भारत के संविधान ने हर व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है। इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी कारण और बिना सही प्रक्रिया के हिरासत में नहीं रखा जा सकता। फिर भी कई बार ऐसा देखा जाता है कि पुलिस किसी व्यक्ति को बिना ठोस वजह, बिना कागज़ी कार्रवाई, या तय समय से ज्यादा देर तक हिरासत में रख लेती है, जो कानून के खिलाफ है।
अगर किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाता है, तो यह केवल परेशानी की बात नहीं है, बल्कि उसके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन भी है। कानून ऐसे मामलों में व्यक्ति को सुरक्षा देता है और तुरंत राहत पाने के लिए उपाय भी बताता है। यह लेख बताएगा कि अवैध हिरासत क्या होती है, इसे कैसे पहचाना जाए, और ऐसे समय में तुरंत कौन-से कानूनी कदम उठाने चाहिए। इन बातों की जानकारी होने से व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा आत्मविश्वास और सही तरीके से कर सकता है।
इल्लीगल डिटेंशन क्या होता है?
इल्लीगल डिटेंशन तब माना जाता है जब पुलिस किसी व्यक्ति को कानूनी अधिकार या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अपने नियंत्रण में रखती है। कानून के अनुसार, पुलिस किसी को भी मनमाने ढंग से नहीं रोक सकती। हर हिरासत या गिरफ्तारी के पीछे ठोस कानूनी कारण और सही प्रक्रिया होना अनिवार्य है।
निम्न परिस्थितियों में इल्लीगल डिटेंशन माना जाएगा:
- जब आपको बिना औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए हिरासत में रखा जाए,
- जब गिरफ्तारी का कारण आपको स्पष्ट रूप से न बताया जाए,
- जब आपको कानून द्वारा तय समय से अधिक समय तक रोका जाए,
- जब पुलिस स्टेशन की डायरी (रोजनामचा) में आपकी हिरासत का कोई रिकॉर्ड दर्ज न किया जाए, या
- जब आपको वकील से मिलने या बात करने की अनुमति न दी जाए।
सरल शब्दों में कहें तो, यदि पुलिस आपको थाने या किसी अन्य स्थान पर बिना सही कानूनी प्रक्रिया अपनाए बैठाए रखती है, पूछताछ के नाम पर घंटों या दिनों तक रोकती है, या आपके अधिकारों को अनदेखा करती है, तो यह इल्लीगल डिटेंशन कहलाता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को तुरंत कानूनी मदद लेने का पूरा अधिकार है।
आपके संवैधानिक अधिकार
अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसका सीधा मतलब है कि किसी भी व्यक्ति की आज़ादी केवल कानून द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार ही छीनी जा सकती है। पुलिस आपकी स्वतंत्रता को मनमर्जी से नहीं छीन सकती।
अनुच्छेद 22 – गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार
अगर पुलिस आपको गिरफ्तार करती है, तो आपके ये अधिकार होते हैं:
- आपको तुरंत बताया जाए कि आपको क्यों गिरफ्तार किया गया है
- आपको वकील से सलाह लेने और अपना बचाव करवाने का अधिकार है
- आपको 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए
यदि पुलिस इन अधिकारों का पालन नहीं करती, तो ऐसी हिरासत इल्लीगल डिटेंशन मानी जाएगी और व्यक्ति को कानूनी राहत पाने का पूरा अधिकार है।
अरेस्ट और डिटेंशन में अंतर
| आधार | अरेस्ट | डिटेंशन |
| अर्थ | कानून के तहत औपचारिक गिरफ्तारी | शारीरिक रूप से रोककर रखना / बंद रखना |
| कानूनी प्रक्रिया | पूरी कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेज़ों के साथ | कई बार बिना सही प्रक्रिया के भी किया जाता है |
| कागज़ी कार्रवाई | गिरफ्तारी मेमो, रिकॉर्ड और एंट्री अनिवार्य | अक्सर कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं होता |
| जानकारी देना | गिरफ्तारी का कारण बताया जाता है | कई बार कारण नहीं बताया जाता |
| वैधता | कानून के अनुसार हो तो वैध | बिना गिरफ्तारी दिखाए रोका जाए तो अक्सर इल्लीगल डिटेंशन |
सरल शब्दों में: यदि पुलिस आपको बिना औपचारिक अरेस्ट दिखाए केवल रोककर रखती है, तो यह अक्सर इल्लीगल डिटेंशन माना जाता है।
पुलिस आपको कब कानूनी रूप से डिटेन या अरेस्ट कर सकती है?
धारा 41, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अनुसार, पुलिस बिना वारंट केवल उन्हीं स्थितियों में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है जब इसके पीछे ठोस और वैध कारण हों। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बेवजह न छीना जाए।
पुलिस निम्न परिस्थितियों में ही बिना वारंट अरेस्ट कर सकती है:
- जब कोई संज्ञेय अपराध किया गया हो या किया जा रहा हो
- जब किसी व्यक्ति पर अपराध करने का उचित संदेह हो
- जब गिरफ्तारी करना आगे अपराध होने से रोकने के लिए आवश्यक हो
- जब यह आशंका हो कि व्यक्ति सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है
- जब यह जरूरी हो कि व्यक्ति की कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित की जाए
इसके अलावा, पुलिस को यह भी रिकॉर्ड करना होता है कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी है। यदि इन में से कोई भी शर्त मौजूद नहीं है और फिर भी पुलिस आपको रोककर रखती है या गिरफ्तार करती है, तो ऐसी स्थिति इल्लीगल डिटेंशन या गैरकानूनी गिरफ्तारी मानी जाएगी।
यदि पुलिस आपको इल्लीगल डिटेंशन में रखती है तो तुरंत क्या करें
स्टेप 1: हिरासत का कारण पूछें
सबसे पहले शांत रहें और विनम्रता से पुलिस से पूछें कि क्या आपको गिरफ्तार किया गया है या नहीं, और यदि किया गया है तो किस धारा के तहत किया गया है। कानून के अनुसार, पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह आपको आपकी गिरफ्तारी या हिरासत का कारण स्पष्ट रूप से बताए। यदि पुलिस कोई स्पष्ट जवाब नहीं देती, तो यह इल्लीगल डिटेंशन की ओर इशारा करता है।
स्टेप 2: अरेस्ट मेमो की मांग करें
गिरफ्तारी के समय पुलिस को अरेस्ट मेमो बनाना अनिवार्य है। इसमें गिरफ्तारी की तारीख और समय, गिरफ्तारी का कारण, गिरफ्तार करने वाले अधिकारी का नाम और एक गवाह के हस्ताक्षर होने चाहिए। यदि पुलिस अरेस्ट मेमो देने से मना करती है, तो यह गैरकानूनी प्रक्रिया मानी जाती है।
स्टेप 3: वकील से बात करने की मांग करें
आपको वकील से परामर्श करने और बात करने का पूरा अधिकार है, चाहे गिरफ्तारी हुई हो या केवल डिटेंशन। पुलिस आपको इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। वकील से बात करने से आपको सही कानूनी मार्गदर्शन मिलेगा और आपकी सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
स्टेप 4: परिवार या दोस्त को सूचना देने को कहें
कानून के अनुसार, पुलिस को आपके किसी एक परिवार सदस्य या मित्र को आपकी हिरासत की जानकारी देने की अनुमति देनी होती है। आपको कम से कम एक फोन कॉल करने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि कोई भरोसेमंद व्यक्ति आपकी स्थिति जान सके और आवश्यक मदद कर सके।
स्टेप 5: खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर न करें
कभी भी किसी भी दस्तावेज़ पर बिना पढ़े या समझे हस्ताक्षर न करें, खासकर यदि वह खाली हो। पुलिस द्वारा दबाव डालकर हस्ताक्षर करवाना गलत है और भविष्य में आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। हमेशा पहले दस्तावेज़ पढ़ें या वकील से दिखाने के बाद ही साइन करें।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश – डी.के. बसु केस
डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1997 मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर कुछ अनिवार्य नियम तय किए हैं, जिनका पालन हर पुलिस अधिकारी को करना होता है। इनमें शामिल हैं:
- पुलिस अधिकारी अपनी पहचान (नाम और पद) बताएंगे
- गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो बनाया जाएगा
- हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मेडिकल परीक्षण कराया जाएगा
- परिवार के किसी सदस्य या मित्र को तुरंत सूचना दी जाएगी
- 24 घंटे के भीतर व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा
यदि पुलिस इन नियमों का पालन नहीं करती, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और आपराधिक केस दोनों हो सकते हैं।
पुलिस आपको अधिकतम कितने समय तक रख सकती है?
पुलिस किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक अपने पास नहीं रख सकती, जब तक कि उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश न कर दिया जाए।
यदि पुलिस 24 घंटे से ज्यादा समय तक आपको बिना कोर्ट के आदेश के रोककर रखती है, तो यह साफ तौर पर इल्लीगल डिटेंशन माना जाएगा और आपको तुरंत कानूनी राहत पाने का अधिकार है।
इल्लीगल डिटेंशन से राहत पाने के कानूनी उपाय क्या है?
1. हेबियस कार्पस पिटीशन दाखिल करें
हेबियस कार्पस का मतलब होता है – “व्यक्ति को कोर्ट के सामने पेश करो।” यदि किसी व्यक्ति को इल्लीगल डिटेंशन में रखा गया है, तो उसके परिवार वाले या वकील हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कार्पस पिटीशन दाखिल कर सकते हैं। कोर्ट पुलिस को आदेश देती है कि वह हिरासत में रखे गए व्यक्ति को पेश करे और बताए कि उसे क्यों रोका गया है। यदि कोर्ट को हिरासत गैरकानूनी लगती है, तो तुरंत रिहाई का आदेश दिया जाता है।
2. मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत
BNSS के प्रावधानों के तहत, आप इल्लीगल डिटेंशन के खिलाफ मजिस्ट्रेट के सामने लिखित शिकायत दे सकते हैं। मजिस्ट्रेट पुलिस से जवाब तलब कर सकता है, जांच के आदेश दे सकता है, संबंधित पुलिस अधिकारियों को सम्मन जारी कर सकता है और जरूरत पड़ने पर FIR दर्ज करने का निर्देश भी दे सकता है।
3. पुलिस के खिलाफ FIR दर्ज कराएं
इल्लीगल डिटेंशन कई मामलों में गलत तरीके से कैद, अधिकारों का दुरुपयोग और धमकाने जैसे अपराध बन सकता है। ऐसे में जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कराई जा सकती है, ताकि उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो सके।
4. मानवाधिकार आयोग में शिकायत
आप नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) या अपने राज्य के स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन में भी शिकायत कर सकते हैं। ये आयोग मामले की जांच कर सकते हैं और पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा देने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर सकते हैं।
क्या आप कंपनसेशन मांग सकते हैं?
हाँ। यदि किसी व्यक्ति को इल्लीगल डिटेंशन में रखा गया है, तो कोर्ट ऐसे मामलों में आर्थिक मुआवजा देने का आदेश दे सकती है। यह मुआवजा उस मानसिक परेशानी, अपमान और नुकसान के लिए होता है जो व्यक्ति को सहना पड़ा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मुआवजे की मांग आपराधिक केस से अलग होती है। यानी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केस चलने के साथ-साथ आप मुआवजे के लिए भी अलग से राहत मांग सकते हैं।
यदि पुलिस आपको धमकाए या प्रताड़ित करे तो क्या करें?
- मेडिकल जांच की मांग करें: तुरंत डॉक्टर से मेडिकल टेस्ट कराने को कहें, ताकि चोटों और अत्याचार का रिकॉर्ड बन सके।
- मजिस्ट्रेट को तुरंत बताएं: पेशी के समय मजिस्ट्रेट को साफ बताएं कि आपके साथ मारपीट या धमकी दी गई है।
- वकील से न्यायिक जांच की मांग: आपका वकील कोर्ट से न्यायिक जांच की मांग कर सकता है।
- कस्टोडियल टॉर्चर गंभीर अपराध: हिरासत में टॉर्चर देना कानूनन गंभीर अपराध है और सख्त सजा हो सकती है।
जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1994)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस मनमाने तरीके से किसी व्यक्ति को पकड़ या हिरासत में नहीं रख सकती। इस मामले में जोगिंदर कुमार को पुलिस ने बिना वारंट, बिना अरेस्ट मेमो और बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए कई दिनों तक हिरासत में रखा रखा था। उसकी परिवार को भी उसकी लोकेशन नहीं बताई गई थी, जिससे उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस को सिर्फ इसलिए गिरफ्तारी नहीं करनी चाहिए कि उसके पास अधिकार है। अरेस्ट तभी किया जाना चाहिए जब कानूनी कारण और आवश्यक आवश्यकता हो, जैसे कि अपराध के गंभीर होने, व्यक्ति भाग सकता हो, या सबूत नष्ट कर सकता हो। उसे हत्या या अन्य गंभीर शिकायतों पर ही हिरासत में लिया जाना चाहिए, और “संदेह” मात्र पर्याप्त आधार नहीं है।
कोर्ट ने पुलिस के लिए भी स्पष्ट निर्देश दिए, जैसे:
- गिरफ्तार व्यक्ति को उसके अधिकारों के बारे में बताएँ
- परिवार या मित्र को हिरासत की जानकारी दें
- हिरासत का रिकॉर्ड पुलिस डायरी में दर्ज करें
- व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करें
इस फैसले ने यह स्थापित किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) और गैरकानूनी गिरफ्तारी से सुरक्षा (अनुच्छेद 22) को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और पुलिस को अपने अधिकारों का न्यायसंगत और संतुलित उपयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष
इल्लीगल डिटेंशन केवल एक छोटी कानूनी गलती नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की आज़ादी, सम्मान और अधिकारों पर सीधा हमला है। हमारा देश कानून और लोकतंत्र के सिद्धांतों पर चलता है, जहाँ हर ताकत का इस्तेमाल सीमाओं के भीतर होना चाहिए, चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो। जब ये सीमाएँ पार की जाती हैं, तो कानून ही नागरिक की सबसे बड़ी ढाल बनता है।
अगर आपके साथ या आपके किसी अपने के साथ इल्लीगल डिटेंशन होता है, तो चुप रहना समाधान नहीं है। समय पर कानूनी कदम उठाना, सही जानकारी इकट्ठा करना और अनुभवी वकील से सलाह लेना बहुत जरूरी है। इससे आप खुद को बेबस महसूस करने के बजाय अपने अधिकारों के लिए मजबूती से खड़े हो सकते हैं।
अंत में, संविधान किसी एक पक्ष का नहीं है – वह नागरिक और सत्ता के बीच संतुलन बनाता है। जब आप अपने अधिकारों और उपायों को जानते हैं, तो कोई भी गैरकानूनी काम बिना सवाल उठे नहीं रह सकता और कोई भी आवाज़ अनसुनी नहीं जाती। अपने अधिकारों की रक्षा करके आप न केवल खुद को, बल्कि पूरे न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
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FAQs
1. क्या पुलिस बिना लिखित अरेस्ट मेमो दिए किसी व्यक्ति को रोक सकती है?
नहीं। कानून के अनुसार पुलिस को गिरफ्तारी के समय लिखित अरेस्ट मेमो बनाना जरूरी है, जिसमें तारीख, समय और गिरफ्तारी का कारण लिखा हो। यह मेमो एक गवाह और गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर के साथ होना चाहिए। इसके बिना किया गया डिटेंशन इल्लीगल डिटेंशन माना जा सकता है।
2. पुलिस किसी व्यक्ति को कितने समय तक थाने में रख सकती है?
पुलिस किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा समय तक अपने पास नहीं रख सकती, जब तक उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश न किया जाए। यात्रा का समय अलग माना जाता है। इससे ज्यादा समय तक रोकना संविधान के खिलाफ है।
3. अगर हिरासत में रखा व्यक्ति बात न कर पाए तो क्या परिवार कोर्ट जा सकता है?
हाँ। परिवार के सदस्य या दोस्त उसकी तरफ से हेबियस कार्पस पिटीशन या कोर्ट व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने शिकायत कर सकते हैं।
4. क्या इल्लीगल डिटेंशन से हुई मानसिक परेशानी के लिए मुआवजा मिल सकता है?
हाँ। कोर्ट ऐसे मामलों में आर्थिक मुआवजा देने का आदेश दे सकती है, यदि व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो।
5. क्या ऐसे मामलों में तुरंत वकील से संपर्क करना चाहिए?
बिल्कुल। जितनी जल्दी वकील से बात की जाएगी, उतनी जल्दी सही कानूनी कार्रवाई होगी और रिहाई की संभावना बढ़ेगी।



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