हर शादी गुस्से, झगड़े या आरोपों की वजह से नहीं टूटती। कई बार पति-पत्नी यह समझ जाते हैं कि अब साथ रहना किसी के लिए भी ठीक नहीं है। न प्यार बचा है, न शांति, न सम्मान। ऐसे में कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि वे बिना आरोप-प्रत्यारोप और लंबी कोर्ट लड़ाई के, शांति से अलग हो सकें।
इसी कानूनी रास्ते को आपसी सहमति से तलाक कहा जाता है। इसका मकसद है – तनाव कम करना, समय बचाना और सम्मान के साथ रिश्ते को खत्म करना।
आपसी सहमति से तलाक क्या होता है?
आपसी सहमति से तलाक का अर्थ है कि पति और पत्नी दोनों बिना किसी दबाव या झगड़े के तलाक के लिए तैयार हों। इसमें न तो झूठे आरोप लगाए जाते हैं और न ही जबरदस्ती होती है। भरण-पोषण, बच्चों की कस्टडी और प्रॉपर्टी जैसे सभी मुद्दे आपसी सहमति से तय किए जाते हैं और दोनों मिलकर कोर्ट जाते हैं।
कोर्ट यह सुनिश्चित करती है कि तलाक का फैसला दोनों ने अपनी पूरी समझ और मर्जी से लिया है। यह भी देखा जाता है कि किसी पर डर, दबाव या धोखे का असर न हो। अगर कोर्ट को लगता है कि सहमति सच्ची और निष्पक्ष है, तो वह आपसी सहमति से तलाक की अनुमति दे देती है।
आपसी सहमति से तलाक किस कानून के तहत होता है?
आपसी तलाक अलग-अलग धर्मों के लिए अलग कानूनों में है:
- हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 (धारा 13B): यह कानून हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों पर लागू होता है और आपसी सहमति से तलाक की अनुमति देता है।
- स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 (धारा 28): यह कानून इंटर-कास्ट, इंटर-रिलिजन और कोर्ट मैरिज करने वाले पति-पत्नी के लिए आपसी तलाक का प्रावधान करता है।
- क्रिश्चियन कानून: ईसाई धर्म में आपसी सहमति से तलाक सीधे नहीं, बल्कि कोर्ट की तय कानूनी प्रक्रिया के ज़रिये लिया जाता है।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ: मुस्लिम कानून में आपसी सहमति से तलाक को खुला या मुबारत कहा जाता है, जो दोनों की रज़ामंदी से होता है।
आपसी सहमति से तलाक के लिए क्या ज़रूरी शर्तें पूरी होनी चाहिए?
कम से कम एक साल से अलग रहना (धारा 13B(1), हिंदू मैरिज एक्ट)
आपसी सहमति से तलाक के लिए ज़रूरी है कि पति-पत्नी कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों। अलग रहना सिर्फ अलग घर में रहना नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि पति-पत्नी का वैवाहिक रिश्ता व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुका है।
शादी को बचाने की कोई संभावना न होना
दोनों पति-पत्नी को यह स्पष्ट रूप से महसूस होना चाहिए कि अब साथ रहना संभव नहीं है। जब सुलह, समझौता या रिश्ता सुधारने की कोई उम्मीद न बचे, तभी आपसी सहमति से तलाक लिया जा सकता है।
सहमति पूरी तरह स्वेच्छा से होना
तलाक के लिए दी गई सहमति पूरी तरह अपनी मर्ज़ी से होनी चाहिए। यह फैसला किसी डर, दबाव, धमकी या धोखे में लिया गया नहीं होना चाहिए, तभी कोर्ट इसे वैध मानती है।
कौन-कौन से मुद्दे पहले से तय होने चाहिए?
- मेंटेनेंस / एलिमनी: तलाक से पहले यह तय होना चाहिए कि भरण-पोषण एकमुश्त मिलेगा या मासिक, और यह स्थायी होगा या एक-बार का सेटलमेंट।
- बच्चों की कस्टडी और खर्च: यह साफ़ तय हो कि बच्चा किसके साथ रहेगा, दूसरे माता-पिता को मिलने का अधिकार क्या होगा, और बच्चे का खर्च कौन उठाएगा।
- प्रॉपर्टी और आर्थिक सेटलमेंट: घर, फ्लैट, ज़मीन, बैंक अकाउंट, गहने और स्त्रीधन के बँटवारे पर आपसी सहमति होनी चाहिए; निष्पक्ष समझौते में कोर्ट आमतौर पर दख़ल नहीं देती।
आपसी सहमति से तलाक की पूरी कानूनी प्रक्रिया
स्टेप 1: आपसी सहमति से तलाक की पिटीशन तैयार करना
पति और पत्नी मिलकर जॉइंट पिटीशन तैयार करते हैं, जो धारा 13B(1), हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत फाइल होती है। इसमें शादी का विवरण, कितने समय से अलग रह रहे हैं, अलग होने का कारण, आपसी सेटलमेंट की पूरी शर्तें और दोनों की स्वेच्छा से दी गई सहमति लिखी जाती है।
स्टेप 2: पहली मोशन पिटीशन कोर्ट में फाइल करना
यह पिटीशन फैमिली कोर्ट में फाइल की जाती है जहाँ शादी हुई हो, आख़िरी बार साथ रहे हों, या जहाँ पति या पत्नी में से कोई एक रहता हो। इस स्टेप पर दोनों का कोर्ट में उपस्थित होना ज़रूरी होता है।
स्टेप 3: कोर्ट में बयान दर्ज होना
कोर्ट दोनों की पहचान जाँचती है और शपथ पर बयान दर्ज करती है। जज यह सुनिश्चित करता है कि तलाक का फैसला बिना दबाव, डर या धोखे के, अपनी मर्जी से लिया गया है।
स्टेप 4: 6 महीने का कूलिंग-ऑफ पीरियड
धारा 13B(2) के अनुसार, फर्स्ट और सेकंड मोशन के बीच 6 महीने का इंतज़ार होता है। यह समय इसलिए दिया जाता है ताकि दोनों दोबारा सोच सकें और अगर सुलह की कोई संभावना हो तो उसे आज़माया जा सके।
कूलिंग-ऑफ पीरियड माफ़ होने की स्थिति
हालाँकि कानून में 6 महीने का इंतज़ार तय है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017) के फैसले में कहा कि अगर पति-पत्नी एक साल से ज़्यादा समय से अलग रह रहे हों, मेंटेनेंस, कस्टडी और प्रॉपर्टी जैसे सभी मुद्दे पूरी तरह सेटल हों, और सुलह की कोई वास्तविक संभावना न बचे, तो कोर्ट इस 6 महीने के कूलिंग-ऑफ पीरियड को माफ़ कर सकती है। इसका मकसद अनावश्यक देरी से दोनों पक्षों को मानसिक तनाव से बचाना है।
स्टेप 5: सेकंड मोशन पिटीशन
सेकंड मोशन में पति और पत्नी दोनों को फिर से कोर्ट में हाज़िर होना होता है। यहाँ दोनों यह साफ़ तौर पर बताते हैं कि वे अब भी आपसी सहमति से तलाक चाहते हैं और उनके फैसले में कोई बदलाव नहीं आया है। कोर्ट दोबारा यह सुनिश्चित करती है कि सहमति पूरी तरह स्वेच्छा से है।
स्टेप 6: अंतिम आदेश (डिक्री ऑफ डिवोर्स)
सेकंड मोशन के बाद कोर्ट सभी दस्तावेज़ और बयानों की अंतिम जांच करती है। अगर कोर्ट संतुष्ट हो जाती है, तो वह तलाक की डिक्री पास कर देती है। इसी तारीख से पति-पत्नी का रिश्ता कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है और दोनों स्वतंत्र हो जाते हैं।
आपसी सहमति से तलाक के लिए ज़रूरी दस्तावेज़
- पति और पत्नी दोनों का पता प्रमाण
- मैरिज सर्टिफिकेट
- आय का प्रमाण (जैसे ITR या सैलरी स्लिप)
- पेशा और कमाई का विवरण
- प्रॉपर्टी और अन्य संपत्ति की जानकारी
- कम से कम 1 साल से अलग रहने का प्रमाण
आपसी सहमति से तलाक में कितना समय और खर्च लगता है?
अगर कूलिंग-ऑफ पीरियड की छूट नहीं मिलती, तो आपसी तलाक में आमतौर पर 6 महीने से 1 साल का समय लगता है। अगर कोर्ट यह समय माफ़ कर दे, तो पूरा मामला लगभग 2 से 4 महीने में भी खत्म हो सकता है।
आपसी तलाक में खर्च ज़्यादा नहीं होता। इसमें मुख्य रूप से वकील की फीस और नाममात्र की कोर्ट फीस शामिल होती है। विवादित तलाक की तुलना में यह तरीका काफी सस्ता, आसान और कम तनाव वाला होता है।
क्या आपसी तलाक वापस लिया जा सकता है?
हाँ, आपसी सहमति से तलाक वापस लिया जा सकता है, लेकिन यह अधिकार अंतिम तलाक की डिक्री पास होने से पहले तक ही होता है। अगर पति या पत्नी में से कोई भी सेकंड मोशन से पहले या उस समय अपनी सहमति वापस ले लेता है, तो कोर्ट तलाक मंज़ूर नहीं करती और आपसी तलाक की प्रक्रिया वहीं समाप्त हो जाती है।
आपसी सहमति से तलाक के फ़ायदे
- जल्दी निपटारा: आपसी तलाक में लंबी सुनवाई नहीं होती, इसलिए मामला कम समय में कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है।
- कम तनाव: झगड़े, आरोप और बहस न होने से मानसिक तनाव कम रहता है और दोनों पक्ष शांति से आगे बढ़ पाते हैं।
- सम्मान और गोपनीयता: यह प्रक्रिया निजी रहती है, जिससे परिवार की इज़्ज़त और दोनों की गरिमा बनी रहती है।
- कम खर्च: विवादित तलाक की तुलना में वकील की फीस और कोर्ट खर्च काफी कम आता है।
- बिना आरोप-प्रत्यारोप: एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाए बिना सम्मानजनक तरीके से अलग होने का मौका मिलता है।
वकील की भूमिका क्यों ज़रूरी है?
- सही ड्राफ्टिंग करता है: वकील याचिका और समझौते को कानूनी रूप से मजबूत बनाता है, ताकि भविष्य में कोई विवाद न हो।
- सेटलमेंट को सुरक्षित बनाता है: भरण-पोषण, कस्टडी और प्रॉपर्टी का समझौता सही ढंग से रिकॉर्ड करवाता है।
- कूलिंग-ऑफ पीरियड की छूट दिला सकता है: जरूरी शर्तें पूरी होने पर वकील कोर्ट से 6 महीने की अवधि माफ़ करवाने में मदद करता है।
- प्रक्रिया आसान बनाता है: कोर्ट की तारीखें, दस्तावेज़ और पेशी सही ढंग से संभालकर पूरी प्रक्रिया सरल कर देता है।
निष्कर्ष
आपसी सहमति से तलाक केवल काग़ज़ी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि समझदारी और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का फैसला है। जब पति और पत्नी साफ़ मन और आपसी सहयोग के साथ यह कदम उठाते हैं, तो कानून लड़ाई का मैदान नहीं बनता, बल्कि एक आसान रास्ता बन जाता है। सही योजना और समझ से लिया गया आपसी तलाक भविष्य के झगड़ों से बचाता है और दोनों को अपनी ज़िंदगी पर फिर से नियंत्रण देता है। सही जानकारी और मार्गदर्शन के साथ यह अंत नहीं, बल्कि सम्मान पर टिकी एक नई शुरुआत हो सकती है।
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FAQs
1. क्या एक ही घर में रहते हुए आपसी तलाक लिया जा सकता है?
हाँ। कानून में “अलग रहना” का मतलब अलग घर होना नहीं है। अगर पति-पत्नी का वैवाहिक रिश्ता खत्म हो चुका है, तो वे एक ही घर में रहकर भी आपसी तलाक ले सकते हैं।
2. अगर मैरिज सर्टिफिकेट न हो तो क्या आपसी तलाक संभव है?
हाँ। शादी की फोटो, निमंत्रण पत्र, हलफनामा या धार्मिक रस्मों के दस्तावेज़ जैसे अन्य सबूत कोर्ट में मान्य हो सकते हैं।
3. क्या आपसी तलाक के बाद दोबारा शादी करने का हक़ रहता है?
हाँ। तलाक की डिक्री मिलते ही दोनों पक्ष कानूनी रूप से दोबारा शादी करने के लिए स्वतंत्र होते हैं, यदि कोई अपील लंबित न हो।
4. क्या आपसी तलाक के बाद भी विवाद हो सकता है?
आमतौर पर नहीं, अगर सेटलमेंट साफ़ और पूरी तरह तय हो। लेकिन अधूरा या अस्पष्ट समझौता भविष्य में परेशानी पैदा कर सकता है।
5. क्या आपसी तलाक में कोर्ट द्वारा मेडिएशन ज़रूरी है?
मेडिएशन अनिवार्य नहीं है, लेकिन कोर्ट यह सुनिश्चित करने के लिए सुझाव दे सकती है कि फैसला समझदारी और अपनी मर्जी से लिया गया है।



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