सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाने वाले के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है?

What legal action can be taken against someone who spreads false information on social media

आज एक छोटा-सा क्लिक किसी की छवि बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। सोशल मीडिया पर कही गई बात कुछ ही सेकंड में हज़ारों लोगों तक पहुँच जाती है। कई बार बिना जाँचे-परखे शेयर की गई गलत जानकारी सच से ज़्यादा तेज़ फैल जाती है और किसी व्यक्ति या समाज को नुकसान पहुँचा देती है।

भारतीय कानून अब यह मानता है कि सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाना कोई मामूली बात नहीं है। इससे असली नुकसान हो सकता है, इसलिए हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह सोच-समझकर और सच के साथ पोस्ट करे। यह लेख बताता है कि सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने वालों के खिलाफ कानून क्या कहता है और पीड़ित व्यक्ति को कौन-से कानूनी उपाय मिलते हैं।

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ऑनलाइन झूठी जानकारी का बढ़ता खतरा

आज एक पोस्ट, रील या मैसेज कुछ ही मिनटों में हज़ारों लोगों तक पहुँच जाता है। यह तेजी जहाँ फायदेमंद है, वहीं झूठी बातें भी सच से ज़्यादा तेज़ फैल जाती हैं। ऐसी गलत जानकारी:

  • किसी की इज़्ज़त खराब कर सकती है
  • लोगों में डर या घबराहट पैदा कर सकती है
  • समाज के अलग-अलग वर्गों में नफरत फैला सकती है
  • लोगों को गलत और नुकसानदेह फैसले लेने पर मजबूर कर सकती है

कई लोग इसे सिर्फ “शेयर करना” समझते हैं, लेकिन कानून की नजर में यह एक आपराधिक अपराध भी बन सकता है। उदाहरण के तौर पर, यह अपराध माना जा सकता है अगर कोई व्यक्ति:

  • किसी के खिलाफ झूठा आरोप पोस्ट करे
  • किसी को अपराधी बताकर गलत खबर फैलाए
  • एडिट की हुई या फर्जी तस्वीर/वीडियो शेयर करे
  • मौत, हादसे या हिंसा को लेकर झूठी खबर फैलाए
  • समाज या धर्म से जुड़ी भ्रामक और भड़काऊ पोस्ट करे

झूठी जानकारी, अफवाह और बदनामी में क्या अंतर है?

हर गलत जानकारी अपराध नहीं होती। कानून इन शब्दों के बीच फर्क करता है:

  • झूठी जानकारी: ऐसी सूचना जो तथ्यात्मक रूप से गलत हो।
  • अफवाह: बिना पुख्ता सबूत के फैलाई गई बात, जो सच हो भी सकती है और नहीं भी।
  • बदनामी: ऐसा झूठा बयान या कंटेंट, जिससे किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचे।
  • राय और झूठा आरोप में फर्क: अगर कोई अपनी राय व्यक्त करता है, तो वह राय है। लेकिन अगर वह किसी पर झूठा अपराध या अनैतिक काम का आरोप लगाता है, तो यह झूठा आरोप है और अपराध बन सकता है।

कानून की नजर में वही पोस्ट अपराध बनती है जो झूठी हो जानबूझकर या लापरवाही से डाली गई हो किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाए

ऑनलाइन मानहानि

मानहानि क्या होती है?

जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में झूठी बात कहता या लिखता है, और उससे उस व्यक्ति की इज़्ज़त और छवि खराब होती है, तो उसे मानहानि कहा जाता है।

भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धारा 356 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी के बारे में ऐसी झूठी बात फैलाता है, यह जानते हुए कि इससे उसकी बदनामी होगी, तो यह मानहानि का अपराध है।

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मानहानि का दोष सिद्ध होने पर दोषी व्यक्ति को अधिकतम 2 साल तक की जेल हो सकती है, या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, या फिर जेल और जुर्माना दोनों की सज़ा दी जा सकती है।

झूठी खबर और अफ़वाह फैलाना

अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी झूठी खबर या अफ़वाह फैलाता है जिससे लोगों में डर, घबराहट, गुस्सा या नफरत फैल जाए, या जिससे समाज में शांति भंग हो, तो उस पर BNS की धारा 353 लागू होती है। इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति गलत जानकारी फैलाकर जनता को गुमराह न करे या हालात बिगाड़ने की कोशिश न करे।

उदाहरण के तौर पर, दंगे होने की झूठी खबर फैलाना, किसी समुदाय के खिलाफ भड़काऊ संदेश शेयर करना, या किसी बड़ी आपदा को लेकर फर्जी सूचना फैलाना इस धारा के तहत अपराध माना जाता है।

सज़ा: धारा 353 BNS के तहत दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को अधिकतम 3 साल तक की जेल हो सकती है, या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, या फिर जेल और जुर्माना दोनों की सज़ा दी जा सकती है।

मॉर्फ की हुई फोटो, फर्जी प्रोफाइल और किसी की पहचान बनकर काम करना

अगर कोई व्यक्ति किसी की तस्वीर को एडिट या मॉर्फ करके गलत तरीके से इस्तेमाल करता है, या किसी के नाम और फोटो से फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट बनाता है, तो यह गंभीर साइबर अपराध माना जाता है। ऐसे काम अक्सर किसी की बदनामी करने, धोखा देने या लोगों को गुमराह करने के इरादे से किए जाते हैं।

ऐसे मामलों में यह धाराएं लागू हो सकती हैं:

  • IT एक्ट की धारा 66D – किसी और की पहचान बनकर धोखाधड़ी करना
  • BNS की धारा 336 – किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के इरादे से जालसाजी करना

सज़ा: इन अपराधों में दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को 3 साल तक की जेल हो सकती है और साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

सरल शब्दों में, किसी की फोटो से छेड़छाड़ करना या उसकी पहचान का गलत इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है और इसके लिए कड़ी कार्रवाई हो सकती है।

यौन, अश्लील या निजी कंटेंट शेयर करना

अगर कोई व्यक्ति किसी की निजी फोटो, वीडियो या अश्लील कंटेंट उसकी अनुमति के बिना इंटरनेट या सोशल मीडिया पर अपलोड करता है, तो यह गंभीर अपराध है। यह न केवल व्यक्ति की निजता (प्राइवेसी) का उल्लंघन है, बल्कि उसकी गरिमा और मानसिक शांति पर भी गहरा असर डालता है।

ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की ये धाराएं लागू होती हैं:

  • धारा 67 IT एक्ट – अश्लील कंटेंट को ऑनलाइन प्रकाशित या प्रसारित करना
  • धारा 67A IT एक्ट – यौन प्रकृति की स्पष्ट कंटेंट को ऑनलाइन साझा करना

सज़ा: इन धाराओं के तहत दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को अधिकतम 5 साल तक की जेल हो सकती है और उस पर भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

सरल शब्दों में, किसी की निजी या अश्लील कंटेंट बिना इजाज़त शेयर करना कानूनन अपराध है और इसके लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है।

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क्या झूठी पोस्ट को शेयर या फॉरवर्ड करना भी अपराध है?

हाँ। अगर किसी व्यक्ति ने खुद झूठी पोस्ट नहीं बनाई, लेकिन यह जानते हुए कि वह गलत है फिर भी उसे शेयर या फॉरवर्ड किया, तो वह भी अपराध का भागीदार माना जा सकता है।

कानून इस बात को देखता है कि:

  • क्या व्यक्ति की नीयत गलत थी,
  • क्या उसे पता था कि जानकारी झूठी है, और
  • उस पोस्ट से कितना नुकसान या असर पड़ा।

आपराधिक उपाय – पुलिस या साइबर शिकायत कैसे करें?

अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी फैलाकर आपको नुकसान पहुँचा रहा है, तो आप कानूनी शिकायत कर सकते हैं। इसके लिए आपके पास दो आसान रास्ते हैं:

विकल्प 1: साइबर क्राइम सेल में शिकायत करें

आप ऑनलाइन सरकारी पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं: www.cybercrime.gov.in तरीका:

  • पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करें
  • “Report Cyber Crime” विकल्प चुनें
  • पूरी जानकारी और सबूत (स्क्रीनशॉट, लिंक आदि) अपलोड करें
  • शिकायत सबमिट करें

विकल्प 2: नजदीकी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराएं

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 के अनुसार, पुलिस को आपकी FIR दर्ज करनी ही होती है।

अगर पुलिस FIR दर्ज करने से मना करे:

  • तो आप लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक (SP) को भेज सकते हैं, या
  • मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दाखिल कर सकते हैं।

सिविल उपाय – मुआवज़ा मांगना

अगर सोशल मीडिया पर फैलाई गई झूठी जानकारी से आपकी बदनामी हुई है या आपको मानसिक, सामाजिक या आर्थिक नुकसान पहुँचा है, तो आप आपराधिक केस के साथ-साथ सिविल केस भी कर सकते हैं। इसके लिए आप अदालत में मानहानि का सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं। सिविल केस में अदालत से आप यह राहत माँग सकते हैं:

  • आपके नुकसान के लिए पैसों का मुआवज़ा
  • आरोपी को भविष्य में ऐसी पोस्ट डालने से रोकने का स्थायी आदेश
  • झूठी पोस्ट, वीडियो या कंटेंट को हटाने का आदेश

मुआवज़े की कोई तय सीमा नहीं होती। अदालत यह देखती है कि आपकी प्रतिष्ठा को कितना नुकसान हुआ, और उसी आधार पर उचित राशि तय करती है।

क्या कोर्ट कंटेंट हटाने का आदेश दे सकती है?

अगर सोशल मीडिया पर डाली गई झूठी या आपत्तिजनक पोस्ट से आपको नुकसान हो रहा है, तो आप अदालत से राहत माँग सकते हैं। अदालत:

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को पोस्ट हटाने का आदेश दे सकती है
  • संबंधित अकाउंट को ब्लॉक या सस्पेंड करने के निर्देश दे सकती है
  • जांच के लिए डेटा सुरक्षित रखने को कह सकती है

यह आदेश बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे गलत कंटेंट आगे फैलने से रुक जाता है और नुकसान बढ़ने से बचाया जा सकता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका

फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के पास अपनी शिकायत (Grievance) और रिपोर्टिंग सिस्टम होते हैं। अगर कोई पोस्ट, वीडियो या अकाउंट आपको नुकसान पहुँचा रहा है, तो आप सीधे प्लेटफॉर्म पर:

  • पोस्ट को रिपोर्ट कर सकते हैं
  • फर्जी या आपत्तिजनक प्रोफाइल की शिकायत कर सकते हैं
  • कंटेंट हटाने का अनुरोध कर सकते हैं
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अक्सर प्लेटफॉर्म अपनी पॉलिसी के अनुसार ऐसे कंटेंट को हटा भी देते हैं। लेकिन सिर्फ प्लेटफॉर्म पर शिकायत करना कई बार पर्याप्त नहीं होता। अगर मामला गंभीर है, तो कानूनी शिकायत करना ज्यादा प्रभावी होता है, क्योंकि इससे पुलिस जांच शुरू होती है और आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।

निष्कर्ष

डिजिटल दुनिया में एक झूठी पोस्ट सच से कहीं ज़्यादा तेज़ फैल सकती है। लेकिन किसी को भी यह हक नहीं है कि वह तकनीक का गलत इस्तेमाल करके किसी की इज़्ज़त, प्राइवेसी या मेहनत से बनाई हुई छवि को नुकसान पहुँचाए। इंटरनेट कोई बिना कानून वाली जगह नहीं है। ऑनलाइन किया गया हर काम कोई न कोई निशान छोड़ता है और कानून उस तक पहुँच सकता है।

अगर आपके खिलाफ झूठी जानकारी फैलाई गई है, तो चुप रहना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। कानून आपको मजबूत और असरदार उपाय देता है, जिससे आप गलत काम का विरोध कर सकते हैं और अपनी साख वापस पा सकते हैं। समय पर कदम उठाने से न सिर्फ आपकी रक्षा होती है, बल्कि सभी के लिए इंटरनेट को सुरक्षित बनाने में भी मदद मिलती है।

ऑनलाइन झूठ के खिलाफ खड़ा होना बदला लेने की बात नहीं है, बल्कि यह न्याय, जवाबदेही और अपनी पहचान की रक्षा करने का तरीका है।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. ऑनलाइन मानहानि और ऑफलाइन मानहानि में क्या फर्क है?

ऑनलाइन मानहानि तब होती है जब किसी की बदनामी सोशल मीडिया या इंटरनेट पर की जाए। ऑफलाइन मानहानि तब होती है जब कोई व्यक्ति बोलकर या छपे हुए शब्दों में बदनामी करे। कानून की नजर में दोनों अपराध हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ऑनलाइन मामलों में आईटी एक्ट भी लागू हो सकता है।

2. अगर झूठी बात किसी प्राइवेट ग्रुप या बंद चैट में डाली जाए तो क्या कार्रवाई हो सकती है?

हाँ। अगर किसी प्राइवेट ग्रुप या चैट में डाली गई बात से आपकी बदनामी होती है, आपकी प्राइवेसी टूटती है या आपको मानसिक परेशानी होती है, तो उस पर भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। ग्रुप का प्राइवेट होना आरोपी को नहीं बचाता।

3. ऑनलाइन मानहानि के मामले में कोर्ट क्या मुआवज़ा दे सकती है?

कोर्ट बदनामी, मानसिक तनाव, बिज़नेस नुकसान आदि के लिए पैसों का मुआवज़ा दे सकती है। साथ ही आरोपी को आगे ऐसी पोस्ट डालने से रोकने का आदेश भी दे सकती है।

4. क्या कोई कंपनी या बिज़नेस सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने के खिलाफ केस कर सकता है?

हाँ। अगर किसी झूठी पोस्ट से कंपनी या ब्रांड की साख खराब होती है, तो वह आपराधिक शिकायत और सिविल मानहानि का केस दोनों कर सकता है।

5. क्या बड़े फॉलोअर्स वाले इंफ्लुएंसर या पेज पर भी कार्रवाई हो सकती है?

हाँ। इंफ्लुएंसर और बड़े पेज अपने कंटेंट के लिए जिम्मेदार होते हैं। ज्यादा फॉलोअर्स होने से उन्हें कोई कानूनी छूट नहीं मिलती।

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