अधिकतर लोगों के लिए प्रॉपर्टी खरीदना सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं होता, बल्कि जीवन का एक बड़ा सपना पूरा होने जैसा होता है। यह उनके वर्षों की मेहनत, बचत और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद का परिणाम होता है। प्रॉपर्टी खरीदने के बाद अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि अब सब कुछ ठीक है और आगे कोई परेशानी नहीं आएगी।
लेकिन सच यह है कि प्रॉपर्टी से जुड़े मामले कागज़ों और दस्तावेज़ों पर ही टिके होते हैं। अगर कोई जरूरी दस्तावेज़ अधूरा हो या रिकॉर्ड में कोई गलती हो, तो आगे चलकर कानूनी नोटिस, विवाद या प्रॉपर्टी बेचने में परेशानी हो सकती है। इसलिए अपने प्रॉपर्टी के दस्तावेज़ों की जाँच करना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि आपकी सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी कदम है। आज थोड़ा समय देकर कागज़ सही से जाँच लेने से आप भविष्य की बड़ी परेशानियों से बच सकते हैं।
कानूनी जाँच क्यों ज़रूरी है
प्रॉपर्टी खरीदना सिर्फ पैसे देना और चाबी लेना नहीं होता। इसका असली मतलब है कि आप उस प्रॉपर्टी के कानूनी मालिक बनें। अगर कागज़ात सही नहीं हुए, तो आगे चलकर बड़ी परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं।
कई लोग ब्रोकर या जान-पहचान वालों की बातों पर भरोसा करके बिना जाँच के प्रॉपर्टी खरीद लेते हैं। बाद में उन्हें इन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:
- मालिकाना हक को लेकर झगड़ा
- कोर्ट केस
- नगर निगम या अथॉरिटी से नोटिस
- बैंक से लोन मिलने में दिक्कत
- प्रॉपर्टी बेचने में परेशानी
अगर आपने पहले ही प्रॉपर्टी खरीद ली है, तब भी कागज़ात की जाँच करवा लेना बहुत फायदेमंद होता है। समय रहते गलती पकड़ में आ जाए, तो उसे सुधारा जा सकता है।
सेल डीड – सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़
सेल डीड वह मुख्य दस्तावेज़ होता है जिससे यह साबित होता है कि प्रॉपर्टी कानूनी रूप से आपके नाम पर ट्रांसफर हो चुकी है। यह आपके मालिकाना हक का सबसे मजबूत सबूत माना जाता है।
क्या जाँचें:
- खरीदार और सेलर का सही नाम
- प्रॉपर्टी का पूरा विवरण (एरिया, फ्लैट/प्लॉट नंबर, सीमाएँ)
- बिक्री की तय की गई रकम
- दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर की तारीख
- दोनों पक्षों और गवाहों के हस्ताक्षर
- रजिस्ट्रेशन की मुहर और नंबर
क्यों ज़रूरी है: अगर सेल डीड रजिस्टर्ड नहीं है, तो कानून की नजर में आप प्रॉपर्टी के मालिक नहीं माने जाते। भविष्य में लोन लेने, बेचने या कोर्ट में अधिकार साबित करने में बड़ी दिक्कत आ सकती है।
सुरज लैम्प एंड इंडस्ट्रीज़ प्रा. लि. बनाम हरियाणा राज्य (2012)
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी इमूवेबल प्रॉपर्टी (घर, फ्लैट, प्लॉट आदि) का मालिकाना हक सिर्फ रजिस्टर्ड सेल डीड से ही ट्रांसफर होता है। केवल पावर ऑफ अटॉर्नी या एग्रीमेंट टू सेल से कोई व्यक्ति मालिक नहीं बनता। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदते समय रजिस्टर्ड सेल डीड होना बेहद ज़रूरी है।
टाइटल डीड और चेन ऑफ टाइटल डॉक्यूमेंट्स
ये दस्तावेज़ यह दिखाते हैं कि प्रॉपर्टी पिछले मालिकों से होते हुए वर्तमान सेलर तक कैसे पहुँची।
क्या जाँचें:
- कम से कम पिछले 30 वर्षों की दस्तावेज़ों की सीरीज
- बीच में कोई दस्तावेज़ गायब न हो
- सभी दस्तावेज़ सही तरीके से रजिस्टर्ड हों
क्यों ज़रूरी है: अगर टाइटल साफ नहीं है, तो यह साबित नहीं होगा कि सेलर को प्रॉपर्टी बेचने का कानूनी अधिकार था। ऐसे मामलों में बाद में कोई और व्यक्ति मालिकाना हक का दावा कर सकता है।
रामदास बनाम सिताबाई (2009)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी है कि वह पहले विक्रेता का टाइटल (मालिकाना हक) सही तरह से जाँच करे। अगर कोई व्यक्ति बिना जाँच किए प्रॉपर्टी खरीद लेता है, तो बाद में वह यह नहीं कह सकता कि उसे सुरक्षा मिलनी चाहिए।
एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (EC)
एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट यह बताता है कि प्रॉपर्टी पर कोई लोन, गिरवी, कोर्ट केस या अन्य कानूनी बोझ तो नहीं है।
क्या जाँचें:
- कितने वर्षों की अवधि का EC लिया गया है
- “Nil Encumbrance” लिखा है या कोई एंट्री मौजूद है
क्यों ज़रूरी है: अगर प्रॉपर्टी पहले से बैंक के पास गिरवी है, तो बैंक उस पर अपना अधिकार जता सकता है। EC देखकर आप सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रॉपर्टी कर्ज़ या विवाद से मुक्त है।
अप्रूव्ड बिल्डिंग प्लान
अप्रूव्ड बिल्डिंग प्लान वह नक्शा होता है जिसे स्थानीय नगर निगम या विकास प्राधिकरण ने मंज़ूरी दी होती है। यह बताता है कि बिल्डिंग किस तरह और किस डिज़ाइन में बनाई जानी है।
क्या ज़रूर जाँचें
- नगर निगम द्वारा जारी किया गया स्वीकृत नक्शे की कॉपी
- फ्लैट का साइज, फ्लोर नंबर और लेआउट उसी प्लान से मैच करता हो
- कोई अतिरिक्त मंज़िल या अवैध बदलाव न किया गया हो
क्यों ज़रूरी है? अगर बिल्डिंग स्वीकृत नक्शे के अनुसार नहीं बनी है, तो उसे अवैध माना जा सकता है और भविष्य में नगर निगम उसे गिराने (डिमोलिश) का आदेश दे सकता है।
फ्रेंड्स कॉलोनी डेवलपमेंट कमेटी बनाम स्टेट ऑफ उड़ीसा (2004)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध निर्माण को केवल इस आधार पर वैध नहीं बनाया जा सकता कि खरीदार ने मासूमियत में फ्लैट खरीदा था।
कम्प्लीशन सर्टिफिकेट
यह प्रमाणपत्र बताता है कि बिल्डिंग का निर्माण नगर निगम द्वारा स्वीकृत नक्शे के अनुसार पूरा हो चुका है।
क्यों ज़रूरी है? CC के बिना बिल्डिंग को अधूरी या अवैध माना जा सकता है। भविष्य में रजिस्ट्रेशन, लोन या रीसेल के समय परेशानी आ सकती है।
ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट
यह प्रमाणपत्र तब दिया जाता है जब नगर निगम यह जांच लेता है कि बिल्डिंग रहने के लिए सुरक्षित है।
क्यों ज़रूरी है?
- OC न होने पर बिजली और पानी के कनेक्शन में दिक्कत हो सकती है
- बैंक होम लोन देने से मना कर सकता है
- बिल्डिंग को अवैध घोषित किए जाने का खतरा रहता है
प्रॉपर्टी टैक्स रसीदें
प्रॉपर्टी पर लगने वाला टैक्स नगर निगम या स्थानीय निकाय को नियमित रूप से देना होता है।
क्या ज़रूर जाँचें
- पिछले कई वर्षों की टैक्स रसीदें
- कहीं कोई बकाया तो नहीं है
- टैक्स उसी व्यक्ति के नाम पर जमा है जो मालिक बताया जा रहा है
क्यों ज़रूरी है? अगर पुराने मालिक ने टैक्स नहीं भरा है, तो आगे चलकर वही बकाया टैक्स नए खरीदार से वसूला जा सकता है। इससे आपको अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ सकता है।
खाता / पट्टा / रिकॉर्ड ऑफ राइट्स
ये सरकारी रिकॉर्ड होते हैं जो बताते हैं कि प्रॉपर्टी का कानूनी मालिक कौन है। अलग-अलग राज्यों में इन्हें अलग नाम से जाना जाता है।
क्या ज़रूर जाँचें
- मालिक का नाम सही हो
- प्रॉपर्टी का विवरण (एरिया, नंबर, लोकेशन) सही हो
- रिकॉर्ड अपडेटेड हो
क्यों ज़रूरी है? ये दस्तावेज़ यह पुष्टि करते हैं कि जिस व्यक्ति से आप प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं, वही उसका असली मालिक है।
एग्रीमेंट टू सेल
यह वह समझौता होता है जो फाइनल सेल डीड से पहले किया जाता है। इसमें सौदे की सभी शर्तें लिखी होती हैं।
क्या ज़रूर जाँचें
- तय की गई बिक्री कीमत
- पेमेंट की शर्तें
- कब्जा मिलने की तारीख
- देरी होने पर पेनल्टी की शर्तें
क्यों ज़रूरी है? अगर भविष्य में कोई विवाद हो, तो यह एग्रीमेंट आपके अधिकारों को साबित करने में मदद करता है।
पज़ेशन लेटर
यह दस्तावेज़ बताता है कि प्रॉपर्टी का वास्तविक कब्जा आपको दे दिया गया है।
क्यों ज़रूरी है? यह साबित करता है कि अब आप उस प्रॉपर्टी में रहने या इस्तेमाल करने के हकदार हैं। कई बार बैंक भी लोन प्रक्रिया में पज़ेशन लेटर मांगते हैं।
पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) (यदि लागू हो)
अगर कोई व्यक्ति मालिक की ओर से प्रॉपर्टी बेच रहा है, तो उसके पास वैध पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) होनी चाहिए।
क्या ज़रूर जाँचें
- POA रजिस्टर्ड हो
- अभी तक रद्द (Cancelled) न हुई हो
- बिक्री का अधिकार स्पष्ट रूप से दिया गया हो
क्यों ज़रूरी है? केवल पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर प्रॉपर्टी का मालिकाना हक ट्रांसफर नहीं होता।
सुरज लैम्प केस (2012) सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि प्रॉपर्टी का मालिकाना हक केवल रजिस्टर्ड सेल डीड से ही ट्रांसफर होता है। सिर्फ POA या एग्रीमेंट टू सेल से कोई व्यक्ति मालिक नहीं बनता।
RERA रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
RERA के तहत हर रियल एस्टेट प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य होता है। बिल्डर को प्रोजेक्ट लॉन्च करने से पहले RERA में उसका पंजीकरण करवाना होता है।
क्या ज़रूर जाँचें
- प्रोजेक्ट का RERA रजिस्ट्रेशन नंबर
- RERA वेबसाइट पर प्रोजेक्ट की डिटेल्स
- बिल्डर का नाम और प्रोजेक्ट की स्थिति (स्टेटस)
क्यों ज़रूरी है? RERA रजिस्ट्रेशन यह साबित करता है कि प्रोजेक्ट सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है और बिल्डर की जवाबदेही तय है। अगर बिल्डर वादे पूरे नहीं करता, तो खरीदार RERA में शिकायत कर सकता है और राहत पा सकता है।
अगर प्रॉपर्टी के कागज़ों में कोई समस्या मिले तो क्या करें?
- किसी अच्छे प्रॉपर्टी वकील से सलाह लें: अनुभवी प्रॉपर्टी वकील दस्तावेज़ देखकर गलती बताएगा और सही कानूनी रास्ता समझाएगा।
- सामने वाले को लीगल नोटिस भेजें: दूसरे पक्ष को लिखित रूप से गलती सुधारने या समाधान देने के लिए कहा जाता है।
- गलती सुधारने या सौदा रद्द करने की मांग करें: कागज़ ठीक करवाने या पैसा वापस लेकर सौदा खत्म करने की मांग की जा सकती है।
- ज़रूरत पड़ने पर सिविल केस फाइल करें: अगर समाधान न मिले तो कोर्ट में केस कर कानूनी अधिकार सुरक्षित करें।
क्यों लीगल ड्यू डिलिजेंस (Legal Due Diligence) ज़रूरी है?
कोर्ट यह मानती है कि प्रॉपर्टी खरीदते समय खरीदार को समझदारी से काम लेना चाहिए। बाद में यह कहना कि “मुझे जानकारी नहीं थी” – कानूनी रूप से मान्य बहाना नहीं होता।
खत्री होटल्स प्रा. लि. बनाम भारत संघ (2011) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रॉपर्टी खरीदने से पहले खरीदार को सभी दस्तावेज़ों की ठीक से जाँच करनी चाहिए।
निष्कर्ष
प्रॉपर्टी खरीदना सिर्फ ईंट और दीवारें लेना नहीं है, बल्कि अपने भविष्य की सुरक्षा करना है। आज जो दस्तावेज़ आप ध्यान से जाँचते हैं, वही कल आपको झगड़े और कोर्ट-कचहरी से बचाते हैं।
थोड़ी सी सावधानी आपको सालों की परेशानी, खर्च और तनाव से बचा सकती है। याद रखें – कानूनी रूप से साफ प्रॉपर्टी, खूबसूरत लेकिन विवादित प्रॉपर्टी से कहीं ज्यादा कीमती होती है।
किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।
FAQs
1. क्या रजिस्ट्रेशन के बाद भी प्रॉपर्टी के कागज़ जांचना ज़रूरी है?
हाँ। केवल रजिस्ट्रेशन से यह साबित नहीं होता कि विक्रेता असली मालिक है या प्रॉपर्टी पर कोई कानूनी परेशानी नहीं है। बाद में जांच करने से छुपी हुई समस्याएँ सामने आ सकती हैं।
2. अगर पुराने कागज़ नकली निकलें तो क्या खरीदार की मालिकाना हक खत्म हो सकता है?
हाँ। यदि पहले के दस्तावेज़ गलत या फर्जी पाए गए, तो खरीदार की मालिकाना हक पर भी असर पड़ सकता है, भले ही उसने ईमानदारी से खरीदा हो।
3. कैसे पता करें कि प्रॉपर्टी पर कोई कोर्ट केस चल रहा है या नहीं?
कोर्ट रिकॉर्ड सर्च करवाएँ, एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट लें और विक्रेता से लिखित घोषणा लें कि कोई केस लंबित नहीं है।
4. क्या बिल्डर या विक्रेता की मौखिक बात कानूनी रूप से मान्य होती है?
नहीं। केवल लिखित और रजिस्टर्ड दस्तावेज़ ही कोर्ट में मान्य होते हैं। मौखिक वादे सुरक्षा नहीं देते।
5. क्या पूरा पैसा देने से पहले लीगल राय लेना चाहिए?
हाँ। सबसे अच्छा यही है कि पूरा भुगतान करने से पहले लीगल राय लें। फिर भी, खरीद के बाद भी जांच कराने से गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं।



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