क्या शादी के झूठे वादे पर संबंध बनाना अपराध है? जानिए BNS की धारा 69

BNS 69 in hindi

आज के समय में रिश्तों की प्रकृति बदल चुकी है। पहले जहां रिश्ते परिवार और समाज की निगरानी में आगे बढ़ते थे, वहीं अब कई रिश्ते निजी निर्णय, आपसी भरोसे और भावनाओं पर आधारित होते हैं। ऐसे में “शादी का वादा” एक भावनात्मक आधार बन जाता है, जिस पर कई बार शारीरिक संबंध भी स्थापित हो जाते हैं।

हर रिश्ता शादी तक पहुँचे, यह ज़रूरी नहीं होता। लेकिन हर रिश्ता खत्म होना कानून की नज़र में साधारण भी नहीं होता। आज के समय में भावनात्मक रिश्ते अक्सर क़ानूनी रिश्तों से पहले बन जाते हैं। ऐसे में कई बार निजी दुख और कानूनी अपराध के बीच की रेखा साफ़ नहीं रह जाती। एक वादा बोलने में हल्का लग सकता है, लेकिन कानून में नीयत (इरादा) उसे गंभीर बना देती है।

समस्या तब शुरू होती है जब रिश्ता टूट जाता है। एक पक्ष इसे धोखा मानता है, दूसरा इसे परिस्थितियों की विफलता। पुराने IPC के दौर में धारा 375 (बलात्कार) की व्याख्या के जरिए ऐसे मामलों को देखा जाता था, जिससे काफी भ्रम और असंतुलन पैदा हुआ। इसी पृष्ठभूमि में BNS, 2023 लाई गई, और धारा 69 को विशेष रूप से “शादी के झूठे वादे” से जुड़े मामलों को स्पष्ट करने के लिए शामिल किया गया।

पीड़िता की चिंता होती हैमेरी सहमति धोखे से ली गई, आरोपी की चिंता होती हैक्या हर टूटा रिश्ता अब अपराध बन जाएगा?”

इस ब्लॉग का उद्देश्य भावनाओं को नहीं, बल्कि कानून को स्पष्ट, संतुलित और व्यावहारिक रूप में समझाना है।

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भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 69 क्या है?

BNS की धारा 69 उन मामलों से जुड़ी है जहाँ धोखे से शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, खासकर तब जब शादी का झूठा वादा किया गया हो।

सरल शब्दों में, अगर कोई व्यक्ति शादी का वादा करके किसी को शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार करता है, जबकि उसे पहले से पता होता है कि वह शादी कभी नहीं करेगा, और सामने वाला व्यक्ति केवल उसी वादे पर भरोसा करके सहमति देता है, तो कानून की नज़र में इसे अपराध माना जाता है।

मतलब साफ़ है – अगर सहमति धोखे पर आधारित है, तो कानून उसे सही सहमति नहीं मानता।

अगर व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो अदालत उसे क़ैद की सज़ा दे सकती है। यह क़ैद साधारण या कठोर किसी भी प्रकार की हो सकती है, और इसकी अवधि अधिकतम दस साल तक हो सकती है। इसके अलावा, अदालत दोषी पर जुर्माना भी लगा सकती है।

सज़ा कितनी होगी, यह मामले की गंभीरता, परिस्थितियों, पीड़ित पर पड़े असर और आरोपी के व्यवहार को देखकर अदालत तय करती है।

क्या इसे रेप माना जाता है?

पहले ऐसे मामलों को सीधे तौर पर किसी एक कानून में साफ़-साफ़ नहीं रखा गया था। अक्सर इन्हें रेप के प्रावधानों या धोखाधड़ी के तहत देखा जाता था, जिससे भ्रम की स्थिति बन जाती थी।

अब BNS की धारा 69 इस तरह के मामलों को अलग और स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है। यह कानून यह फर्क साफ़ करता है कि कौन-सा रिश्ता सच में असफल हुआ है और कौन-सा मामला जानबूझकर किया गया धोखा है। इससे बेवजह रेप के आरोप और असली अपराध—दोनों के बीच संतुलन और न्याय बना रहता है।

क्या हर टूटा हुआ शादी का वादा अपराध होता है?

नहीं। बिल्कुल नहीं। कानून बहुत साफ़ तरीके से यह अंतर करता है कि—

  • एक ऐसा रिश्ता जो ईमानदारी से शुरू हुआ लेकिन बाद में टूट गया, और
  • एक ऐसा रिश्ता जो शुरू से ही गलत नीयत के साथ बनाया गया हो।
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सिर्फ़ इसलिए कि शादी नहीं हुई, कोई रिश्ता अपने-आप अपराध नहीं बन जाता।

शादी का झूठा वादा कब अपराध बनता है?

यह अपराध तब बनता है जब—

  • शादी का वादा कभी पूरा करने का इरादा ही नहीं था,
  • आरोपी को पता था कि शादी संभव नहीं है या वह करना नहीं चाहता था,
  • शादी का वादा केवल सहमति पाने के लिए इस्तेमाल किया गया,
  • सहमति गलत जानकारी या धोखे के आधार पर दी गई हो।

अदालत यह देखती है कि वादा करते समय नीयत क्या थी, न कि बाद में क्या हुआ।

उदय बनाम कर्नाटक राज्य (2003) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि हर टूटा हुआ शादी का वादा अपराध नहीं होता। अगर रिश्ता ईमानदारी से शुरू हुआ था और बाद में परिस्थितियाँ बदल गईं, जिससे शादी नहीं हो पाई, तो इसे कानून अपराध नहीं मानता।

इसी तरह प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) में कोर्ट ने दोहराया कि अपराध तभी बनता है जब यह साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था। केवल रिश्ता टूट जाना या शादी न होना अपने आप में किसी को अपराधी नहीं बनाता।

कोर्ट कैसे तय करती है कि शादी का वादा झूठा था या नहीं?

कोर्ट सिर्फ़ एक आरोप पर फैसला नहीं करती, बल्कि पूरे रिश्ते को देखकर निर्णय लेती है। इसके लिए कोर्ट ये बातें देखती है—

  • मैसेज, चैट, ईमेल जैसी बातचीत
  • रिश्ता कितने समय तक चला
  • दोनों लोगों का व्यवहार कैसा रहा
  • क्या सच में शादी को लेकर गंभीर बातें हुई थीं या नहीं
  • क्या एक-दूसरे को परिवार से मिलवाया गया था
  • क्या शादी की दिशा में कोई ठोस कदम उठाए गए थे या नहीं

साफ़ शब्दों में, सिर्फ़ आरोप लगाना काफ़ी नहीं होता, उसे साबित करने के लिए सबूत ज़रूरी होते हैं

BNS की धारा 69 के तहत अपराध की श्रेणी क्या है?

किसी अपराध को किस श्रेणी में रखा गया है, यह समझना इसलिए ज़रूरी होता है ताकि व्यक्ति जान सके कि मामला कितना गंभीर है और कानूनी प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी।

1. संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) धारा 69 के तहत अपराध संज्ञेय है, यानी—

  • पुलिस खुद से FIR दर्ज कर सकती है
  • पुलिस को जाँच शुरू करने के लिए कोर्ट की पहले अनुमति नहीं चाहिए
  • शिकायत मिलते ही तुरंत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है

2. गैर-ज़मानती अपराध (Non-Bailable Offence) धारा 69 के तहत अपराध गैर-ज़मानती है, यानी—

  • ज़मानत अपने आप नहीं मिलती
  • ज़मानत केवल कोर्ट ही दे सकती है
  • कोर्ट मामले की गंभीरता, सबूत और परिस्थितियाँ देखकर फैसला करती है

3. सेशन कोर्ट में विचारणीय (Triable by Court of Session) धारा 69 के मामले सेशन कोर्ट में सुने जाते हैं, यानी—

  • मामले की सुनवाई सेशन जज करते हैं
  • पूरा मामला नियमित और औपचारिक ट्रायल के ज़रिए चलता है
  • गंभीर अपराधों की सुनवाई उच्च स्तर की अदालत में होती है

पीड़ित के पास कौन-कौन से कानूनी उपाय उपलब्ध हैं?

पीड़ित व्यक्ति ये कदम उठा सकता/सकती है—

  • पुलिस में FIR दर्ज करा सकता/सकती है
  • पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास सीधे जा सकता/सकती है
  • मेडिकल जाँच और कानूनी मदद ले सकता/सकती है
  • मैसेज, चैट, कॉल रिकॉर्ड जैसे डिजिटल सबूत पेश कर सकता/सकती है
  • कोर्ट पूरी कार्यवाही के दौरान पीड़ित की निजता और सुरक्षा का ध्यान रखती है।

अगर केस झूठा या बदले की नीयत से किया गया हो तो क्या होगा?

कानून सिर्फ़ पीड़ित की ही नहीं, बल्कि गलत तरीके से फँसाए गए व्यक्ति की भी सुरक्षा करता है। अगर लगाए गए आरोप झूठे हों, तो—

  • आरोपी एंटीसिपेटरी बेल के लिए आवेदन कर सकता है
  • कोर्ट मामले को रद्द भी कर सकती है
  • झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई हो सकती है
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मतलब साफ़ है, कोर्ट बिना जाँच-पड़ताल के किसी को दोषी नहीं मानती, और न्यायिक जांच यह सुनिश्चित करती है कि कानून का दुरुपयोग न हो।

प्रेम नेताम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2024) – कोर्ट ने ज़मानत क्यों दी?

इस केस में हाई कोर्ट ने कुछ अहम बातों पर ध्यान दिया:

  • शिकायत करने वाली महिला बालिग थी और अपनी मर्ज़ी से रिश्ते में थी
  • रिश्ता खत्म होने के लगभग 7 महीने बाद FIR दर्ज की गई
  • देरी से शिकायत करने पर कोर्ट को बदले की नीयत की संभावना लगी
  • कोई ठोस सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था

कोर्ट का साफ़ कहना था: सिर्फ़ शादी न होना अपने-आप में अपराध नहीं है। जब तक यह साबित न हो कि शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत थी, तब तक इसे अपराध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर आरोपी को एंटीसिपेटरी बेल दे दी गई।

खमेंद्र साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2024)– लंबे रिश्ते का क्या असर पड़ा?

इस मामले में हाई कोर्ट ने पूरे रिश्ते की प्रकृति को देखा:

  • रिश्ता लगभग 3 साल तक चला
  • दोनों के बीच बार-बार शारीरिक संबंध बने
  • कोई ज़बरदस्ती, धमकी या धोखे का साफ़ सबूत सामने नहीं आया
  • रिश्ते की अवधि से यह लगा कि दोनों की आपसी सहमति थी

कोर्ट की राय: इतने लंबे समय तक चला रिश्ता आमतौर पर शोषण नहीं, बल्कि आपसी सहमति दिखाता है। केवल यह कहना कि शादी नहीं हुई, यह साबित नहीं करता कि शुरू से ही शादी का झूठा वादा किया गया था। इसलिए इस केस में भी ज़मानत मंज़ूर की गई

क्या शादीशुदा पुरुष पर भी धारा 69 लागू होती है?

कुलदीप वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में आरोपी कुलदीप वर्मा शादीशुदा होने के बावजूद महिला के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध में रहा। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि वर्मा ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ संबंध बनाए। कोर्ट ने देखा कि आरोपी की शादीशुदा स्थिति और धोखे की संभावना, मामले को गंभीर बनाती है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिटीशन खारिज कर दी और कहा कि मामला धारा 69 के तहत ट्रायल योग्य है। केवल रिश्ता टूटना अपराध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने ट्रायल और जाँच की जरूरत बताई ताकि यह साफ़ हो सके कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और सहमति धोखे पर आधारित थी।

क्या शादीशुदा महिला के साथ शादी का झूठा वादा अपराध बनता है? – केरल हाईकोर्ट (2025)

केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा कि जब शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा महिला होती है, तो शादी का वादा करना आधार नहीं बन सकता कि उसके साथ यौन संबंध धोखे के कारण हुए। 

  • इस बात पर कोर्ट ने भरोसा जताया कि जब दोनों पक्ष जानते हैं कि एक व्यक्ति पहले से शादीशुदा है,
  • तो कानूनी रूप से “शादी का वादा” किया ही नहीं जा सकता,
  • इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यौन संबंध शादी के झूठे वादे पर आधारित थे। 

इसलिए कोर्ट ने धारा 69 (BNS) के तहत वर्णित अपराध के लागू होने में संदेह व्यक्त किया, और आरोपी को ज़मानत दे दी। 

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

विश्वज्योति चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2025)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह देखा कि क्या शादी के वादे के आधार पर बने शारीरिक संबंध को हर हालत में रेप या धोखाधड़ी माना जा सकता है। कोर्ट ने पूरे रिश्ते की सच्चाई और परिस्थितियों को ध्यान में रखा।

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कोर्ट ने इन बातों पर खास ध्यान दिया:
  • शिकायतकर्ता महिला तलाकशुदा थी और समझदार वयस्क थी।
  • दोनों के बीच लंबे समय से आपसी सहमति से रिश्ता था।
  • महिला को आरोपी की निजी स्थिति की पूरी जानकारी थी, जिसमें उसकी पत्नी से अलग रहना भी शामिल था।
  • रिश्ता किसी दबाव, धमकी या छुपी हुई बात पर आधारित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश:
  • हर सहमति से बना रिश्ता, जिसमें भविष्य में शादी की संभावना हो, उसे बाद में “शादी का झूठा वादा” नहीं कहा जा सकता।
  • रिश्ता टूट जाने के बाद उसे अपराध का रूप देना कानून का दुरुपयोग माना जाएगा।

कोर्ट ने साफ़ कहा: अगर कोई व्यक्ति पूरी जानकारी के साथ, सोच-समझकर रिश्ते में शामिल होता है, तो बाद में उस सहमति को यह कहकर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि वह धोखे से दी गई थी।

निष्कर्ष

शादी का झूठा वादा करके किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाना सिर्फ धोखा नहीं है, बल्कि कानूनी अपराध भी हो सकता है। धारा 69 (BNS) इसे रोकती है। लेकिन सिर्फ रिश्ता टूटना या शादी न होना अपराध नहीं है। कोर्ट देखती है कि धोखा जानबूझकर किया गया था या नहीं, और क्या सहमति सही थी।

आंकड़े बताते हैं कि ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। NCRB के अनुसार करीब 24% रेप मामलों में शादी के झूठे वादों का आरोप था, लेकिन दोष साबित होना मुश्किल है। इसका मतलब है कि कोर्ट बहुत सावधानी से मामले की जाँच करती है।

धारा 69 का मकसद है कि लोगों को धोखे से शोषण से बचाया जाए, लेकिन सच्चे और सहमति वाले रिश्तों को परेशान न किया जाए। कानून तभी हस्तक्षेप करता है जब धोखा साफ़ तौर पर अपराध हो। इसका उद्देश्य है न्याय देना और केवल दिल टूटने के लिए किसी को सज़ा न देना।

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FAQs

1. क्या लंबा रिश्ता भी धारा 69 के तहत अपराध माना जाएगा?

नहीं। सिर्फ़ वही रिश्ते अपराध बनते हैं जहाँ शुरू से ही शादी का झूठा वादा करके सहमति ली गई हो। लंबा और आपसी सहमति वाला रिश्ता, बिना धोखे के, अपराध नहीं है।

2. संदेश, कॉल और चैट का सबूत कितना जरूरी है?

बहुत जरूरी। मैसेज, ईमेल, कॉल रिकॉर्ड या सोशल मीडिया जैसी चीज़ें धोखे और इरादे को साबित करने में मदद करती हैं और केस के नतीजे को प्रभावित कर सकती हैं।

3. धारा 69 में झूठे आरोपों से सुरक्षा है?

हाँ। कोर्ट समय, इरादा और सच्चाई को देखती है। अगर शिकायत झूठी या बदले की भावना से की गई हो, तो इसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

4. धोखे का पता चलते ही पीड़िता क्या कर सकती है?

पीड़िता तुरंत FIR दर्ज कर सकती है, डिजिटल और फिजिकल सबूत सुरक्षित रख सकती है, और वकील से सलाह लेकर सिविल या क्रिमिनल उपाय अपना सकती है।

5. क्या पुरुष भी धारा 69 के तहत शिकायत कर सकते हैं?

हाँ। हालांकि ज्यादातर मामले महिलाओं से जुड़े हैं, धारा 69 किसी भी व्यक्ति पर लागू होती है जो शादी के झूठे वादे पर धोखे से यौन संबंध में फंसाया गया हो।

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