भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 356 क्या है? जानिए मानहानि से जुड़े कानून और आपके अधिकार

What is Section 356 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 Learn about the defamation law and your rights.

आज के समय में किसी की बदनामी करना बहुत आसान हो गया है। पहले लोग मोहल्ले, ऑफिस या रिश्तेदारी में अफवाह फैलाते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, X (ट्विटर) और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। एक झूठा पोस्ट, एक गलत मैसेज, एक एडिटेड फोटो, या एक अपमानजनक वीडियो कुछ ही मिनटों में सैकड़ों या हजारों लोगों तक पहुँच सकता है।

कई लोग यह सोचते हैं कि “किसी ने गुस्से में कुछ बोल दिया” या “ग्रुप में सिर्फ मजाक किया था” तो इससे कोई कानूनी मामला नहीं बनता। लेकिन कानून की नजर में यह बात हमेशा सही नहीं है। आज के समय में किसी व्यक्ति की इज्जत और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना बहुत आसान हो गया है।

परिवार के झगड़े में झूठा आरोप लगाना, सोशल मीडिया पर गलत पोस्ट डालना, किसी बिज़नेस के खिलाफ फेक रिव्यू देना, ऑफिस में अफवाह फैलाना, या व्हाट्सएप पर एडिट किया हुआ स्क्रीनशॉट वायरल करना, इन सब से बहुत कम समय में किसी की छवि खराब हो सकती है। कई बार इसका असर सिर्फ मानसिक दुख तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नौकरी, शादी के रिश्ते, व्यापार, समाज में सम्मान और लोगों के भरोसे पर भी पड़ता है।

इसी वजह से कानून किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को एक महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार मानता है और उसकी रक्षा करता है।

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BNS की धारा 356 क्या कहती है?

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 मानहानि (Defamation) के अपराध से संबंधित है। बहुत आसान भाषा में समझें तो, कोई व्यक्ति मानहानि का दोषी तब माना जा सकता है जब वह किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में ऐसी बात कहे, लिखे, दिखाए, फैलाए या पब्लिश करे जिससे उसकी इज्जत या समाज में उसकी छवि खराब हो। यह काम कई तरीकों से हो सकता है, जैसे:

  • किसी के बारे में झूठी या नुकसान पहुंचाने वाली बात कहना,
  • ऐसी बात लिखना या पोस्ट करना,
  • इशारों के माध्यम से किसी को बदनाम करना,
  • फोटो, वीडियो, पोस्टर, एडिटेड स्क्रीनशॉट, मीम या अन्य माध्यम से किसी की छवि खराब करना,
  • या किसी भी अन्य माध्यम, जैसे सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, ईमेल, पब्लिक पोस्ट, नोटिस, रिव्यू आदि के जरिए ऐसी बात फैलाना।

अगर यह सब इस इरादे से किया गया हो कि सामने वाले की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे, या व्यक्ति को पता हो / विश्वास करने का कारण हो कि उसकी बात से दूसरे की बदनामी होगी, तो यह धारा 356 BNS के तहत मानहानि का मामला बन सकता है।

सजा का प्रावधान

BNS की धारा 356(2) के अनुसार, जो भी व्यक्ति मानहानि का अपराध करता है, उसे अधिकतम 2 वर्ष तक की साधारण कारावास, या जुर्माना, या दोनों, या कम्युनिटी सर्विस से दंडित किया जा सकता है।

BNS की धारा 351 की अन्य उप-धाराएँ

धारा 356(3) – मानहानिकारक कंटेंट को छापना या तैयार करवाना

धारा 356(3) के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी कंटेंट को छापता है तैयार करवाता है, और उसे पता है या उसे यह मानने का उचित कारण है कि उस कंटेंट में किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि वाली बात (defamatory matter) है, तो वह व्यक्ति अपराध का दोषी माना जा सकता है। उदाहरण:

  • किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठा आरोप लगाकर पेम्फलेट छपवाना
  • किसी महिला की प्रतिष्ठा खराब करने के लिए पोस्टर / नोटिस छपवाना

धारा 356(3) BNS के तहत, ऐसे व्यक्ति को अधिकतम 2 वर्ष तक की साधारण कारावास, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

धारा 356(4) – मानहानिकारक छपी हुई कंटेंट बेचना या बिक्री के लिए रखना

धारा 356(4) के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ऐसी छपी हुई या खुदी हुई कंटेंट बेचता है, या बिक्री के लिए रखता / ऑफर करता है, और उसे पता है कि उसमें किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि वाली बात है, तो वह भी अपराध का दोषी माना जा सकता है। उदाहरण:

  • किसी के खिलाफ झूठे आरोप वाली छपी हुई पुस्तिका बेचना
  • बदनाम करने वाला प्रिंटेड पर्चा दुकान पर रखना और बेचना

धारा 356(3) BNS के तहत, ऐसे व्यक्ति को अधिकतम 2 वर्ष तक की साधारण कारावास, या जुर्माना, यादोनों से दंडित किया जा सकता है।

मानहानि में कौन-कौन से कानूनी अपवाद (Exceptions) होते हैं?

यही वह हिस्सा है जहाँ अधिकतर लोग कानून को सही तरीके से नहीं समझ पाते। कई बार कोई बात सुनने में या पढ़ने में किसी की बदनामी करने वाली लग सकती है, लेकिन फिर भी वह हर बार मानहानि नहीं मानी जाती। अगर वह बात कानून में दिए गए अपवाद (Exceptions) के अंदर आती है, तो वह सुरक्षित हो सकती है।

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1. जनहित के लिए कही गई सच्ची बात

क्रिमिनल डिफेमेशन में केवल यह कहना काफी नहीं है कि “मैंने सच कहा था।” यह भी साबित करना जरूरी होता है कि वह सच्ची बात जनहित में कही गई थी। उदाहरण:

  • किसी व्यक्ति ने समाज में खुद को डॉक्टर बताकर लोगों से पैसे लिए, जबकि उसके पास डिग्री नहीं थी।
  • अगर कोई इस तथ्य को सबूत के साथ उजागर करता है ताकि लोग ठगी से बच सकें, तो यह जनहित में हो सकता है।

2. पब्लिक सर्वेंट के सार्वजनिक काम पर राय

किसी सरकारी अधिकारी या लोक सेवक के सार्वजनिक कर्तव्य के बारे में की गई निष्पक्ष आलोचना कई बार सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • “इस अधिकारी ने शिकायत होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की।”
  • “नगर निगम ने सफाई व्यवस्था में लापरवाही की।”
  • “थानेदार ने FIR दर्ज करने में अनावश्यक देरी की।”

3. किसी सार्वजनिक मुद्दे से जुड़े व्यक्ति के व्यवहार पर राय

अगर कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक विवाद या जनहित के मुद्दे में शामिल है, तो उसके उस व्यवहार पर निष्पक्ष टिप्पणी सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर महिला अधिकारों पर अभियान चला रहा है
  • कोई व्यक्ति चुनाव में प्रचार कर रहा है
  • कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से किसी नीति के पक्ष या विपक्ष में बोल रहा है

4. कोर्ट की कार्यवाही की सही रिपोर्टिंग

कोर्ट में क्या हुआ, उसकी सही और सद्भावना में की गई रिपोर्टिंग कई मामलों में सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • “आज अदालत ने आरोपी को सम्मन जारी किया।”
  • “कोर्ट ने अंतरिम राहत देने से इनकार किया।”
  • “मामला अगली तारीख के लिए सूचीबद्ध किया गया।”

5. तय हो चुके मामलों और पक्षकारों / गवाहों के व्यवहार पर राय

कोर्ट के फैसले के बाद, मामले और उससे जुड़े पक्षकारों या गवाहों के व्यवहार पर कुछ निष्पक्ष टिप्पणी सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • “इस फैसले में गवाहों के बयान विरोधाभासी लगे।”
  • “वादी की दलील कमजोर प्रतीत हुई।”
  • “अदालत ने दस्तावेजी साक्ष्य को अधिक महत्व दिया।”

6. सार्वजनिक प्रदर्शन पर राय

किताब, फिल्म, भाषण, कला, संगीत, सार्वजनिक लेक्चर आदि पर की गई ईमानदार और निष्पक्ष समीक्षा सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • “फिल्म की कहानी कमजोर है।”
  • “गायक का लाइव प्रदर्शन उम्मीद के अनुसार नहीं था।”
  • “इस किताब में कानूनी जानकारी अधूरी है।”

7. वैध अधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा फटकार

जिस व्यक्ति के पास वैध अधिकार है, वह किसी दूसरे व्यक्ति को सद्भावना में सुधारने या अनुशासन के लिए फटकार दे सकता है। उदाहरण:

  • एम्प्लायर द्वारा कर्मचारी के काम पर टिप्पणी
  • शिक्षक द्वारा छात्र के व्यवहार पर अनुशासनात्मक टिप्पणी
  • संस्था प्रमुख द्वारा नियम उल्लंघन पर चेतावनी

8. सही प्राधिकारी को की गई शिकायत

पुलिस, एम्प्लायर, डिसकीप्लीनरी अथॉरिटी, रेगुलेटर या किसी अन्य ऑथोराइज़्ड व्यक्ति / संस्था को सद्भावना में की गई शिकायत सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • पुलिस को शिकायत देना
  • एम्प्लायर को मिसकंडक्ट की शिकायत देना
  • कॉलेज / स्कूल अथॉरिटी को शिकायत करना

9. अपने या किसी और के हित की रक्षा के लिए दिया गया बयान

अगर कोई बात अपने या किसी दूसरे के वैध हित की रक्षा के लिए सद्भावना में कही गई है, तो वह सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • किसी मित्र को बताना कि “इस व्यक्ति के खिलाफ पहले से धोखाधड़ी की शिकायतें हैं, सावधान रहो”
  • किसी एम्प्लायर को बताना कि “इस उम्मीदवार के दस्तावेज संदिग्ध लग रहे हैं”

10. सद्भावना में दी गई चेतावनी

अगर किसी व्यक्ति के भले के लिए या जनहित में ईमानदारी से कोई चेतावनी दी गई है, तो वह कई बार सुरक्षित हो सकती है। उदाहरण:

  • किसी दोस्त को कहना: “इस व्यक्ति से पैसा उधार देते समय सावधान रहना।”
  • किसी परिवार को बताना: “शादी से पहले इस बारे में जांच कर लो।”

क्या कानून व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आजीविका दोनों की रक्षा करता है?

हाँ, बिल्कुल। कानून केवल व्यक्ति की इज्जत या सामाजिक छवि की ही रक्षा नहीं करता, बल्कि कई मामलों में उसकी आजीविका यानी रोज़गार, नौकरी और कमाने की क्षमता की भी रक्षा करता है।

बंबई बंदरगाह का न्यासी बोर्ड बनाम दिलीप कुमार राघवेंद्रनाथ नाडकर्णी, AIR 1983 SC 109 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानहानि सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है।

कोर्ट ने यह भी माना कि अगर किसी विभागीय जांच का परिणाम किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा या रोज़ी-रोटी (livelihood) पर बुरा असर डाल सकता है, तो यह केवल एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के जीवन की गरिमा, सम्मान और वह मानवीय मूल्य, जो जीवन को सम्मानजनक बनाते हैं, प्रभावित हो सकते हैं।

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क्या क्रिमिनल डिफेमेशन संवैधानिक रूप से वैध है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना है कि क्रिमिनल डिफेमेशन कानून संवैधानिक रूप से वैध है।

सुब्रमण्यम स्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया, AIR 2016 SC 2728 

मामले में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने प्रतिष्ठा और मानहानि के महत्व को विस्तार से समझा। कोर्ट ने इस विषय को समझने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों, विचारों, और प्राचीन स्रोतों का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि:

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहुत महत्वपूर्ण और सम्मानित अधिकार है,
  • लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है,
  • संविधान इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।

इसी संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 और 500 (BNS की धारा 356) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ऐसा प्रतिबंध नहीं है जिसे असंगत कहा जाए।

“Right to Free Speech” का मतलब यह नहीं है कि किसी नागरिक को दूसरे व्यक्ति की बदनामी करने का अधिकार मिल जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि: किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करना एक मौलिक अधिकार है, यह मानव अधिकार भी है और समाज के सोशल इंटरेस्ट में भी है

कोर्ट ने आगे कहा कि क्रिमिनल डिफेमेशन से जुड़े प्रावधान “Doctrine of Proportionality” के खिलाफ नहीं हैं, क्योंकि यह कानून ऐसा प्रतिबंध लगाता है जो सीमित है, अनुचित नहीं है, और उचित प्रतिबंध की संवैधानिक सीमा के भीतर है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने: IPC की धारा 499 और 500 (BNS की धारा 356) कोसंवैधानिक रूप से वैध माना और बरकरार रखा।

मोहम्मद अब्दुल्ला खान बनाम प्रकाश के, 2017

मोहम्मद अब्दुल्ला खान बनाम प्रकाश के, AIR 2017 SC 5608 मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल आया कि अगर किसी अखबार में मानहानि कारक खबर छपती है, तो क्या केवल एडिटर जिम्मेदार होगा या अखबार का मालिक भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

इस मामले में शिकायतकर्ता ने अखबार में छपी एक बहुत ही बदनाम करने वाली खबर के आधार पर मालिक और एडिटर दोनों के खिलाफ मानहानि की शिकायत की थी। मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर संज्ञान लिया। बाद में मालिक ने यह दलील दी कि अगर कोई मानहानिकारक खबर अखबार में छपी है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल एडिटर की हो सकती है, मालिक की नहीं, क्योंकि क्रिमिनल कानून में वेकरिअस लायबिलिटी (दूसरे के काम की आपराधिक जिम्मेदारी) सामान्य रूप से स्वतः नहीं मानी जाती।

क्रिमिनल डिफेमेशन बनाम सिविल डिफेमेशन

भारत में मानहानि सिविल और क्रिमिनल, दोनों प्रकार से कार्रवाई योग्य है।

सिविल डिफेमेशन

सिविल कानून में मानहानि लॉ ऑफ़ टोर्ट्स के अंतर्गत आती है। इसमें मुख्य रूप से यह देखा जाता है कि:

  • बयान मानहानिकारक हो,
  • वह बयान पीड़ित व्यक्ति से संबंधित हो,
  • और वह बात किसी अन्य व्यक्ति तक पहुँचाई / पब्लिश की गई हो।

क्रिमिनल डिफेमेशन

क्रिमिनल कानून में मानहानि एक बेलेबल, नॉन कॉग्निजेबल और कम्पाउंडेबल ऑफेंस है। क्रिमिनल डिफेमेशन में यह साबित करना जरूरी होता है कि:

  • आरोपी की का इरादा किसी की बदनामी करने की थी, या
  • उसे यह ज्ञान था कि उसके बयान / पब्लिशमेंट से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है।

आसान शब्दों में समझें तो, सिविल डिफेमेशनका मतलब है कि पीड़ित व्यक्ति अपनी बदनामी के लिए कोर्ट से हर्जाना या मुआवजा मांग सकता है, जबकि क्रिमिनल डिफेमेशनमें आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होती है और दोष साबित होने पर उसे सजा दी जा सकती है।

धारा 356 BNS के तहत क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है?

1. मानहानि के सबूत तुरंत सुरक्षित करें

यदि किसी ने आपकी बदनामी की है, तो सबसे पहले स्क्रीनशॉट्स, व्हाट्सएप चैट, सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, ऑडियो, ईमेल, लिंक, कमेंट्स और गवाहों की जानकारी सुरक्षित रखें। मानहानि के मामलों में सबूत सबसे मजबूत आधार होते हैं।

2. अपमानजनक पोस्ट या कंटेंट हटाने की मांग करें

यदि बदनामी सोशल मीडिया, वेबसाइट, यूट्यूब, ब्लॉग या किसी पब्लिक प्लेटफॉर्म पर हुई है, तो सबसे पहले सामने वाले व्यक्ति से कंटेंट तुरंत हटाने और भविष्य में ऐसा न करने की स्पष्ट मांग करें।

3. मानहानि का लीगल नोटिस भेजें

एक लीगल नोटिस भेजकर आरोपी से यह मांग की जा सकती है कि वह झूठी या अपमानजनक सामग्री हटाए, लिखित माफी दे, बदनामी बंद करे, और यदि आवश्यक हो तो आपकी प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए मुआवजा भी दे।

4. पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज करें

यदि बदनामी गंभीर है, जानबूझकर की गई है, या उसके साथ धमकी, उत्पीड़न या ब्लैकमेल भी जुड़ा है, तो नजदीकी पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत देकर कानूनी कार्रवाई की मांग की जा सकती है।

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5. साइबर सेल में शिकायत करें

यदि बदनामी व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब, X (Twitter), ईमेल या अन्य ऑनलाइन माध्यम से की गई है, तो स्थानीय साइबर सेल या साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत करना एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम है।

6. मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल शिकायत दायर करें

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत पीड़ित व्यक्ति मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल कंप्लेंट दायर कर सकता है। इससे आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू हो सकती है और अदालत सम्मन जारी कर सकती है।

7. सिविल कोर्ट में हर्जाना का दावा करें

यदि आपकी प्रतिष्ठा, व्यापार, नौकरी, करियर या सामाजिक सम्मान को गंभीर नुकसान हुआ है, तो आप सिविल डिफेमेशन सूट दायर करके कंपनसेशनमांग सकते हैं। यह आर्थिक और मानसिक नुकसान की भरपाई का कानूनी उपाय है।

8. इन्जंक्शन/ स्टे आर्डर की मांग करें

यदि सामने वाला व्यक्ति बार-बार आपकी बदनामी कर रहा है या लगातार पोस्ट/वीडियो/मैसेज डाल रहा है, तो आप सिविल कोर्ट से इन्जंक्शन/ स्टे आर्डर मांग सकते हैं ताकि उसे आगे ऐसी सामग्री फैलाने से रोका जा सके।

9. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को रिपोर्ट करें

जिस प्लेटफॉर्म पर बदनामी हुई है, वहाँ रिपोर्ट देकर अपमानजनक पोस्ट हटवाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह व्यावहारिक कदम है और कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ तुरंत राहत दिला सकता है।

निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा देती है, क्योंकि आज झूठी बातें, गलत आरोप, सोशल मीडिया पोस्ट, फेक रिव्यू, या व्हाट्सएप मैसेज बहुत जल्दी फैल जाते हैं और किसी व्यक्ति की इज्जत, मानसिक शांति, सामाजिक सम्मान, नौकरी और प्रोफेशनल छवि को गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।

साथ ही, यह कानून हर बात को अपराध नहीं मानता। ईमानदारी से की गई आलोचना, सही प्राधिकारी को की गई शिकायत, या सद्भावना में कही गई बात, अगर वह कानून में दिए गए अपवादों के भीतर आती है, तो हर बार मानहानि नहीं मानी जाती।

इसीलिए, मानहानि के मामलों को हमेशा सावधानी से समझना चाहिए। इसमें तथ्य, नीयत, पब्लिकेशन, और कानूनी बचाव बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। चाहे आप झूठे आरोपों के शिकार हों या आपके खिलाफ मानहानि की शिकायत हुई हो, समय पर सही कानूनी सलाह और मजबूत सबूत आपके अधिकारों की रक्षा करने में बहुत बड़ा अंतर ला सकते हैं।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. क्या फॅमिली डिस्प्यूट में लगाए गए झूठे आरोप धारा 356 BNS के तहत मानहानि बन सकते हैं?

अगर फॅमिली डिस्प्यूट में किसी व्यक्ति की छवि खराब करने के लिए रिश्तेदारों, पड़ोसियों, समाज या जान-पहचान के लोगों के सामने झूठे आरोप लगाए जाते हैं, तो यह भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत मानहानि का मामला बन सकता है।

2. क्या व्हाट्सएप मैसेज और इंस्टाग्राम स्टोरी भी भारत में मानहानि कानून के दायरे में आते हैं?

हाँ। अगर व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ईमेल या किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कोई झूठी और बदनाम करने वाली बात शेयर की जाती है, और उससे किसी व्यक्ति की इज्जत या छवि खराब होती है, तो वह मानहानि मानी जा सकती है।

3. क्या कोई बिज़नेस या कंपनी भी धारा 356 BNS के तहत मानहानि की शिकायत कर सकती है?

अगर किसी कंपनी, क्लिनिक, फर्म, दुकान, या किसी प्रोफेशनल प्रतिष्ठान के खिलाफ झूठे आरोप, फेक रिव्यू, या सार्वजनिक रूप से गलत बातें फैलाई जाती हैं, जिससे उसकी गुडविल को नुकसान पहुँचता है, तो वह भी कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

4. धारा 356 BNS के तहत मानहानि का मामला साबित करने के लिए कौन-कौन से सबूत जरूरी होते हैं?

मानहानि के मामले में सही सबूत बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। आम तौर पर ये सबूत काम आते हैं:

  • स्क्रीनशॉट
  • चैट रिकॉर्ड
  • पोस्ट / लिंक
  • ईमेल
  • गवाहों के बयान
  • प्रिंटआउट

यह साबित करने वाला रिकॉर्ड कि वह बात तीसरे व्यक्ति तक पहुँची और उससे आपकी प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ।

5. क्या भारत में ऑनलाइन मानहानिकारक कंटेंट को कानूनी कार्रवाई से हटवाया जा सकता है?

अगर इंटरनेट या सोशल मीडिया पर कोई मानहानिकारक कंटेंट डाला गया है, तो आप केवल क्रिमिनल शिकायत ही नहीं कर सकते, बल्कि कोर्ट से यह भी मांग कर सकते हैं:

  • कंटेंट हटाने का आदेश
  • रोक लगाने का आदेश
  • माफी
  • गलत बात वापस लेने
  • और मुआवजा / हर्जाना

अगर वह कंटेंट लगातार आपकी छवि खराब कर रहा है, तो कोर्ट से राहत ली जा सकती है।

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