इंटर रिलिजन मैरिज के बाद किडनैपिंग का केस दर्ज हो गया? अब क्या करें?

A kidnapping case was filed after an inter-religion marriage What should I do now

शादी दो लोगों को साथ जोड़ने के लिए होती है। लेकिन कई बार, खासकर जब शादी अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच होती है, तो मामला कानूनी विवाद में बदल जाता है। आज भी समाज के कई हिस्सों में इंटर-रिलिजन मैरिज को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। दो बालिग लोगों का अपना फैसला अचानक पुलिस कंप्लेंट, काउंटर चार्जेस और यहां तक कि किडनैपिंग के केस में बदल सकता है।

“किडनैपिंग” शब्द सुनते ही डर लगता है, क्योंकि यह एक गंभीर आपराधिक आरोप है। लोगों के मन में कई सवाल आते है कि पुलिस कभी भी गिरफ्तार कर सकती है, जेल जाना पड़ सकता है, नौकरी और भविष्य खराब हो सकता है, समाज में बदनामी होगी। लेकिन यह समझना जरूरी है कि भारतीय कानून दो बालिग लोगों को अपनी पसंद से शादी करने का पूरा अधिकार देता है। अगर शादी दोनों की मर्जी से हुई है, तो सिर्फ आरोप लग जाने से वह अपराध नहीं बन जाता।

ऐसी स्थिति में घबराने या भावनाओं में फैसला लेने की बजाय अपने कानूनी अधिकार समझना बहुत जरूरी है। सही जानकारी होने से आप खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप जानें कि कानून ऐसे मामलों को कैसे देखता है और अपने बचाव के लिए आपको कौन-कौन से सही कदम उठाने चाहिए।

क्या आप को कानूनी सलाह की जरूरत है ?

क्या इंटर रिलिजन मैरिज भारत में वैध है?

भारत में इंटर रिलिजन मैरिज पूरी तरह से कानूनी और वैध है। अगर दो बालिग व्यक्ति अलग-अलग धर्म से हैं और अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं, तो कानून उन्हें इसकी अनुमति देता है। इसके लिए धर्म बदलना जरूरी नहीं है।

कौन सा कानून लागू होता है? 

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत अलग-अलग धर्मों के लोग बिना धर्म परिवर्तन के शादी कर सकते हैं।:

  • इस कानून में दोनों की उम्र कानूनी होनी चाहिए (लड़का 21 वर्ष, लड़की 18 वर्ष),
  • दोनों की सहमति जरूरी है,
  • शादी रजिस्ट्रार के सामने तय प्रक्रिया के अनुसार की जाती है
  • यह एक सिविल मैरिज है, जो पूरी तरह कानून द्वारा मान्य होती है।

संवैधानिक अधिकार क्या कहते हैं? 

शाफिन जहां बनाम अशोकन के.एम. (2018) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अपनी पसंद से शादी करना अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।

मामले में एक बालिग महिला (हादिया) ने अपनी इच्छा से दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी की थी। परिवार ने इस शादी का विरोध किया और मामला कोर्ट तक पहुँचा। केरल हाई कोर्ट ने शादी को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

  • कोई भी बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुन सकता है।
  • परिवार या समाज को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है।
  • शादी का निर्णय व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है।

भारत के कानून में किडनैपिंग क्या है?

भारतीय न्याय संहिता की धारा 137 और 138 के तहत किडनैपिंग आमतौर पर दो स्थितियों में मानी जाती है:

  • जब किसी नाबालिग (लड़की 18 वर्ष से कम / लड़का 18 वर्ष से कम) को उसके कानूनी अभिभावक की अनुमति के बिना अपने साथ ले जाया जाए या बहलाकर ले जाया जाए।
  • जब किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के बिना जबरदस्ती कहीं ले जाया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?

  • अगर व्यक्ति नाबालिग है, तो उसकी सहमति भी मान्य नहीं मानी जाती।
  • अगर व्यक्ति बालिग है, तो उसकी स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई सहमति सबसे महत्वपूर्ण होती है।

अगर लड़की बालिग है तो कानून क्या कहता है? 

अगर लड़की 18 साल से ज्यादा उम्र की है, मानसिक रूप से पूरी तरह ठीक है और अपनी मर्जी से फैसला ले रही है, तो उसकी सहमति पूरी तरह कानूनी मानी जाती है। ऐसी स्थिति में अगर वह अपनी इच्छा से किसी के साथ जाती है या शादी करती है, तो इसे किडनैपिंग नहीं कहा जा सकता।

अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि एक बालिग महिला को अपने जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है। कोई भी परिवार या अन्य व्यक्ति उसकी मर्जी के खिलाफ उसे रोक नहीं सकता।

इंटर-रिलिजन मैरिज के बाद परिवार किडनैपिंग का केस क्यों दर्ज कराते हैं?

अक्सर देखा गया है कि जब दो अलग धर्म के बालिग लोग अपनी मर्जी से शादी कर लेते हैं, तो परिवार इस फैसले को स्वीकार नहीं कर पाता। ऐसे में कई बार गुस्से, डर या समाज के दबाव में आकर किडनैपिंग की FIR दर्ज करा दी जाती है।

इसे भी पढ़ें:  भारत में आपसी तलाक लेने के लिए कौन सा कानून है?

आम कारण क्या होते हैं?

  • इंटरफेथ शादी का विरोध कुछ परिवार धार्मिक या पारंपरिक मान्यताओं के कारण अलग धर्म में शादी को गलत मानते हैं।
  • समाज का दबाव रिश्तेदारों या समाज के तानों और बदनामी के डर से परिवार जल्दबाजी में कानूनी कदम उठा लेता है।
  • सामाजिक बदनामी का डर परिवार को लगता है कि उनकी इज्जत पर असर पड़ेगा, इसलिए वे मामले को “किडनैपिंग” का रूप दे देते हैं।
  • भावनात्मक प्रतिक्रिया कई बार माता-पिता सदमे या गुस्से में आकर सोच-समझकर फैसला नहीं लेते और तुरंत पुलिस में शिकायत कर देते हैं।
  • दंपति को अलग करने की कोशिश कुछ मामलों में FIR केवल इस उद्देश्य से दर्ज कराई जाती है कि लड़के पर दबाव बनाया जाए या लड़की को वापस घर लाया जाए।

किडनैपिंग का केस दर्ज होने पर क्या करें?

अगर इंटर-रिलिजन मैरिज के बाद किडनैपिंग की FIR दर्ज हो जाए, तो घबराने के बजाय सही कानूनी कदम तुरंत उठाना जरूरी है।

स्टेप 1 – उम्र का प्रमाण तैयार करें: 

सबसे पहले यह साबित करना जरूरी है कि लड़की बालिग है (18 वर्ष से अधिक)। इसके लिए ये दस्तावेज तुरंत तैयार रखें:

  • आधार कार्ड
  • जन्म प्रमाण पत्र
  • 10वीं की मार्कशीट

अगर लड़की बालिग है, तो उसकी सहमति कानूनी रूप से मान्य होगी और किडनैपिंग का आरोप कमजोर पड़ सकता है। इसलिए उम्र का प्रमाण सबसे महत्वपूर्ण पहला कदम है।

स्टेप 2 – शादी का प्रमाण रखें: 

अगर शादी हो चुकी है, तो उसका प्रमाण अपने पास रखें। जैसे:

यह दिखाने के लिए जरूरी है कि रिश्ता जबरदस्ती का नहीं बल्कि वैध और स्वेच्छा से हुआ है। शादी का प्रमाण केस में मजबूत आधार देता है।

स्टेप 3 – अनुभवी क्रिमिनल वकील नियुक्त करना बहुत जरूरी: 

किडनैपिंग जैसे गंभीर आरोपों में अनुभवी क्रिमिनल लॉयर को तुरंत हायर करना बेहद जरूरी है। एक अच्छा वकील:

  • FIR और धाराओं का सही विश्लेषण करेगा
  • पुलिस जांच के दौरान आपकी कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा
  • समय पर अग्रिम बेल की तैयारी करेगा
  • कोर्ट में मजबूत तरीके से आपका पक्ष रखेगा

शुरुआत में सही कानूनी सलाह मिलना पूरे केस की दिशा बदल सकता है।

स्टेप 4 – लड़की का स्वतंत्र बयान: 

यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। लड़की को मजिस्ट्रेट के सामने साफ और स्पष्ट रूप से यह कहना चाहिए कि:

  • वह अपनी मर्जी से गई है
  • उस पर कोई दबाव या जबरदस्ती नहीं है
  • उसने अपनी इच्छा से शादी की है

मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान अदालत में बहुत महत्व रखता है और किडनैपिंग के आरोप को खत्म करने में अहम भूमिका निभाता है।

स्टेप 5 – एंटीसिपेटरी बेल:

अगर गिरफ्तारी का खतरा हो, तो तुरंत सेशंस कोर्ट या हाई कोर्ट में एंटीसिपेटरी बेल के लिए आवेदन करें। यह कानूनी सुरक्षा देती है ताकि पुलिस आपको गिरफ्तार न कर सके। समय रहते अग्रिम बेल लेने से अनावश्यक हिरासत और मानसिक तनाव से बचा जा सकता है।

स्टेप 6 – हाई कोर्ट से प्रोटेक्शन पिटीशन: 

अगर परिवार से जान का खतरा या धमकी मिल रही हो, तो हाई कोर्ट में प्रोटेक्शन पिटीशन दायर की जा सकती है। कोर्ट पुलिस को निर्देश दे सकती है कि:

  • कपल्स की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए
  • किसी भी तरह की धमकी या हिंसा रोकी जाए

यह कदम खासकर तब जरूरी है जब परिवार या समाज से वास्तविक खतरा हो।

स्टेप 7 – FIR को रद्द कराने की प्रक्रिया

अगर लड़की बालिग है और उसने अपनी मर्जी से शादी की है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहित, 2023 की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट में FIR को रद्द कराने की पिटीशन दायर की जा सकती है। हाई कोर्ट, अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए, ऐसे मामलों में FIR को रद्द कर सकती है:

  • जहाँ कोई जबरदस्ती या अपराध साबित नहीं होता
  • दोनों बालिग हैं और सहमति से साथ हैं
  • मामला सिर्फ पारिवारिक नाराजगी का परिणाम है
  • FIR रद्द होने के बाद पूरा आपराधिक मामला खत्म हो सकता है।
इसे भी पढ़ें:  क्या गाड़ी से दुर्घटना होने पर मुआवजा मिलता है?

लड़की की उम्र का प्रमाण ज़रूरी क्यों है?

अगर लड़की 18 वर्ष से कम है तो स्थिति पूरी तरह अलग हो जाती है, क्योंकि कानून के अनुसार नाबालिग की सहमति मान्य नहीं मानी जाती। ऐसी स्थिति में प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस (POCSO) जैसे सख्त कानून लागू हो सकते हैं, जिनमें कठोर सजा का प्रावधान है। साथ ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) की अपहरण और किडनैपिंग से संबंधित धाराएँ भी लग सकती हैं। इन मामलों में बेल मिलना भी कठिन हो सकता है और कोर्ट ऐसे मामलों को बहुत गंभीरता से देखती है। इसलिए किसी भी इंटर-रिलिजन या प्रेम विवाह के मामले में सबसे पहले लड़की की सही उम्र का प्रमाण होना अत्यंत आवश्यक है।

क्या महिला का बयान केस बंद कर सकता है?

हाँ, अक्सर ऐसा होता है। अगर महिला बालिग है (18 वर्ष से अधिक) और वह मजिस्ट्रेट के सामने साफ-साफ यह कह देती है कि:

  • वह अपनी मर्जी से घर से गई थी
  • उसने अपनी पसंद से शादी की है
  • उस पर किसी प्रकार का दबाव, लालच या जबरदस्ती नहीं थी तो किडनैपिंग का आरोप कमजोर पड़ जाता है।

मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह स्वतंत्र और कानूनी रूप से रिकॉर्ड किया गया बयान माना जाता है। अगर महिला स्पष्ट रूप से स्वेच्छा बताती है, तो पुलिस की जांच की दिशा बदल सकती है और कोर्ट किडनैपिंग की धारा हटाने या केस खत्म करने पर विचार कर सकता है।

हालांकि, हर केस के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए केवल बयान ही नहीं, उम्र का प्रमाण और अन्य परिस्थितियाँ भी देखी जाती हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो महिला का स्पष्ट और स्वेच्छा वाला बयान ऐसे मामलों में सबसे मजबूत बचाव होता है।

ऐसे मामलों में पुलिस की भूमिका

  • दोनों को ट्रेस करती है,
  • महिला का बयान दर्ज करती है,
  • उसकी उम्र की जांच करती है,
  • यह देखती है कि सहमति थी या नहीं।

अगर महिला मजिस्ट्रेट या पुलिस के सामने स्पष्ट रूप से कह देती है कि वह अपनी मर्जी से गई थी और उसने अपनी पसंद से शादी की है, तो पुलिस जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है और किडनैपिंग का आरोप आगे नहीं बढ़ता।

अगर पुलिस दोनों को अलग करने की कोशिश करे तो क्या करें?

अगर पुलिस या परिवार के दबाव में दंपत्ति को अलग करने की कोशिश की जाती है, तो वे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

वे निम्नलिखित राहत मांग सकते हैं:

  • प्रोटेक्शन पिटीशन (सुरक्षा की मांग)
  • पुलिस को उचित दिशा-निर्देश देने का आदेश
  • FIR को रद्द (Quashing) करने की मांग

हाई कोर्ट अक्सर बालिग और अपनी मर्जी से शादी करने वाले जोड़ों की सुरक्षा करता है और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है।

क्या परिवार अतिरिक्त आरोप लगा सकता है?

कई मामलों में लड़की का परिवार किडनैपिंग के साथ-साथ कुछ और आरोप भी जोड़ देता है ताकि लड़के और उसके परिवार पर ज्यादा दबाव बनाया जा सके। कभी-कभी ये अतिरिक्त आरोप लगाए जाते हैं:

  1. ग़लत तरीके से रोककर रखना – परिवार यह कह सकता है कि लड़की को उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं बंद करके रखा गया। लेकिन अगर लड़की पुलिस या मजिस्ट्रेट के सामने साफ कह दे कि वह अपनी मर्जी से गई थी और उसे कहीं बंद नहीं किया गया था, तो यह आरोप कमजोर पड़ जाता है।
  2. मारपीट – परिवार यह भी आरोप लगा सकता है कि लड़की के साथ मारपीट या धमकी दी गई। ऐसे आरोप साबित करने के लिए मेडिकल रिपोर्ट या अन्य सबूत जरूरी होते हैं। बिना सबूत के सिर्फ आरोप लगाने से सजा नहीं हो जाती।
  3. धर्म परिवर्तन – इंटर-रिलिजन मैरिज में कई बार जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप भी लगा दिया जाता है। लेकिन अगर लड़की खुद कह दे कि उसने कोई भी फैसला अपनी मर्जी से लिया है और उस पर कोई दबाव नहीं था, तो ऐसे आरोप को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

यह समझना जरूरी है कि FIR में कई धाराएँ जोड़ देने से वे अपने आप साबित नहीं हो जातीं। हर आरोप को अलग-अलग सबूतों के साथ कोर्ट में साबित करना पड़ता है।

इसे भी पढ़ें:  विवाह के दौरान संपत्ति के अधिकार कैसे निर्धारित होते हैं?

अगर शादी रजिस्टर नहीं हुई है तो क्या होगा?

अगर शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि रिश्ता गैरकानूनी है। अगर लड़का और लड़की दोनों बालिग हैं (लड़की 18+ और लड़का 21+) और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो उनका लिव-इन रिलेशनशिप कानूनन मान्य है। भारतीय अदालतें साफ कह चुकी हैं कि दो बालिग लोग अपनी इच्छा से साथ रह सकते हैं, चाहे शादी रजिस्टर हुई हो या नहीं।

ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा महत्व सहमति का होता है, न कि रजिस्ट्रेशन का। अगर लड़की साफ तौर पर कहती है कि वह अपनी मर्जी से साथ रह रही है और उस पर कोई दबाव नहीं है, तो किडनैपिंग जैसे आरोप कमजोर पड़ जाते हैं।

लेकिन शादी का रजिस्ट्रेशन करवा लेना हमेशा सुरक्षित रहता है। मैरिज सर्टिफिकेट एक मजबूत कानूनी सबूत होता है।:

  • इससे रिश्ता कानूनी रूप से साबित करना आसान होता है
  • झूठे आरोपों से बचाव मजबूत होता है
  • जरूरत पड़ने पर पुलिस सुरक्षा लेना आसान होता है
  • भविष्य में कानूनी परेशानियाँ कम होती हैं

इसलिए, रजिस्ट्रेशन जरूरी तो नहीं है, लेकिन कानूनी सुरक्षा के लिए बहुत फायदेमंद है।

निष्कर्ष

इंटर-रिलिजन मैरिज के बाद अगर किडनैपिंग का केस लग जाए, तो स्वाभाविक है कि डर और घबराहट महसूस हो। लेकिन डर और कानून की सच्चाई अलग चीजें हैं। भारत का कानून साफ कहता है कि दो बालिग लोगों को अपनी पसंद से शादी करने और साथ रहने का पूरा अधिकार है। परिवार की नाराजगी या समाज का दबाव किसी स्वेच्छा से हुई शादी को अपराध नहीं बना देता।

ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात है – उम्र और सहमति। अगर दोनों बालिग हैं और रिश्ता अपनी मर्जी से है, तो कानून उनके साथ खड़ा होता है। बेल, कोर्ट से राहत और संवैधानिक अधिकार जैसे कई कानूनी उपाय उपलब्ध होते हैं।

जरूरी है कि घबराने के बजाय शांत रहें, सही दस्तावेज इकट्ठा करें और समय पर सही कानूनी सलाह लें। सही कदम उठाने से अनावश्यक परेशानियों से बचा जा सकता है। याद रखें, कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करता है। सही मार्गदर्शन और कानूनी प्रक्रिया के साथ आप ऐसी स्थिति का मजबूती से सामना कर सकते हैं।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. क्या किडनैपिंग का केस पासपोर्ट या सरकारी नौकरी पर असर डाल सकता है?

अगर किडनैपिंग की FIR लंबित है, तो पासपोर्ट वेरिफिकेशन या सरकारी नौकरी की जांच पर असर पड़ सकता है। लेकिन अगर केस झूठा साबित हो जाए और बाद में रद्द हो जाए, तो कानूनी तरीके से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

2. अगर महिला बाद में अपना बयान बदल दे तो क्या होगा?

अगर महिला पहले शादी के समर्थन में बयान दे और बाद में परिवार के दबाव में बयान बदल दे, तो कोर्ट पूरे मामले को ध्यान से देखती है। मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह बिना दबाव के दिया गया है।

3. क्या पुलिस FIR दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी कर सकती है?

किडनैपिंग एक कॉग्निजेबल ऑफेंस है, इसलिए पुलिस के पास गिरफ्तारी की शक्ति होती है। लेकिन गिरफ्तारी अपने आप नहीं होती। ऐसे मामलों में अदालतों ने कहा है कि पहले उम्र और सहमति की जांच करना जरूरी है, खासकर जब मामला बालिगों की शादी से जुड़ा हो।

4. क्या कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट से जांच रुक जाती है?

कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट बचाव के लिए बहुत मजबूत सबूत होता है, लेकिन पुलिस फिर भी महिला का बयान और उसकी सहमति की जांच कर सकती है। हालांकि, वैध शादी का प्रमाण किडनैपिंग के आरोप को काफी कमजोर कर देता है।

5. क्या पति लड़की के परिवार के खिलाफ शिकायत कर सकता है?

हाँ, अगर पति या दंपत्ति को धमकी, डराने-धमकाने या झूठे आरोपों का सामना करना पड़ रहा है, तो वे परिवार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कर सकते हैं। वे पुलिस सुरक्षा के लिए कोर्ट से आदेश भी ले सकते हैं। कानून उन्हें उत्पीड़न और धमकी से बचाने का अधिकार देता है।

Social Media