इंटर कास्ट मैरिज कैसे करें? जानिए पूरी कानूनी प्रक्रिया और नियम

How to conduct an inter-caste marriage Learn the complete legal process and rules.

प्यार किसी जाति, धर्म या समाज की दीवारें नहीं देखता। लेकिन भारत में जब कोई कपल अलग-अलग जाति में शादी करने का फैसला करता है, तो अक्सर उन्हें समाज का दबाव, परिवार का विरोध और कानून को लेकर गलत जानकारी का सामना करना पड़ता है। कई लोगों को यह गलतफहमी होती है कि इंटर-कास्ट मैरिज मुश्किल या गैरकानूनी है।

सच्चाई बहुत सरल है: भारत में इंटर-कास्ट मैरिज पूरी तरह से कानूनी है।

भारतीय संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है और भारतीय कानून ऐसे कपल्स को कानूनी और सुरक्षित तरीके से शादी करने की पूरी आज़ादी देता है, चाहे परिवार की सहमति हो या न हो। यह ब्लॉग आपको बताएगा कि इंटर-कास्ट मैरिज कैसे करें, आपके कानूनी विकल्प क्या हैं, और कानून आपकी सुरक्षा कैसे करता है।

क्या आप को कानूनी सलाह की जरूरत है ?

क्या भारत में इंटर-कास्ट मैरिज कानूनी है?

हाँ। भारत में Inter Caste Marriage पूरी तरह कानूनी है। भारतीय कानून और संविधान दोनों इसका समर्थन करते हैं।

संविधान क्या कहता है?

  • अनुच्छेद 14 – कानून की नज़र में सभी बराबर हैं।
  • अनुच्छेद 15 – जाति के आधार पर भेदभाव की मनाही।
  • अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, इसमें अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने का अधिकार भी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट का साफ़ कहना है कि शादी के लिए जीवनसाथी चुनना हर वयस्क व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसमें जाति कोई बाधा नहीं बन सकती।

इंटर-कास्ट मैरिज किस कानून के तहत होती है?

पर्सनल लॉ के तहत शादी

अगर दोनों पार्टनर एक ही धर्म के हैं, तो वे अपने धर्म के कानून के अनुसार शादी कर सकते हैं, जैसे:

इन कानूनों में जाति अलग होना कोई रोक नहीं है, बस धर्म एक होना चाहिए।

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत शादी

यह इंटर-कास्ट कपल्स के लिए सबसे सुरक्षित और ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका है।

  • धर्म बदलने की कोई ज़रूरत नहीं
  • जाति की कोई अहमियत नहीं
  • शादी पूरी तरह कानूनी रूप से रजिस्टर होती है
  • यह शादी पूरे भारत में मान्य होती है

अगर परिवार की सहमति न हो या जाति अलग-अलग हो, तो स्पेशल मैरिज एक्ट सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है।

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 क्यों सबसे अच्छा विकल्प है?

स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 खास तौर पर उन कपल्स के लिए बनाया गया है जो:

  • अलग–अलग जाति में शादी करना चाहते हैं।
  • अलग–अलग धर्म से हैं।
  • बिना किसी धार्मिक रस्म के कोर्ट मैरिज करना चाहते हैं।
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स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने की ज़रूरी शर्तें – स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 4

  • पुरुष की उम्र कम से कम 21 साल होनी चाहिए।
  • महिला की उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए।
  • दोनों अविवाहित होने चाहिए (या कानूनी रूप से तलाकशुदा) ।
  • दोनों मानसिक रूप से शादी की सहमति देने में सक्षम होने चाहिए।
  • दोनों आपस में निषिद्ध संबंधों (जैसे करीबी रिश्तेदार) में नहीं होने चाहिए।
  • जाति किसी भी तरह की शर्त नहीं है।

इंटर-कास्ट मैरिज करने की कानूनी प्रक्रिया क्या है?

स्टेप 1: शादी का नोटिस दें – शादी रजिस्ट्रेशन के लिए सबसे पहला कदम होता है नोटिस देना। किसी भी एक पक्ष को लिखित नोटिस देना जरूरी है, जैसा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 5 में कहा गया है। नोटिस में दोनों पक्षों की शादी की मंशा बतानी होती है और इसे शादी से 30 दिन पहले मैरिज रजिस्ट्रार को जमा करना होता है।

स्टेप 2: नोटिस प्रकाशित करना – मैरिज रजिस्ट्रार नोटिस को अपने ऑफिस में किसी स्पष्ट स्थान पर लगाता है ताकि सभी लोग देख सकें। मूल नोटिस अपनी नोटिस बुक में रखा जाता है।

स्टेप 3: शादी पर आपत्ति – नोटिस के 30 दिन के भीतर कोई भी व्यक्ति शादी पर आपत्ति दर्ज कर सकता है। वैध आपत्ति में शामिल हैं: नाबालिग शादी, पहले से शादी होना, निषिद्ध रिश्ते में शादी, या शादी बिना सहमति/धोखाधड़ी से होना।

स्टेप 4: पार्टियों और गवाहों की घोषणा – अगर कोई आपत्ति नहीं है, तो दोनों पार्टियों को और कम से कम 3 गवाहों के साथ रजिस्ट्रेशन के समय मौजूद होना होता है। गवाह और पार्टियाँ घोषणा करते हैं कि वे अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं। यह घोषणा फॉर्म मैरिज रजिस्ट्रार के सामने साइन किया जाता है।

स्टेप 5: शादी का प्रमाण-पत्र – शादी संपन्न होने के बाद रजिस्ट्रार मैरिज सर्टिफिकेट में शादी का विवरण दर्ज करता है, जैसा कि स्पेशल मैरिज एक्ट के Schedule IV में तय है। प्रमाण-पत्र आमतौर पर 15–30 दिन में जारी हो जाता है।

आपत्ति आने पर क्या होता है?

अगर कोई आपत्ति दर्ज कराता है, तो मैरिज रजिस्ट्रार उसे सत्यापित करता है। अगर आपत्ति गलत पाई जाती है, तो शादी आगे बढ़ सकती है। अगर आपत्ति सही पाई जाती है, तो शादी नहीं हो सकती। रजिस्ट्रार द्वारा रजिस्ट्रेशन से इंकार करने पर आप 30 दिन के भीतर जिला कोर्ट में अपील कर सकते हैं। कोर्ट अगर आपत्ति को अमान्य मानता है, तो मैरिज रजिस्ट्रार को शादी रजिस्टर करने का आदेश देगा।

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क्या माता-पिता की अनुमति जरूरी है?

नहीं। दोनों पक्ष अपनी मर्जी से शादी कर सकते हैं। माता-पिता की सहमति जरूरी नहीं है। हालांकि, वे नोटिस अवधि में आपत्ति दर्ज कर सकते हैं।

इंटर-कास्ट मैरिज करने लिए कौन से डाक्यूमेंट्स ज़रूरी है?

  • दोनों पार्टियों का पहचान और पता प्रमाण
  • दोनों की 3-4 पासपोर्ट साइज फोटो
  • उम्र प्रमाण जैसे जन्म प्रमाण-पत्र या 10वीं की मार्कशीट
  • 30 दिन का नोटिस ऑफ इंटेंडेड मैरिज
  • रजिस्ट्रेशन के समय कम से कम 3-4 गवाहों की पहचान प्रमाण के साथ उपस्थिति
  • यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और सुरक्षित है, और इससे शादी पूरे भारत में मान्य होती है।

अगर परिवार वाले शादी करने से धमकाए या परेशान करे तो क्या करें?

  • पुलिस सुरक्षा (स्थानीय पुलिस स्टेशन या SP ऑफिस)
  • हाई कोर्ट में सुरक्षा के लिए पिटीशन दायर करना
  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा
  • भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक धमकी पर कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इंटर-कास्ट शादी करने वाले कपल्स को ‘सम्मान हत्या’ या हिंसा से बचाने के लिए सरकारी अधिकारी जिम्मेदार हैं।

क्या शादी से पहले कपल्स साथ रह सकते हैं?

शादी से पहले कपल्स साथ रह सकते हैं। इसे “लाइव-इन रिलेशनशिप” कहा जाता है और भारतीय न्यायालय इसे कानूनी रूप से मान्यता देते हैं।

कानूनी सुरक्षा:

  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार लागू होता है।
  • यह अवैध नहीं है। कपल्स की सहमति से साथ रहना कानून के खिलाफ नहीं माना जाता।
  • पुलिस या कोई अन्य व्यक्ति कानूनी रूप से सहमति देने वाले वयस्कों को परेशान नहीं कर सकता।
  • कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि केवल प्रेम या साथ रहने के कारण किसी को धमकाना, हानि पहुँचाना या सज़ा देना कानूनी अपराध है।

इसका मतलब है कि सहमति से संबंध रखने वाले जोड़े सुरक्षित हैं और कानून उन्हें संरक्षित करता है।

इंटर-कास्ट शादी के बाद कपल्स के अधिकार

इंटर-कास्ट शादी के बाद पति और पत्नी दोनों को कानून के अनुसार समान अधिकार मिलते हैं। इसका मतलब है कि दोनों को शादी में निर्णय लेने, संपत्ति में हिस्सेदारी और पारिवारिक मामलों में बराबरी का दर्जा है।

मुख्य अधिकार:

  • समान वैवाहिक अधिकार: पति-पत्नी दोनों को घर, संपत्ति और परिवारिक निर्णय में बराबरी का अधिकार।
  • मेंटेनेंस का अधिकार: पत्नी या पति, जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे से रख-रखाव की मांग कर सकते हैं।
  • उत्तराधिकार और संपत्ति का अधिकार: किसी की संपत्ति या वारिस के मामले में दोनों बराबर हकदार हैं।
  • हैरासमेंट से सुरक्षा: परिवार या समाज की तरफ से धमकाने या परेशान करने पर कानूनी सुरक्षा उपलब्ध है।
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निष्कर्ष

इंटर-कास्ट शादी कोई विद्रोह नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का कानूनी अधिकार है। भारतीय कानून उन वयस्कों के साथ खड़ा है जो अपने जीवनसाथी का चुनाव चुनाव, सम्मान और सहमति के आधार पर करते हैं, न कि जाति के आधार पर।

हालांकि समाज में विरोध या चुनौतियाँ हो सकती हैं, लेकिन कानूनी रास्ता स्पष्ट, मजबूत और सुरक्षित है। सही जानकारी और कानूनी मदद के साथ, जोड़े गरिमा, सुरक्षा और पूरी कानूनी मान्यता के साथ शादी कर सकते हैं। कानून यह नहीं देखता कि आप किस जाति से हैं, यह केवल यह देखता है कि आप दोनों स्वतंत्र और अपनी मर्जी से एक-दूसरे को चुनते हैं।

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FAQs

1. क्या इंटर-कास्ट शादी के लिए धर्म बदलना जरूरी है?

नहीं। जोड़े को धर्म बदलने की जरूरत नहीं है। स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत इंटर-कास्ट और इंटर-रिलिजन शादी बिना धर्म बदलने कानूनी रूप से वैध होती है।

2. स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत कोर्ट मैरिज में कितना समय लगता है?

कानूनी प्रक्रिया में आमतौर पर 30 – 45 दिन लगते हैं, जिसमें 30 दिन की नोटिस अवधि शामिल है। कोई वैध आपत्ति न आने पर शादी जल्दी पूरी हो सकती है।

3. कानूनी वैधता के लिए हिंदू या मुस्लिम रिवाज करना जरूरी है?

नहीं। धार्मिक रीति-रिवाज वैकल्पिक हैं। शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर होने के बाद कानूनी रूप से मान्य हो जाती है।

4. अगर किसी ने झूठी आपत्ति दर्ज कराई तो क्या करें?

झूठी आपत्ति को कोर्ट या मैरिज ऑफिसर के सामने चुनौती दी जा सकती है। केवल धारा 4 के कानूनी उल्लंघन वाली आपत्तियों को माना जाता है; जाति या व्यक्तिगत आपत्तियों का कोई कानूनी महत्व नहीं है।

5. इंटर-कास्ट शादी के बच्चों को संपत्ति का हक मिलता है?

हाँ। इंटर-कास्ट शादी के बच्चों को पूरा वारिसाना हक होता है, जैसे किसी भी अन्य बच्चे को, चाहे माता-पिता की जाति या धर्म कुछ भी हो।

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