसेज करना या ट्रैक करना
- हर पोस्ट पर बार-बार लाइक, कमेंट या प्रतिक्रिया देना
- किसी की ऑनलाइन एक्टिविटी या लोकेशन को डिजिटल तरीके से ट्रैक करना
महत्वपूर्ण बात: भले ही कोई शारीरिक नुकसान न हुआ हो, अगर इन हरकतों से डर, बेचैनी या मानसिक परेशानी होती है, तो स्टॉकिंग का अपराध पूरा माना जाएगा।
स्टॉकिंग की सज़ा
- पहली बार स्टॉकिंग करने पर: दोषी को 3 साल तक की जेल हो सकती है और साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
- दूसरी बार या बार-बार स्टॉकिंग करने पर: दोषी को 5 साल तक की जेल हो सकती है और इसके साथ जुर्माना भी देना होगा।
अगर कोई व्यक्ति बार-बार किसी को परेशान करता है और स्टॉकिंग का दोषी पाया जाता है, तो हर बार सज़ा और कड़ी होती जाती है।
धारा 78 BNS किस प्रकार का अपराध है?
- संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence): स्टॉकिंग को संज्ञेय अपराध माना गया है। इसका मतलब यह है कि पुलिस को बिना अदालत की अनुमति के FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का अधिकार होता है। गंभीर मामलों में पुलिस आरोपी को बिना वारंट गिरफ्तार भी कर सकती है, ताकि पीड़ित को तुरंत सुरक्षा मिल सके।
- ज़मानती और गैर-ज़मानती प्रावधान (Bailable / Non-Bailable): स्टॉकिंग का अपराध पहली बार होने पर ज़मानती होता है, यानी आरोपी को बेल मिल सकती है। लेकिन अगर वही व्यक्ति दोबारा या बार-बार स्टॉकिंग करता है, तो अपराध गैर-ज़मानती हो जाता है, और बेल अदालत की मर्ज़ी पर निर्भर करती है।
- किस अदालत में मामला चलेगा (Triable by Magistrate): स्टॉकिंग से जुड़ा मामला किसी भी मजिस्ट्रेट की अदालत में सुना जा सकता है। इसका उद्देश्य यह है कि केस जल्दी सुना जाए और पीड़ित को न्याय पाने के लिए लंबा इंतज़ार न करना पड़े।
क्या धारा 78 BNS में कोई अपवाद हैं?
हाँ। कानून यह भी समझता है कि हर बार किसी का पीछा करना या संपर्क करना गलत इरादे से नहीं होता। इसलिए धारा 78 BNS में कुछ वाजिब और कानूनी कार्यों को स्टॉकिंग नहीं माना गया है।
अगर कोई काम अपराध को रोकने या अपराध की जांच करने के लिए किया गया हो – जैसे पुलिस द्वारा निगरानी – तो वह स्टॉकिंग नहीं होगी। इसी तरह, कानूनी अधिकार के तहत की गई कार्रवाई, जैसे पुलिस जांच या कोर्ट के आदेश से निगरानी, भी अपराध नहीं मानी जाती।
इसके अलावा, पेशेवर और वैध कारणों से किया गया संपर्क – जैसे वकील द्वारा कानूनी नोटिस भेजना, पत्रकार द्वारा खबर से जुड़ी पूछताछ, या किसी सरकारी अधिकारी का आधिकारिक संवाद – भी स्टॉकिंग की श्रेणी में नहीं आता।
महत्वपूर्ण बात: ऐसे मामलों में यह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी व्यक्ति पर होती है कि उसका व्यवहार सही, जरूरी और कानून के दायरे में था।
अगर कोई व्यक्ति आपको लगातार परेशान या पीछा कर रहा है, तो क्या करें?
स्टेप 1: साफ-साफ मना करें सबसे पहले सामने वाले को साफ शब्दों में “ना” कहें। यह मैसेज, कॉल या लिखित रूप में हो सकता है। किसी को ब्लॉक करना भी यह दिखाता है कि आप संपर्क नहीं चाहते।
स्टेप 2: सबूत सुरक्षित रखें जो भी मैसेज, कॉल, ईमेल या सोशल मीडिया पर संपर्क हो रहा है, उसके स्क्रीनशॉट रखें। कॉल रिकॉर्ड, चैट हिस्ट्री, CCTV फुटेज या गवाह हों तो उन्हें भी संभाल कर रखें।
स्टेप 3: पुलिस में शिकायत करेंअपने नजदीकी पुलिस स्टेशन जाएँ और धारा 78 BNS 2023 के तहत FIR दर्ज करने को कहें। अगर शिकायत से अपराध बनता है, तो पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होती है।
स्टेप 4: मजिस्ट्रेट के पास जाएँ (अगर पुलिस मना करे) अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो आप भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत कर सकते हैं। अदालत पुलिस को जांच करने का आदेश दे सकती है।
हाई कोर्ट्स के महत्वपूर्ण निर्णय
कृष्ण कुमार कसाना बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, 2025
- इस मामले में एक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक महिला की तस्वीरें और वीडियो लिए, इसलिए उसके खिलाफ स्टॉकिंग का केस दर्ज किया गया।
- हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी की तस्वीर लेना ही अपने-आप में स्टॉकिंग नहीं बन जाता।
- कोर्ट के अनुसार, स्टॉकिंग तब मानी जाएगी जब कोई व्यक्ति बार-बार किसी के पीछे पड़े, बार-बार संपर्क करने की कोशिश करे, या मना करने के बाद भी परेशान करता रहे।
- इस केस में ऐसा बार-बार पीछा करना या परेशान करना साबित नहीं हुआ, इसलिए कोर्ट ने माना कि धारा 78 (स्टॉकिंग) लागू नहीं होती। इसी वजह से आरोपी को एंटीसिपेटरी बेल दे दी गई।
अमित चव्हाण बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2022
FIR में आरोप था कि आरोपी ने 14-साल की लड़की का पीछा किया और बाद में घर में घुसकर हमला भी किया। हाई कोर्ट ने पाया कि जहाँ घर में हिंसा और अत्याचार के आरोप साबित होते हैं, वहीं स्टॉकिंग का आरोप तभी बनेगा जब लगातार पीछा या संपर्क हो, जो इसी केस में एक बार की घटना थी।
फैसला किस बारे में था? बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ एक बार किसी लड़की का पीछा करना “स्टॉकिंग” नहीं माना जाएगा। यह IPC की धारा 354(D) के तहत स्टॉकिंग की परिभाषा में नहीं आता।
कोर्ट ने क्या कहा? स्टॉकिंग का अपराध तब माना जाएगा जब कोई व्यक्ति बार-बार या लगातार किसी को पीछा करे, देखे, सम्पर्क करे या डिजिटल/ऑनलाइन तरीके से परेशान करे। सिर्फ एक बार पीछा करना या एक-दो घटनाएँ इस अपराध के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने स्टॉकिंग के आरोप को खारिज कर दिया क्योंकि वो केवल एक बार पीछा करने जैसी घटना पर आधारित था। लेकिन कुछ अन्य गंभीर आरोप जैसे यौन उत्पीड़न के मामले में अलग फैसला दिया गया।
हाई कोर्ट और साइबर स्टॉकिंग से जुड़े सिद्धांत
भारत के अलग-अलग हाई कोर्ट ने अपने फैसलों में साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति बार-बार बिना चाहत के मैसेज करे, कॉल करे या ऑनलाइन परेशान करे, और इससे पीड़ित को डर, तनाव या परेशानी हो, तो यह स्टॉकिंग माना जा सकता है।
उड़ीसा हाई कोर्ट ने कलंदी चरण लेंका बनाम राज्य ओडिशा (2017) में कहा कि किसी को लगातार अनचाहे मैसेज भेजना और ऑनलाइन परेशान करना स्टॉकिंग का अपराध है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने शिवानी बनाम राज्य महाराष्ट्र (2019) में यह बात दोहराई कि अगर किसी ने साफ मना कर दिया हो, फिर भी उससे लगातार संपर्क किया जाए, तो स्टॉकिंग के सभी जरूरी तत्व पूरे हो जाते हैं।
निष्कर्ष
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 78 यह साफ संदेश देती है कि बार-बार परेशान करना प्यार नहीं, बल्कि अपराध है। यह कानून शारीरिक और ऑनलाइन दोनों तरह की स्टॉकिंग को अपराध मानता है और व्यक्ति की निजी ज़िंदगी, सम्मान और मानसिक शांति की रक्षा करता है। चाहे पीछा सड़क पर हो या मोबाइल और सोशल मीडिया के ज़रिए, पीड़ित पर उसका असर गंभीर होता है। इस कानून को समझने से लोग समय पर कदम उठा सकते हैं और समाज को यह याद दिलाता है कि “ना” का मतलब हमेशा “ना” ही होता है। कानून सुरक्षा, सहमति और व्यक्तिगत आज़ादी के साथ मजबूती से खड़ा है।
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FAQs
1. क्या सोशल मीडिया या ई-मेल पर की गई स्टॉकिंग पर धारा 78 BNS 2023 के तहत सज़ा हो सकती है?
हाँ। धारा 78 में ऑनलाइन स्टॉकिंग भी शामिल है। बार-बार मैसेज भेजना, ऑनलाइन गतिविधि पर नज़र रखना या मना करने के बाद भी संपर्क करना अपराध है।
2. क्या धारा 78 के तहत स्टॉकिंग संज्ञेय अपराध है?
हाँ। यह संज्ञेय अपराध है, यानी पुलिस बिना कोर्ट की अनुमति के FIR दर्ज कर सकती है और कार्रवाई कर सकती है।
3. क्या सिर्फ एक बार की घटना से स्टॉकिंग का मामला बन सकता है?
नहीं। आमतौर पर स्टॉकिंग में बार-बार किया गया व्यवहार होना चाहिए, जिससे डर या मानसिक परेशानी हो। एक-दो बार की गलती से मामला नहीं बनता।
4. बार-बार स्टॉकिंग करने पर क्या सज़ा होती है?
अगर कोई व्यक्ति दोबारा स्टॉकिंग करता है, तो कानून में कड़ी सज़ा का प्रावधान है, जिसमें ज़्यादा जेल और जुर्माना शामिल है।
5. अगर झूठा स्टॉकिंग का केस कर दिया जाए तो क्या किया जा सकता है?
हाँ। अगर शिकायत झूठी या बदनियत से की गई है, तो आरोपी व्यक्ति कानूनी उपाय ले सकता है, जैसे बेल लेना या केस रद्द करवाने की अर्जी देना।



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