दिल्ली में विवादित तलाक कैसे होता है? पूरी कानूनी प्रक्रिया, समय और खर्च

contested divorce in Delhi

कभी-कभी शादी में ऐसे हालात बन जाते हैं जहाँ छोटी-छोटी बहसें रोज़मर्रा की लड़ाई बन जाती हैं, भरोसा टूटने लगता है और साथ रहना मानसिक रूप से भारी लगने लगता है। दिल्ली जैसे बड़े और तेज़ रफ्तार शहर में यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि काम, परिवार और सामाजिक दबाव साथ-साथ चलते हैं।

जब समझौते की हर कोशिश नाकाम हो जाए और एक पक्ष तलाक के लिए तैयार न हो, तब contested divorce in Delhi ही एकमात्र कानूनी रास्ता बचता है। यह प्रक्रिया आसान नहीं होती, लेकिन सही जानकारी, ठोस सबूत और अनुभवी फैमिली वकील के साथ इसे व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।

कई क्लाइंट का सबसे बड़ा डर होता है “क्या दिल्ली में मुझे तलाक मिलेगा या केस सालों तक चलेगा?” हकीकत यह है कि विवादित तलाक में समय और धैर्य लगता है, लेकिन सही कानूनी रणनीति आपके अधिकारों और भविष्य को सुरक्षित रख सकती है।

क्या आप को कानूनी सलाह की जरूरत है ?

विवादित तलाक क्या है?

दिल्ली में विवादित तलाक (Contested Divorce) तब माना जाता है जब:

  • पति या पत्नी में से कोई एक फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी देता है,
  • दूसरा पक्ष तलाक से सहमत नहीं होता या आरोपों को चुनौती देता है, या
  • मेंटेनेंस, बच्चों की कस्टडी या संपत्ति के मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाती।

ऐसे मामलों में दिल्ली की फैमिली कोर्ट कानून, सबूत और निष्पक्षता के आधार पर यह तय करती है कि तलाक दिया जाए या नहीं।

भारत में विवादित तलाक अलग-अलग धर्म और शादी के प्रकार के अनुसार अलग-अलग कानूनों के तहत आता है। मुख्य कानून इस प्रकार हैं:

  • हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 – हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के लोगों के लिए।
  • स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 – अंतरधार्मिक मैरिज या कोर्ट में रजिस्ट्रेशन शादी के लिए।
  • मुस्लिम पर्सनल लॉ – मुस्लिम मैरिज और तलाक के लिए।
  • क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 – ईसाई मैरिज के लिए।
  • पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट, 1936 – पारसी मैरिज के लिए।

कौन सा कानून लागू होगा, यह तय होता है:

  1. पति-पत्नी का धर्म
  2. शादी किस प्रकार हुई (धार्मिक या कोर्ट में रजिस्ट्रेशन)
  3. विवादित तलाक की स्थिति

हर कानून में तलाक के आधार, प्रक्रिया और समय-सीमा अलग होती है, लेकिन सभी का उद्देश्य समान है, विवादित शादी को कानूनी रूप से समाप्त करना।

दिल्ली में विवादित तलाक के कानूनी आधार

दिल्ली फैमिली कोर्ट में विवादित तलाक तभी लिया जा सकता है जब पति या पत्नी में से कोई एक तलाक देने के लिए तैयार न हो। हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(1) के तहत तलाक के कानूनी आधार इस प्रकार हैं:

  • व्यभिचार (Adultery) – धारा 13(1)(i) अगर पति या पत्नी का विवाह के बाहर कोई शारीरिक संबंध है, तो दूसरा पक्ष तलाक मांग सकता है। पहले व्यभिचार अपराध माना जाता था, अब केवल तलाक का कानूनी आधार है।
  • क्रूरता (Cruelty) – धारा 13(1) (ia) अगर पति या पत्नी द्वारा लगातार धमकी, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना, घरेलू हिंसा या झूठे आरोप लगाए जाएँ।
  • परित्याग (Desertion) – धारा 13(1) (ib) अगर आपका जीवनसाथी बिना कारण और आपकी सहमति के लगातार 2 साल से आपको छोड़कर चला गया है।
  • धर्म परिवर्तन (Conversion of Religion) – धारा 13(1)(ii) अगर आपके पति या पत्नी ने आपकी सहमति के बिना धर्म बदल लिया है।
  • मानसिक रोग या अस्वस्थ मस्तिष्क (Mental Disorder/Unsound Mind) – धारा 13(1)(iii) अगर आपका जीवनसाथी गंभीर मानसिक रोग से ग्रसित है या अस्वस्थ मस्तिष्क वाला है और इससे शादी जीवन असंभव हो गया है।
  • संक्रामक यौन रोग (Venereal Disease) – धारा 13(1)(v) अगर पति या पत्नी किसी गंभीर और संक्रामक यौन रोग से पीड़ित है, जो आपके स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
  • संसार त्याग (Renunciation of the World) – धारा 13(1)(vi) अगर आपका जीवनसाथी संन्यास ले लेता है या किसी धार्मिक आदेश में शामिल होकर सभी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ छोड़ देता हैं।
  • सात साल तक अज्ञात (Not Heard Alive for Seven Years) – धारा 13(1)(vii) अगर सात साल तक आपके जीवनसाथी के जीवित होने की कोई खबर नहीं मिली, तो कोर्ट तलाक दे सकती है।
इसे भी पढ़ें:  NRI प्रॉपर्टी फ्रॉड के सबसे आम 10 तरीके – कैसे बचें और क्या कानूनी उपाय हैं?

विवादित तलाक के लिए कौन-कौन से दस्तावेज़ चाहिए?

  • मैरिज सर्टिफिकेट – यह सबसे ज़रूरी दस्तावेज़ है, जिससे यह साबित होता है कि शादी कानूनी रूप से हुई है।
  • पति-पत्नी का पहचान पत्र – जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड या पासपोर्ट, ताकि दोनों की पहचान स्पष्ट हो सके।
  • पता प्रमाण – राशन कार्ड, वोटर आईडी, बिजली बिल या किरायानामा, जिससे यह तय होता है कि केस किस फैमिली कोर्ट में फाइल होगा।
  • पासपोर्ट साइज फोटो – दोनों पति-पत्नी की फोटो कोर्ट रिकॉर्ड के लिए लगती है।
  • आय से जुड़े दस्तावेज़ – सैलरी स्लिप, इनकम टैक्स रिटर्न आदि, ताकि मेंटेनेंस, एलिमनी और संपत्ति का फैसला हो सके।
  • सबूत (एविडेंस) – अगर तलाक क्रूरता या अवैध संबंध के आधार पर है, तो चैट, मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान जैसे सबूत देने होते हैं।
  • बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र – अगर बच्चे हैं, तो कस्टडी तय करने के लिए यह दस्तावेज़ ज़रूरी होता है।

दिल्ली फैमिली कोर्ट में विवादित तलाक की पूरी प्रक्रिया क्या है?

स्टेप 1: तलाक की अर्जी दाखिल करना पति या पत्नी (पिटिशनर) फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करता है। इस अर्जी में शामिल होते हैं:

  • शादी का विवरण
  • तलाक के लिए कानूनी आधार
  • मेंटेनेंस, बच्चे की कस्टडी और संपत्ति संबंधी दावे

विवादित तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले आपको एक अनुभवी वकील को हायर करना चाहिए। यह वकील आपको सही मार्गदर्शन देगा और तलाक की पूरी कानूनी प्रक्रिया में हर कदम पर मदद करेगा।

स्टेप 2: अदालत द्वारा नोटिस भेजना कोर्ट दूसरी पार्टी को नोटिस (समन) भेजती है, ताकि अगली सुनवाई में वे अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।

स्टेप 3: उत्तर / लिखित जवाब समन मिलने के बाद, दूसरी पार्टी अदालत में अपना लिखित जवाब देती है। इसमें वे अपने पक्ष और अपनी शिकायतें (काउंटर क्लेम) भी पेश कर सकते हैं।

स्टेप 4: मेडिएशन या काउंसलिंग कभी-कभी कोर्ट दोनों पक्षों को सुलह कराने के लिए मेडिएशन या काउंसलिंग का आदेश देती है। इसमें एक तटस्थ मध्यस्थ मदद करता है ताकि दोनों आपसी समझौते पर पहुँच सकें। अगर यह सफल नहीं होता, तो मामला आगे बढ़ता है।

स्टेप 5: मुख्य मुद्दों का तय होना कोर्ट तय करती है कि कौन-कौन से मुख्य मुद्दे अदालत में साबित करने हैं।

स्टेप 6: सबूत पेश करना दोनों पक्ष अपने दावों का समर्थन करने के लिए सबूत पेश करते हैं। इसमें दस्तावेज़, गवाहों के बयान और अन्य प्रमाण शामिल होते हैं। यह प्रक्रिया समय लेने वाली होती है।

स्टेप 7: अंतिम दलीलें सभी सबूतों के बाद दोनों पक्ष अपनी अंतिम दलीलें पेश करते हैं। कोर्ट सब कुछ देखकर फैसला करती है कि तलाक दिया जाए या नहीं।

इसे भी पढ़ें:  ये 5 ऐप करती हैं महिलाओं को सुरक्षित

स्टेप 8: अदालत का फैसला अंत में कोर्ट तलाक की डिक्री पास करती है। पति और पत्नी दोनों इसे साइन करते हैं और तलाक कानूनी रूप से मान्य हो जाता है।

यह समझना बहुत ज़रूरी है कि तलाक की डिक्री पाने के लिए सही दस्तावेज़, धैर्य और मजबूत कानूनी रणनीति की जरूरत होती है। इसलिए एक अनुभवी फैमिली वकील की मदद लेना बेहद जरूरी होता है, जो हर चरण पर आपके अधिकारों की रक्षा करे और आपको सही मार्गदर्शन दे।

अगर आपका पति या पत्नी कोर्ट का सम्मन लेने से मना करता है या बार-बार बचने की कोशिश करता है, तो ऐसी स्थिति में कोर्ट एकतरफा (एक्स-पार्टी) फैसला दे सकती है। इसका मतलब यह है कि कोर्ट दूसरे पक्ष की मौजूदगी के बिना, सिर्फ आपके दिए गए सबूतों के आधार पर केस का फैसला कर सकती है।

दिल्ली में विवादित तलाक में कितना समय और खर्च लगता है?

विवादित तलाक आमतौर पर लंबा चलता है, क्योंकि इसमें कई चरण होते हैं। तलाक की अर्जी दाखिल करने और सामने वाले को सम्मन मिलने में लगभग 1 से 3 महीने लग सकते हैं। इसके बाद जवाब और काउंटर क्लेम आने में 2 से 6 महीने लगते हैं। सबसे ज़्यादा समय सबूतों (एविडेंस) के चरण में लगता है, जो 6 महीने से लेकर 2 साल तक चल सकता है। इसके बाद अंतिम बहस और जजमेंट आने में 1 से 2 साल और लग सकते हैं। कुल मिलाकर, विवादित तलाक में आमतौर पर 2 से 5 साल लग जाते हैं, और अगर अपील हो जाए तो समय और बढ़ सकता है।

विवादित तलाक का खर्च केस की प्रकृति पर निर्भर करता है। कोर्ट फीस आमतौर पर बहुत ज़्यादा नहीं होती, लेकिन अगर प्रॉपर्टी या बड़े दावे जुड़े हों तो फीस बढ़ सकती है। वकील की फीस लगभग ₹50,000 से ₹2,00,000 या उससे ज़्यादा भी हो सकती है, जो केस की जटिलता, शहर और वकील के अनुभव पर निर्भर करती है। इसके अलावा कुछ अन्य खर्च भी होते हैं, जैसे दस्तावेज़ बनवाना, नोटरी, कोर्ट आने-जाने का खर्च और गवाहों से जुड़ा खर्च।

मेंटेनेंस, एलिमनी और बच्चे की कस्टडी

  • मेंटेनेंस: तलाक का केस चलते समय कोर्ट ज़रूरत पड़ने पर अस्थायी मेंटेनेंस दे सकती है, ताकि खर्च चल सके। केस खत्म होने पर कोर्ट अंतिम मेंटेनेंस या एकमुश्त एलिमनी तय करती है। यह राशि पति की आय, पत्नी की ज़रूरत और जीवन स्तर देखकर तय की जाती है।
  • बच्चे की कस्टडी: कोर्ट के लिए बच्चे की भलाई सबसे ज़रूरी होती है। इसी आधार पर यह तय किया जाता है कि बच्चा किसके साथ रहेगा। कोर्ट फिजिकल कस्टडी, जॉइंट कस्टडी या मिलने-जुलने (विज़िटेशन) का अधिकार भी दे सकती है।
  • प्रॉपर्टी और स्त्रीधन: अगर पति-पत्नी की कोई साझा संपत्ति है, तो कोर्ट उसका न्यायसंगत बंटवारा कर सकती है। महिला का स्त्रीधन पूरी तरह सुरक्षित रहता है और उस पर उसका पूरा अधिकार होता है।

क्या विवादित तलाक को आपसी सहमति के तलाक में बदला जा सकता है?

अगर केस के दौरान दोनों पति-पत्नी आपस में सहमत हो जाते हैं और समझौता कर लेते हैं, तो विवादित तलाक को आपसी सहमति से तलाक में बदला जा सकता है। इससे समय, खर्च और मानसिक तनाव तीनों कम हो जाते हैं और मामला जल्दी खत्म हो जाता है।

विवादित तलाक में आम समस्याएँ

  • लंबी कानूनी प्रक्रिया: विवादित तलाक में सुनवाई, सबूत और गवाहों के कारण केस कई साल तक चल सकता है।
  • मानसिक तनाव और पारिवारिक दबाव: लगातार कोर्ट जाना, सवाल-जवाब और परिवार का दबाव व्यक्ति को भावनात्मक रूप से थका देता है।
  • आरोप साबित करना मुश्किल: क्रूरता, धोखा या अन्य आरोपों को साबित करने के लिए ठोस सबूत देना आसान नहीं होता।
  • ज़्यादा खर्च: वकील की फीस, बार-बार कोर्ट जाना, दस्तावेज़ और गवाहों पर काफी पैसा खर्च होता है।
इसे भी पढ़ें:  बिज़नेस डिस्प्यूट को कैसे सुलझाएं? जानिए आर्बिट्रेशन के ज़रिए तेज़ और प्रभावी समाधान

विवादित तलाक के फायदे और नुकसान

फायदे:
  • अगर एक पक्ष तलाक के लिए तैयार नहीं है, तब भी कोर्ट के ज़रिए तलाक मिल सकता है।
  • कोर्ट संपत्ति, मेंटेनेंस और बच्चे की कस्टडी पर निष्पक्ष फैसला करती है।
  • आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष के अधिकारों की कानूनी सुरक्षा होती है।
नुकसान:
  • यह प्रक्रिया महँगी और बहुत समय लेने वाली होती है।
  • मानसिक रूप से काफी थकाने वाली होती है।
  • कई बार कोर्ट का फैसला दोनों पक्षों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाता।

निष्कर्ष

जब शादी इस मोड़ पर आ जाती है कि कानूनी रास्ता अपनाना ज़रूरी हो जाए, तब असली लड़ाई केस जीतने की नहीं, बल्कि अपनी शांति, सम्मान और भविष्य को सुरक्षित रखने की होती है। कोर्ट की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, भावनाएँ भारी हो सकती हैं और अनिश्चितता बनी रहती है, लेकिन सही मार्गदर्शन के साथ उठाया गया हर कदम आपको स्थिरता की ओर ले जाता है।

सबसे ज़रूरी है सही जानकारी के साथ फैसले लेना, अपने अधिकारों के लिए शांत मन से खड़े रहना और घबराहट की जगह धैर्य रखना। सही कानूनी रणनीति और वास्तविक उम्मीदों के साथ, यह कठिन दौर भी ज़िंदगी का एक नया मोड़ बन सकता है, जो आपको मानसिक सुकून, आर्थिक सुरक्षा और आत्मविश्वास के साथ नई शुरुआत करने का मौका देता है।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. क्या विवादित तलाक में व्हाट्सएप मैसेज या ईमेल सबूत बन सकते हैं?

हाँ। व्हाट्सएप चैट, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड और फोटो जैसे डिजिटल सबूत कोर्ट में माने जा सकते हैं, बशर्ते वे कानूनी तरीके से प्राप्त किए गए हों और सबूत कानून के अनुसार सही तरह से पेश किए जाएँ।

2. अगर एक पक्ष जानबूझकर केस में देरी करे तो क्या होता है?

अगर कोई पति या पत्नी बार-बार तारीख टालता है या सहयोग नहीं करता, तो कोर्ट सख्त कदम उठा सकती है। इसमें जुर्माना लगाना, सबूत देने का मौका बंद करना या एकतरफा फैसला देना शामिल हो सकता है।

3. क्या विवादित तलाक बीच में ही आपसी समझौते से खत्म किया जा सकता है?

हाँ। केस किसी भी स्टेज पर हो, अगर दोनों पक्ष आपस में समझौता कर लें, तो कोर्ट उसे रिकॉर्ड कर सकती है। इससे समय, खर्च और मानसिक तनाव तीनों कम हो जाते हैं।

4. लंबे चलने वाले विवादित तलाक में मेंटेनेंस कैसे तय होती है?

कोर्ट केस के दौरान अंतरिम मेंटेनेंस तय करती है। इसमें दोनों की आय, जीवनशैली, जिम्मेदारियाँ और खर्च को ध्यान में रखा जाता है, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।

5. क्या विवादित तलाक का फैसला आते ही दोबारा शादी कर सकते हैं?

नहीं। दोबारा शादी तभी की जा सकती है जब अपील की समय-सीमा पूरी हो जाए और कोई अपील दाखिल न की गई हो। तब ही तलाक कानूनी रूप से अंतिम माना जाता है।

Social Media