जब शादी में लगातार तनाव, झगड़े, विश्वास की कमी या भावनात्मक दूरी बढ़ जाती है, तब कई पति-पत्नी यह महसूस करने लगते हैं कि अब साथ रहना संभव नहीं है। लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहर में लोग कोर्ट-कचहरी, लंबी तारीखों और भारी खर्च से डरकर तलाक का फैसला टालते रहते हैं।
ऐसे में दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक सबसे शांत, तेज़ और व्यावहारिक रास्ता माना जाता है। इसमें न तो एक-दूसरे पर आरोप लगाने की ज़रूरत होती है और न ही सालों तक फैमिली कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं।
अक्सर दिल्ली के क्लाइंट का सबसे आम सवाल होता है – “क्या दिल्ली में जल्दी तलाक मिल सकता है?” अगर सही कानूनी जानकारी, पहले से किया गया आपसी समझौता और अनुभवी वकील का मार्गदर्शन हो, तो दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक 2–3 महीने में भी पूरा हो सकता है।
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक क्या होता है?
आपसी सहमति से तलाक वह कानूनी प्रक्रिया है जिसमें पति और पत्नी दोनों यह तय कर लेते हैं कि वे अब अपनी शादी को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसमें किसी एक को दोषी ठहराने या झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं होती।
दिल्ली की फैमिली कोर्ट में पति-पत्नी पहले से यह तय कर लेते हैं कि:
- मेंटेनेंस या एलिमनी कितनी होगी
- बच्चे की कस्टडी किसके पास रहेगी
- संपत्ति और पैसे का बंटवारा कैसे होगा
कोर्ट यह जांचती है कि दोनों की सहमति बिना दबाव के है और समझौता न्यायसंगत है। संतुष्ट होने पर कोर्ट तलाक की डिक्री पास कर देती है।
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक का कानून शादी के प्रकार और धर्म पर निर्भर करता है। मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:
- हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 धारा 13B यह कानून हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदाय पर लागू होता है। इन मामलों में पति-पत्नी आपसी सहमति से फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दे सकते हैं।
- स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 धारा 28 यह कानून इंटर-रिलिजन मैरिज और कोर्ट मैरिज पर लागू होता है, जहाँ दोनों पक्ष सहमति से तलाक ले सकते हैं।
- इंडियन डिवोर्स एक्ट, 1869 (ईसाई समुदाय) ईसाई समुदाय में कोर्ट की प्रक्रिया के माध्यम से आपसी सहमति से तलाक की अनुमति दी जाती है।
- अन्य पर्सनल लॉ अन्य धार्मिक कानूनों में भी आपसी समझौते के आधार पर तलाक को मान्यता दी गई है, लेकिन तलाक को कानूनी रूप से मान्य बनाने के लिए कोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी होती है।
क्या दिल्ली में आपसी तलाक के लिए ग्राउंड साबित करना ज़रूरी है?
नहीं। दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक के लिए क्रूरता, धोखा या मानसिक उत्पीड़न जैसे ग्राउंड साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन कानून के अनुसार ये शर्तें पूरी होनी चाहिए:
आपसी तलाक के लिए जरूरी कानूनी शर्तें
- कम से कम 1 साल से अलग रहना: पति और पत्नी दोनों कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों। इसका मतलब यह है कि वे साथ नहीं रह रहे और पति-पत्नी वाले रिश्ते निभा नहीं रहे हैं।
- अब साथ रहना संभव न हो: दोनों ने साथ रहने की कोशिश की हो, लेकिन यह समझ आ गया हो कि अब आपसी तालमेल नहीं बन सकता और साथ रहना संभव नहीं है।
- दोनों की पूरी सहमति: तलाक तभी हो सकता है जब पति और पत्नी दोनों अपनी मर्जी से अलग होना चाहें। किसी एक के मना करने पर आपसी तलाक नहीं मिल सकता।
कौन-कौन से मुद्दे पहले से आपसी सहमति से तय करने होते हैं?
- बच्चे की कस्टडी: अगर बच्चे हैं, तो यह तय करना ज़रूरी होता है कि बच्चा किसके पास रहेगा या कस्टडी साझा होगी। इस फैसले पर दोनों को सहमत होना चाहिए।
- मेंटेनेंस और एलिमनी: किसे कितना पैसा मिलेगा, मासिक या एकमुश्त, यह सब पहले से तय किया जाता है ताकि बाद में कोई विवाद न हो।
- प्रॉपर्टी और संपत्ति का बंटवारा: घर, ज़मीन, बैंक बैलेंस या अन्य संपत्ति का बंटवारा आपसी सहमति से तय किया जाता है।
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक के लिए ज़रूरी दस्तावेज़
- पति और पत्नी दोनों का पता प्रमाण
- मैरिज सर्टिफिकेट
- आय का प्रमाण (जैसे ITR या सैलरी स्लिप)
- पेशा और कमाई का विवरण
- प्रॉपर्टी और अन्य संपत्ति की जानकारी
- कम से कम 1 साल से अलग रहने का प्रमाण
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया क्या होती है?
1. तलाक की अर्जी (पिटीशन) दाखिल करना: पति और पत्नी दोनों मिलकर फैमिली कोर्ट में एक साथ तलाक की अर्जी देते हैं। इस अर्जी में यह लिखा होता है कि वे अलग क्यों होना चाहते हैं और बच्चों की कस्टडी, मेंटेनेंस व संपत्ति को लेकर उनकी आपसी सहमति क्या है। इस पिटीशन पर दोनों के साइन ज़रूरी होते हैं।
2. कोर्ट में पेश होना: पिटीशन दाखिल होने के बाद पति और पत्नी को फैमिली कोर्ट में पेश होना होता है। कोर्ट केस को देखती है और सुनवाई की तारीख तय करती है।
3. केस की सुनवाई: तय तारीख पर दोनों कोर्ट में आते हैं। जज दस्तावेज़ देखता है, दोनों के बयान दर्ज करता है और आख़िरी बार समझौता कराने की कोशिश करता है। अगर साथ रहने की कोई संभावना नहीं होती, तो कोर्ट तलाक की प्रक्रिया आगे बढ़ाती है।
4. फर्स्ट मोशन: पहली सुनवाई के बाद फर्स्ट मोशन होता है। इसके बाद आमतौर पर 6 महीने का समय दिया जाता है, जिसे कूलिंग-ऑफ पीरियड कहते हैं। यह समय शादी पर दोबारा सोचने के लिए होता है।
5. सेकंड मोशन: अगर 6 महीने बाद भी दोनों साथ नहीं रहना चाहते, तो वे सेकंड मोशन दाखिल करते हैं। इसमें कोर्ट के सामने अंतिम सहमति दी जाती है कि वे तलाक चाहते हैं।
6. अंतिम फैसला (डिवोर्स डिक्री): सब कुछ सही होने पर कोर्ट तलाक की डिक्री पास कर देती है और शादी कानूनी रूप से खत्म हो जाती है।
कूलिंग-ऑफ पीरियड क्या होता है?
यह 6 महीने का समय होता है जिसमें पति-पत्नी को सोचने का मौका दिया जाता है। इस दौरान वे सुलह की कोशिश कर सकते हैं, काउंसलिंग ले सकते हैं या चाहें तो तलाक की अर्जी वापस भी ले सकते हैं।
क्या कूलिंग-ऑफ पीरियड माफ हो सकता है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) में कहा है कि 6 महीने का इंतज़ार ज़रूरी नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार माफ किया जा सकता है। अगर दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हों और सुलह की कोई उम्मीद न हो, तो कोर्ट यह समय हटा सकती है।
अगर कोई एक पक्ष सेकंड मोशन से मना कर दे तो?
अगर सेकंड मोशन के समय पति या पत्नी में से कोई सहमति नहीं देता, तो आपसी तलाक नहीं मिल सकता। ऐसे में दूसरा पक्ष विवादित तलाक फाइल कर सकता है या फिर दोबारा मेडिएशन की कोशिश कर सकता है।
आपसी तलाक के बाद दोबारा शादी कब कर सकते हैं?
जब कोर्ट अंतिम तलाक की डिक्री पास कर दे और लगभग 90 दिन की अपील की अवधि खत्म हो जाए, तब दोबारा शादी करना कानूनी रूप से सुरक्षित होता है।
दिल्ली में तलाक की अर्जी कहाँ दाखिल करें?
दिल्ली में तलाक की अर्जी फैमिली कोर्ट में दाखिल की जाती है। दिल्ली के अलग-अलग जिलों में फैमिली कोर्ट मौजूद हैं, जैसे:
- तिस हज़ारी कोर्ट
- पटियाला हाउस कोर्ट
- साकेत कोर्ट
- द्वारका कोर्ट
- रोहिणी कोर्ट
- कड़कड़डूमा कोर्ट
कौन-सी कोर्ट में केस लगेगा?
तलाक की संयुक्त अर्जी जिला कोर्ट या फैमिली कोर्ट में दाखिल की जाती है। यह केस वहाँ फाइल किया जा सकता है:
- जहाँ शादी हुई थी,
- जहाँ पति-पत्नी आख़िरी बार साथ रहे थे,
- जहाँ पति या पत्नी अभी रह रहे हैं।
कई मामलों में पत्नी अपनी वर्तमान रहने की जगह की कोर्ट में भी केस फाइल कर सकती है।
आपसी सहमति से तलाक के फायदे
1. समय की बचत: आपसी सहमति से तलाक में केस लंबा नहीं चलता। क्योंकि दोनों पति-पत्नी पहले से ही अलग होने पर सहमत होते हैं, इसलिए सुनवाई कम होती है और बार-बार कोर्ट की तारीखें नहीं पड़तीं।
2. कम मानसिक तनाव: इस तरह के तलाक में एक-दूसरे पर आरोप लगाने, गवाह बुलाने या निजी बातें कोर्ट में साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। इससे पति-पत्नी दोनों को मानसिक शांति मिलती है। खासकर जब बच्चे जुड़े हों, तो यह तरीका बच्चों पर पड़ने वाले भावनात्मक असर को भी कम करता है।
3. कम खर्च: क्योंकि मामला जल्दी निपट जाता है और लंबी कानूनी लड़ाई नहीं होती, इसलिए वकील की फीस और अन्य खर्च भी सीमित रहते हैं। बार-बार तारीखों, गवाहों और दस्तावेज़ों का खर्च नहीं उठाना पड़ता, जिससे यह आर्थिक रूप से भी एक बेहतर विकल्प बन जाता है।
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक में कितना समय और खर्च लगता है?
आपसी सहमति से तलाक भारत में तलाक का सबसे तेज़ तरीका माना जाता है। आमतौर पर, अगर पूरी प्रक्रिया सामान्य तरीके से चले तो इसमें 6 महीने से 1 साल तक का समय लग सकता है। लेकिन अगर पति-पत्नी पहले से लंबे समय से अलग रह रहे हों और कोर्ट को लगे कि सुलह की कोई संभावना नहीं है, तो कूलिंग-ऑफ पीरियड माफ किया जा सकता है और तलाक 2–3 महीने में भी पूरा हो सकता है।
हाँ, अगर पति या पत्नी बार-बार तारीख टालें या जरूरी दस्तावेज़ समय पर न दें, तो प्रक्रिया लंबी भी हो सकती है।
आपसी तलाक में कोर्ट फीस बहुत कम होती है, मुख्य खर्च वकील की फीस का होता है। आमतौर पर वकील की फीस ₹15,000 से ₹50,000 के बीच रहती है, जो शहर, केस की सरलता और वकील के अनुभव पर निर्भर करती है।
कुल मिलाकर, आपसी सहमति से तलाक का खर्च विवादित तलाक की तुलना में बहुत कम होता है और यह आर्थिक रूप से भी एक बेहतर विकल्प माना जाता है।
निष्कर्ष
जब शादी का रिश्ता प्यार, भरोसे और संवाद की जगह लगातार तनाव, खामोशी और भावनात्मक थकान में बदल जाए, तब अलग होने का फैसला कोई हार नहीं होता। दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक पति-पत्नी को यह मौका देता है कि वे बिना आरोप-प्रत्यारोप, बिना बेवजह की कानूनी लड़ाई और बिना वर्षों तक कोर्ट के चक्कर लगाए, सम्मान और समझदारी के साथ अपने रिश्ते को कानूनी रूप से समाप्त कर सकें।
सही कानूनी जानकारी, पहले से स्पष्ट आपसी समझौता और अनुभवी वकील के मार्गदर्शन के साथ दिल्ली में आपसी तलाक की प्रक्रिया सरल, तेज़ और कम तनावपूर्ण बन जाती है। यह केवल शादी का अंत नहीं, बल्कि मानसिक शांति, स्पष्ट भविष्य और एक नई शुरुआत की दिशा में बढ़ाया गया संतुलित कदम होता है, जिससे दोनों पक्ष अपने जीवन को आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ा सकते हैं।
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FAQs
1. क्या दिल्ली में दोनों पक्षों का कोर्ट आना ज़रूरी है?
आमतौर पर फर्स्ट मोशन और सेकंड मोशन के समय पति और पत्नी दोनों का कोर्ट में मौजूद होना ज़रूरी होता है। लेकिन कुछ खास मामलों में, सही वजह और हलफनामे के साथ कोर्ट वीडियो कॉन्फ्रेंस या हाजिरी से छूट दे सकती है।
2. क्या दिल्ली में एक साल से कम हुई शादी पर आपसी तलाक हो सकता है?
सामान्य रूप से शादी के कम से कम एक साल पूरे होना ज़रूरी है। लेकिन अगर बहुत ज़्यादा परेशानी, अत्याचार या खास हालात हों, तो कोर्ट इस शर्त में ढील दे सकती है।
3. क्या दिल्ली में आपसी तलाक के बाद प्रॉपर्टी में हक़ खत्म हो जाता है?
हाँ। तलाक के बाद पति और पत्नी का कानूनी रिश्ता खत्म हो जाता है, इसलिए एक-दूसरे की प्रॉपर्टी पर अपने आप कोई हक़ नहीं रहता, जब तक वसीयत या सेटलमेंट में कुछ अलग तय न हो।
4. क्या दिल्ली में फर्स्ट मोशन के बाद समझौते की शर्तें बदली जा सकती हैं?
मेंटेनेंस, बच्चों की कस्टडी या अन्य शर्तों में बदलाव आपसी सहमति से सेकंड मोशन से पहले किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी होती है।
5. अगर पति या पत्नी विदेश में रहते हों तो क्या दिल्ली में तलाक हो सकता है?
अगर एक पक्ष विदेश में रहता है, तब भी आपसी सहमति से तलाक लिया जा सकता है। इसके लिए पावर ऑफ अटॉर्नी, नोटरी किए गए दस्तावेज़ या कोर्ट की अनुमति से वीडियो कॉन्फ्रेंस का सहारा लिया जाता है।



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