चेक बाउंस का केस कैसे लड़ें?

How to fight a cheque bounce case

चेक बाउंस क्या होता है?

जब कोई व्यक्ति किसी को भुगतान के लिए चेक देता है, और उस चेक को बैंक में प्रस्तुत करने पर बैंक उसे पर्याप्त राशि के अभाव में डिशॉनर (dishonour) कर देता है, तो उसे चेक बाउंस कहा जाता है। इसे बैंकिंग और कानून की भाषा में चेक का अनादर भी कहते हैं।

चेक रिटर्न मेमो: पहला दस्तावेज़

जब चेक बाउंस होता है, तो बैंक एक चेक रिटर्न मेमो जारी करता है, जिसमें बाउंस का कारण लिखा होता है। यह मेमो केस की कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत का आधार बनता है।

महत्वपूर्ण: यदि चेक एक बार बाउंस हुआ है, तो जारीकर्ता के पास 90 दिन तक का समय होता है दोबारा चेक देने का। अगर दूसरी बार भी चेक बाउंस हो जाए, तो कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।

क्या चेक बाउंस आपराधिक मामला है?

हां, चेक बाउंस एक आपराधिक मामला है। इसे नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत देखा जाता है। यह कानून कहता है कि:

  • यदि भुगतान न किया जाए,
  • और समय पर जवाब न मिले,
  • तो दोषी को 2 साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

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चेक बाउंस केस कैसे लड़ें? (स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया)

लीगल नोटिस भेजें

  • चेक बाउंस होने के 30 दिनों के भीतर रजिस्टर्ड पोस्ट द्वारा नोटिस भेजना जरूरी है।
  • नोटिस में:
    • बाउंस की तारीख,
    • कारण,
    • भुगतान की मांग
    • और 15 दिन का समय देना जरूरी है।

अगर आप यह नोटिस समय पर नहीं भेजते, तो आपका केस अदालत में मान्य नहीं रहेगा।

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कोर्ट में केस दाखिल करें (धारा 138 N.I. Act)

  • अगर नोटिस के बाद भी 15 दिन में भुगतान नहीं होता:
    • तब पीड़ित व्यक्ति 30 दिनों के भीतर कोर्ट में परिवाद दाखिल कर सकता है।
  • इस दौरान आपको:
    • चेक की कॉपी
    • चेक रिटर्न मेमो
    • नोटिस और उसकी रसीद
    • डिफॉल्ट का ब्यौरा संलग्न करना होगा।

कोर्ट फीस क्या होती है?

कोर्ट में केस दाखिल करते समय शपथ पत्र के साथ कोर्ट फीस भी देनी होती है। इसका स्लैब इस प्रकार है:

राशि का दायराकोर्ट फीस
₹1 लाख तक5%
₹1–5 लाख4%
₹5 लाख से अधिक3%

क्या चेक बाउंस केस में समझौता संभव है?

हां, चेक बाउंस एक समझौता योग्य अपराध (compoundable offence) है। अगर दोनों पक्ष आपसी सहमति से सुलह करना चाहें, तो न्यायालय समझौते को स्वीकार कर सकता है और मामला समाप्त हो सकता है।

नया संशोधन: धारा 143A (एनआई एक्ट)

2018 में एक नया प्रावधान धारा 143A जोड़ा गया, जिसके तहत:

  • कोर्ट आरोपी को निर्देश दे सकता है कि वह शिकायतकर्ता को 20% राशि का अंतरिम भुगतान करे।
  • यह आदेश केस की सुनवाई के प्रारंभिक चरण में भी पास किया जा सकता है।

महत्वपूर्ण बातें जो ध्यान में रखें

  • केस FIR के बजाय कोर्ट में शिकायत (complaint) के माध्यम से दाखिल होता है।
  • यह एक समयबद्ध प्रक्रिया है — समय सीमा चूकने पर केस खारिज हो सकता है।
  • ईमेल या व्हाट्सएप पर भेजा गया नोटिस मान्य हो सकता है, लेकिन रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेजा गया नोटिस कानूनी रूप से अधिक प्रभावशाली होता है।
  • वकील से परामर्श लेना हमेशा सुरक्षित और रणनीतिक होता है।
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निष्कर्ष

चेक बाउंस के मामलों में तुरंत और सही कदम उठाना ज़रूरी है। समय पर लीगल नोटिस भेजना, कोर्ट फीस का भुगतान, उचित दस्तावेज़ और वकील की मदद से आप अपने केस को मज़बूती से अदालत में रख सकते हैं। साथ ही, कानून आपको समझौते का भी अवसर देता है जिससे समय और संसाधन बचाए जा सकते हैं।

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FAQs

1. चेक बाउंस होने के कितने दिन के भीतर केस फाइल कर सकते हैं?

45 दिनों के भीतर (30 दिन में नोटिस + 15 दिन की प्रतिक्रिया अवधि के बाद 30 दिन में कोर्ट में परिवाद)

2. क्या व्हाट्सएप पर भेजा गया नोटिस वैध होता है?

हां, कई मामलों में कोर्ट ने डिजिटल माध्यम से भेजे गए नोटिस को स्वीकार किया है।

3. क्या आरोपी जेल जा सकता है?

हां, दोषी पाए जाने पर अधिकतम 2 साल की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

4. क्या केस सिर्फ वही व्यक्ति कर सकता है जिसके नाम पर चेक है?

आमतौर पर हां, लेकिन कुछ मामलों में अधिकार प्राप्त प्रतिनिधि भी केस दायर कर सकता है।

5. क्या समझौता करने पर केस खत्म हो जाता है?

हां, यदि दोनों पक्ष समझौता करें और कोर्ट इसे स्वीकार करे तो मामला समाप्त हो सकता है।

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