आज के समय में बैंक अकाउंट सिर्फ पैसे रखने का साधन नहीं है, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की ज़रूरत बन चुका है। सैलरी आना, पेंशन मिलना, बिज़नेस का लेन-देन, EMI भरना, बच्चों की फीस देना—सब कुछ बैंक अकाउंट से ही होता है। ऐसे में अगर अचानक मोबाइल पर “Account Debit Freeze” का मैसेज आ जाए, तो किसी को भी घबराहट और परेशानी होना स्वाभाविक है।
पिछले कुछ सालों में साइबर फ्रॉड के मामले बहुत बढ़ गए हैं। इसी वजह से कई बार बैंक या जांच एजेंसियां सावधानी के तौर पर बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर देती हैं। लेकिन दिक्कत तब होती है जब किसी निर्दोष व्यक्ति का अकाउंट महीनों तक फ्रीज़ रहता है, जबकि उसके खिलाफ कोई केस या कोर्ट का आदेश भी नहीं होता।
इसी समस्या को देखते हुए मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स (MHA) ने साइबर फ्रॉड से जुड़े मामलों के लिए नई SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) जारी की है। यह नई प्रक्रिया आम लोगों को बेवजह अकाउंट फ्रीज़ रहने से राहत देने के लिए बनाई गई है।
नई SOP क्या है और यह क्यों चर्चा में है?
मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स (MHA) ने साइबर फ्रॉड से जुड़े मामलों के लिए एक नई SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) जारी की है, जो पूरे देश में लागू होगी। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि साइबर फ्रॉड मामलों में हर जगह एक जैसी प्रक्रिया अपनाई जाए, काम समय पर हो, और आम नागरिकों के साथ अन्याय न हो।
पहले कई मामलों में देखा गया कि बैंक एहतियातन किसी का भी अकाउंट फ्रीज़ कर देते थे और फिर महीनों तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती थी। नई SOP इस समस्या को रोकने के लिए लाई गई है।
इस नई SOP के तहत:
- अब बैंक मनमाने तरीके से किसी का अकाउंट फ्रीज़ नहीं कर सकेंगे।
- अकाउंट को लंबे समय तक बिना वजह ब्लॉक करके रखने की अनुमति नहीं होगी।
- जिस व्यक्ति के साथ फ्रॉड हुआ है और जिस खाताधारक का अकाउंट फ्रीज़ हुआ है—दोनों के अधिकारों का ध्यान रखा जाएगा।
इस SOP को नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और सिटीजन फाइनेंसियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग सिस्टम के ज़रिए लागू किया जा रहा है। इसका मतलब यह है कि साइबर फ्रॉड की शिकायत ऑनलाइन दर्ज होते ही एक तय प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई होगी।
अकाउंट फ्रीज़ करने का सबसे आम कारण
आजकल ज़्यादातर मामलों में अकाउंट इसलिए फ्रीज़ किया जाता है क्योंकि किसी न किसी तरह से उस अकाउंट का नाम किसी साइबर फ्रॉड की जांच में आ जाता है। कई बार खाताधारक की कोई गलती नहीं होती, फिर भी उसका अकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता है।
आमतौर पर अकाउंट इन परिस्थितियों में फ्रीज़ किया जाता है:
- अगर किसी साइबर फ्रॉड से जुड़ी रकम आपके अकाउंट में आई हो या आपके अकाउंट से होकर कहीं और गई हो।
- अगर किसी अनजान व्यक्ति ने आपके अकाउंट में पैसा भेजा हो और वह पैसा तुरंत किसी दूसरे अकाउंट में ट्रांसफर हो गया हो।
- अगर पुलिस या साइबर सेल बैंक को यह सूचना दे दे कि आपके अकाउंट में “संदिग्ध लेन-देन (suspicious transaction)” हुआ है।
- अगर किसी मामले में FIR या ऑनलाइन शिकायत दर्ज हुई हो, भले ही आप उस केस में आरोपी न हों।
समस्या यह है कि कई बार बैंक पूरी जांच होने से पहले ही प्रीकॉशन के लिए, पूरा अकाउंट फ्रीज़ कर देता है। इससे खाताधारक सैलरी निकालने, घर का खर्च चलाने, EMI भरने या जरूरी भुगतान करने में भी असमर्थ हो जाता है।
जबकि कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान किया जाए। जांच केवल संदिग्ध रकम तक सीमित होनी चाहिए, न कि पूरे अकाउंट को अनिश्चित समय के लिए ब्लॉक कर दिया जाए। यही वजह है कि नई SOP में इस तरह की मनमानी पर रोक लगाने की बात कही गई है।
नई SOP में अकाउंट अनफ्रीज़ को लेकर क्या कहा गया है?
नई SOP का मुख्य उद्देश्य यह है कि साइबर फ्रॉड की जांच भी सही तरीके से हो और साथ ही निर्दोष खाताधारकों को बेवजह परेशान भी न किया जाए। इसी वजह से अकाउंट फ्रीज़ और अनफ्रीज़ को लेकर कुछ साफ़ और व्यावहारिक नियम तय किए गए हैं।
1. बिना कोर्ट ऑर्डर अकाउंट लंबे समय तक फ्रीज़ नहीं रखा जा सकता: अगर किसी अकाउंट को जांच के लिए फ्रीज़ किया गया है और 90 दिनों के भीतर न तो कोई कोर्ट ऑर्डर आता है, न जब्ती (seizure) आदेश जारी होता है और न ही केस का ट्रायल शुरू होता है, तो बैंक को वह अकाउंट अनफ्रीज़ करना होगा। इसका मतलब यह है कि बैंक अब किसी अकाउंट को महीनों या सालों तक यूँ ही ब्लॉक करके नहीं रख सकता।
2. छोटे फ्रॉड मामलों में आम आदमी को राहत: यदि साइबर फ्रॉड की राशि ₹50,000 से कम है, तो अब हर मामले में कोर्ट ऑर्डर लेना जरूरी नहीं होगा। ऐसे मामलों में जांच एजेंसी और बैंक आपसी प्रक्रिया से ही पैसा वापस करने की कार्रवाई कर सकते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को जल्दी राहत मिलेगी और लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचाव होगा।
3. जांच भी हो और खाताधारक का जीवन भी न रुके: नई SOP यह मानती है कि केवल शक के आधार पर पूरे अकाउंट को बंद कर देना गलत है। इसलिए निर्देश दिया गया है कि जहाँ संभव हो, सिर्फ संदिग्ध राशि को अलग (hold) किया जाए, न कि पूरे अकाउंट को फ्रीज़ किया जाए। इससे खाताधारक अपनी सैलरी, पेंशन, घरेलू खर्च और जरूरी भुगतान जारी रख सकेगा।
कुल मिलाकर, यह नई SOP यह सुनिश्चित करती है कि जांच एजेंसियाँ अपना काम करें, लेकिन निर्दोष नागरिकों के अधिकारों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर अनावश्यक असर न पड़े।
हाईकोर्ट्स ने अकाउंट फ्रीज़ पर क्या कहा है?
देश के कई हाईकोर्ट पहले ही साफ़ कर चुके हैं कि बैंक अकाउंट फ्रीज़ करना दंड नहीं, बल्कि केवल एक अस्थायी जांच उपाय है।
दिल्ली हाईकोर्ट का रुख
दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में बैंक अकाउंट फ्रीज़ से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले पवन कुमार राय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य, 2024 में स्पष्ट किया कि जांच के नाम पर पूरे बैंक अकाउंट को फ्रीज़ करना असंवैधानिक है, विशेषकर तब जब खाताधारक न तो आरोपी है और न ही किसी आपराधिक साज़िश का हिस्सा।
इस मामले में पिटीशनर्स एक छोटा रेहड़ी-पटरी वाला था, जो दिल्ली में ठेले पर छोले-भटूरे बेचकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसके बैंक खाते में मात्र ₹105 की राशि किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा जमा की गई थी, जिसे साइबर फ्रॉड से जोड़ते हुए बैंक ने पुलिस के निर्देश पर पूरा अकाउंट फ्रीज़ कर दिया, जबकि खाते में कुल ₹1,22,556 जमा थे।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई व्यक्ति के जीवन को ठप कर देती है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और आजीविका के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यदि जांच एजेंसी ने किसी विशिष्ट राशि को संदिग्ध पाया है, तो वह अधिकतम उसी राशि तक सीमित कार्रवाई कर सकती है, न कि पूरे अकाउंट को जाम कर सकती है। न्यायालय ने बैंक को निर्देश दिया कि वह पिटीशनर्स का पूरा अकाउंट डी-फ्रीज़ करे और केवल ₹105 की राशि पर lien लगाए, जिससे वह अपना व्यवसाय जारी रख सके।
बॉम्बे हाईकोर्ट
- केवल यह कहना कि “जांच चल रही है”, बैंक अकाउंट को लंबे समय तक फ्रीज़ रखने का सही कारण नहीं है।
- पुलिस को यह साबित करना होगा कि वह अकाउंट सीधे किसी अपराध से जुड़ा हुआ है।
- सिर्फ शक के आधार पर पूरा अकाउंट ब्लॉक करना गलत है, खासकर जब खाताधारक निर्दोष हो।
- अदालत ने माना कि बिना ठोस कारण किसी का पूरा अकाउंट बंद करना कानून के खिलाफ है।
मद्रास हाईकोर्ट
- पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर देना बहुत कठोर कदम है।
- अगर सिर्फ कुछ लेन-देन संदिग्ध हैं, तो केवल उतनी ही राशि को रोका जाए।
- पूरे अकाउंट को बंद करने की जरूरत नहीं होती।
इन हाईकोर्ट के फैसलों से यह साफ हुआ कि जांच जरूरी है, लेकिन साथ ही खाताधारक के अधिकारों और रोज़मर्रा की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी सोच के कारण सरकार को नई SOP लानी पड़ी, ताकि साइबर फ्रॉड की जांच भी हो और निर्दोष लोगों को बेवजह परेशानी भी न झेलनी पड़े।
अकाउंट फ्रीज़ होने पर आम आदमी क्या करे?
अगर आपका अकाउंट फ्रीज़ हो गया है, तो घबराने के बजाय ये कदम उठाएँ:
- बैंक से लिखित में फ्रीज़ का कारण मांगें
- पूछें कि किस एजेंसी के निर्देश पर अकाउंट रोका गया
- FIR या शिकायत संख्या प्राप्त करें
- साइबर सेल या IO को प्रतिनिधित्व दें
- आवश्यकता पड़ने पर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएँ
- यहीं पर एक अनुभवी वकील की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
अकाउंट अनफ्रीज़ कराने में वकील की भूमिका
अक्सर लोग सोचते हैं कि बैंक या पुलिस अपने-आप अकाउंट खोल देगी, लेकिन व्यवहार में ऐसा कम ही होता है।
एक वकील:
- SOP और हाईकोर्ट के फैसलों के आधार पर कानूनी नोटिस भेजता है
- पुलिस को याद दिलाता है कि अकाउंट फ्रीज़ कोई सज़ा नहीं है
- मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट में अकाउंट डी-फ्रीज़ याचिका दायर करता है
- यह साबित करता है कि खाताधारक आरोपी नहीं, बल्कि केवल ट्रांज़ैक्शन लिंक है
- कई मामलों में कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देकर आंशिक या पूर्ण अनफ्रीज़ का आदेश दिया है।
क्या नई SOP आम आदमी के लिए सच में गेम-चेंजर है?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई SOP आम नागरिकों के लिए एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव साबित हो सकती है। अब तक कई लोग बिना किसी गलती के महीनों तक अपने ही पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे, लेकिन इस SOP से ऐसी स्थितियों में काफी हद तक सुधार आने की उम्मीद है। इस SOP से:
- साइबर जांच प्रक्रिया ज्यादा जवाबदेह बनेगी, क्योंकि अब हर कार्रवाई का कारण बताना होगा।
- बैंकों की मनमानी पर रोक लगेगी, और वे बिना ठोस वजह के अकाउंट फ्रीज़ नहीं कर पाएंगे।
- निर्दोष खाताधारकों को अनावश्यक परेशानी से राहत मिलेगी, ताकि उनका रोज़मर्रा का जीवन प्रभावित न हो।
हालाँकि, इसका असली फायदा तभी मिलेगा जब लोग अपने कानूनी अधिकारों के बारे में जानेंगे, समय पर शिकायत करेंगे और जरूरत पड़ने पर कानूनी मदद लेंगे। जागरूक नागरिक ही इस SOP को ज़मीन पर सही तरीके से लागू करवा सकते हैं।
निष्कर्ष
बैंक अकाउंट का फ्रीज़ होना आज के समय में केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि आम आदमी की आजीविका से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। एक झटके में अकाउंट बंद हो जाना पूरे परिवार की आर्थिक व्यवस्था हिला सकता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि खाताधारक खुद को असहाय न समझे, बल्कि कानून द्वारा दिए गए विकल्पों का सही उपयोग करे।
नई SOP और हाईकोर्ट के फैसले यह संदेश देते हैं कि व्यवस्था अब धीरे-धीरे नागरिकों के पक्ष में संतुलन बनाने की ओर बढ़ रही है। यदि आप सजग हैं, दस्तावेज़ सुरक्षित रखते हैं और समय रहते उचित कदम उठाते हैं, तो किसी भी गलत या अत्यधिक कार्रवाई को चुनौती दी जा सकती है।
याद रखें—कानून केवल अपराधियों के लिए नहीं बना है, बल्कि ईमानदार नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी है। अपने अधिकारों को जानना और उन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करना ही सबसे बड़ी ताकत है।
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FAQs
1. क्या बैंक अकाउंट फ्रीज़ होने की सूचना लिखित रूप में देना बैंक के लिए अनिवार्य है?
हाँ। बैंक को लिखित रूप में बताना होता है कि अकाउंट किस कारण, किस तारीख से और किस एजेंसी के आदेश पर फ्रीज़ किया गया, ताकि खाताधारक अपने अधिकारों की रक्षा कर सके।
2. क्या केवल किसी तीसरे व्यक्ति से लेन-देन होने पर अकाउंट फ्रीज़ किया जा सकता है?
नहीं। केवल किसी से पैसा आने या जाने से अकाउंट फ्रीज़ नहीं किया जा सकता। पुलिस को यह साबित करना होगा कि अकाउंट सीधे साइबर फ्रॉड से जुड़ा है।
3. क्या सैलरी या पेंशन अकाउंट फ्रीज़ होने पर आवश्यक खर्च के लिए राहत मिल सकती है?
हाँ। कोर्ट से अनुरोध कर सैलरी, पेंशन या आवश्यक खर्चों के लिए आंशिक अनफ्रीज़ या सीमित निकासी की अनुमति ली जा सकती है।
4. अकाउंट फ्रीज़ होने पर सबसे पहले किस विभाग से संपर्क करना चाहिए?
सबसे पहले अपनी बैंक शाखा से फ्रीज़ का लिखित कारण लें, फिर साइबर सेल या संबंधित जांच अधिकारी से संपर्क कर स्थिति स्पष्ट करें।
5. क्या बार-बार अकाउंट फ्रीज़ होने पर मुआवज़े की मांग की जा सकती है?
हाँ। यदि बिना उचित कारण या नियमों के खिलाफ अकाउंट फ्रीज़ किया गया हो, तो कोर्ट में हर्जाने की मांग की जा सकती है।



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