Can senior citizens claim maintenance from their children

क्या वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों से मेंटेनेंस की मांग कर सकते हैं?

बुजुर्ग माता-पिता ने अपने बच्चों की परवरिश और भविष्य बनाने में पूरा जीवन लगा दिया होता है, लेकिन बुढ़ापे में कई बार उन्हें आर्थिक मदद और इलाज के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। जब बच्चे उनकी देखभाल या खर्च उठाने से मना कर देते हैं, तो माता-पिता के मन में सवाल उठता है कि क्या वे कानूनी रूप से मेंटेनेंस माँग सकते हैं।

हाँ, कानून की जरूरी शर्तें पूरी होने पर माता-पिता अपने बच्चों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं। भारत में कानून बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों की रक्षा करता है और उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कानूनी सहायता लेने का अधिकार देता है।

बुजुर्ग माता-पिता को मेंटेनेंस माँगने का अधिकार किस कानून से मिलता है?

भारत में बुजुर्ग माता-पिता को मेंटेनेंस माँगने का अधिकार मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007 के तहत मिलता है।

यह कानून उन बुजुर्ग माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की मदद के लिए बनाया गया है, जो अपना खर्च खुद नहीं उठा सकते और जिनके बच्चे या जिम्मेदार रिश्तेदार उनकी आर्थिक मदद करने से मना कर देते हैं।

इस कानून की धारा 4 में मेंटेनेंस माँगने के अधिकार का प्रावधान है। धारा 5 के तहत इसके लिए आवेदन किया जा सकता है और धारा 9 के अनुसार, जरूरी कानूनी शर्तें पूरी होने पर मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल हर महीने खर्च देने का आदेश दे सकता है।

इस कानून के तहत मेंटेनेंस में रोजमर्रा की जरूरी चीजें शामिल हो सकती हैं, जैसे:

  • खाने-पीने और कपड़ों का खर्च।
  • रहने के लिए उचित जगह।
  • दवाइयों और इलाज का खर्च।
  • सम्मान के साथ जीवन बिताने के लिए जरूरी दूसरे खर्च।

इस कानून में बुजुर्गों की देखभाल और उनकी प्रॉपर्टी की सुरक्षा से जुड़े दूसरे प्रावधान भी हैं।

यह अधिकार केवल बुजुर्ग पिता तक सीमित नहीं है। माँ, विधवा माँ और अन्य पात्र माता-पिता भी कानून की शर्तें पूरी होने पर मेंटेनेंस माँग सकते हैं। यह अधिकार केवल बेटा होने पर निर्भर नहीं करता; पात्र माता-पिता अपनी बेटी या अन्य जिम्मेदार संतान से भी कानून के अनुसार सहायता माँग सकते हैं।

ध्यान दें: मामला दर्ज करने से पहले अपने राज्य में लागू नियमों और आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी लेना जरूरी है।

भारतीय कानून के अनुसार वरिष्ठ नागरिक किसे माना जाता है?

वर्ष 2007 के कानून की धारा 2(h) के अनुसार, जिस भारतीय नागरिक की उम्र 60 साल या उससे अधिक है, उसे वरिष्ठ नागरिक (Senior Citizen) माना जाता है।

हालाँकि, केवल 60 साल या उससे अधिक उम्र होने से हर व्यक्ति को अपने आप मेंटेनेंस मिलने का आदेश नहीं मिल जाता। इसके लिए कानून में दी गई दूसरी जरूरी शर्तें भी पूरी होनी चाहिए।

अगर माता-पिता की उम्र 60 साल से कम है, तब भी वे अपने बालिग़ बच्चों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं, क्योंकि इस कानून में माता-पिता के अधिकारों के लिए अलग प्रावधान हैं। इसके अलावा, दूसरे लागू कानूनों के तहत भी मेंटेनेंस माँगने का विकल्प हो सकता है।

इसलिए, माता-पिता को यह नहीं सोचना चाहिए कि बच्चों से आर्थिक सहायता माँगने के लिए 60 साल की उम्र पूरी होने तक इंतजार करना जरूरी है। उनकी परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर वे पहले भी मेंटेनेंस माँग सकते हैं।

क्या माता-पिता अपने बेटे और बेटी, दोनों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं?

हाँ, कानून की जरूरी शर्तें पूरी होने पर माता-पिता अपने बालिग़ बच्चों, यानी बेटे और बेटी, दोनों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं। कानून के अनुसार, माता-पिता की देखभाल करने की जिम्मेदारी केवल बेटे की नहीं होती। लागू कानून और परिस्थितियों के अनुसार, बेटी की भी अपने माता-पिता को मेंटेनेंस देने की कानूनी जिम्मेदारी हो सकती है।

वर्ष 2007 के कानून की धारा 4 के अनुसार, माता-पिता या दादा-दादी अपने एक या एक से अधिक बालिग़ बच्चों के खिलाफ मेंटेनेंस के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वे अपनी जरूरी जरूरतें पूरी कर सकें और सम्मान के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

इसलिए, माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उनकी संतान बेटा है या बेटी।

अगर बच्चे दूसरे शहर या विदेश में रहते हैं, तो क्या होगा? यदि बच्चे किसी दूसरे शहर में रहते हैं, तो केवल इस वजह से माता-पिता के प्रति उनकी कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

हालाँकि, हर मामले में लागू कानून और संबंधित अधिकारी के अधिकार क्षेत्र को देखना जरूरी है। यदि बच्चा विदेश में रहता है, तो कानूनी नोटिस पहुँचाने, मामला कहाँ दर्ज किया जा सकता है और आदेश को लागू करवाने जैसी व्यावहारिक परेशानियाँ आ सकती हैं।

ऐसी स्थिति में, सही कानूनी प्रक्रिया समझने और उचित कदम उठाने के लिए किसी वकील से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

अगर माता-पिता का कोई बेटा नहीं है, तो क्या वे मेंटेनेंस माँग सकते हैं?

अगर किसी बुजुर्ग माता-पिता का बेटा नहीं है, तो भी उनका मेंटेनेंस माँगने का अधिकार खत्म नहीं होता। कानून की जरूरी शर्तें पूरी होने पर वे अपनी बालिग़ बेटी या अन्य जिम्मेदार संतान से मेंटेनेंस माँग सकते हैं।

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वर्ष 2007 के कानून में उन वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी प्रावधान है, जिनकी कोई संतान नहीं है। ऐसे बुजुर्ग कुछ परिस्थितियों में अपने उन रिश्तेदारों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं, जो कानून के अनुसार उनकी देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।

हालाँकि, इस कानून में रिश्तेदार (Relative) शब्द का एक विशेष कानूनी अर्थ है। आम तौर पर इसमें ऐसा बालिग़ कानूनी वारिस शामिल हो सकता है, जिसके पास बुजुर्ग की देखभाल करने के लिए पर्याप्त साधन हों और जो उनकी प्रॉपर्टी पर कब्जा रखता हो या उनकी मृत्यु के बाद उस प्रॉपर्टी का वारिस बन सकता हो। इसके लिए कानून में दी गई शर्तें पूरी होना जरूरी है।

यदि एक से अधिक रिश्तेदार कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं, तो कानून के अनुसार उनके संभावित विरासत के अधिकारों के अनुपात में मेंटेनेंस की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

मेंटेनेंस माँगने के लिए क्या-क्या शर्तें पूरी होनी चाहिए?

कानून बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन मेंटेनेंस पाने के लिए संबंधित कानूनी शर्तों को पूरा करना जरूरी है। माँगने के लिए कुछ जरूरी बातें निम्नलिखित हैं।

1. माता-पिता अपना खर्च उठाने में सक्षम न हों

आवेदन करने वाले माता-पिता को यह बताना होगा कि उनकी अपनी कमाई या प्रॉपर्टी से उनकी जरूरी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति रिटायर हो चुका है और उसे हर महीने थोड़ी-सी पेंशन मिलती है। लेकिन उस पेंशन से दवाइयों, इलाज, खाने-पीने और घर के खर्च पूरे नहीं हो पाते।

इसलिए, केवल थोड़ी-बहुत कमाई होने का मतलब यह नहीं है कि बुजुर्ग अपना खर्च आसानी से उठा सकते हैं। उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति को देखना जरूरी है।

2. बच्चे या रिश्तेदार की आर्थिक स्थिति अच्छी हो

जिस बच्चे या रिश्तेदार से मेंटेनेंस माँगा जा रहा है, उसकी आर्थिक स्थिति भी देखी जा सकती है। संबंधित अधिकारी उसकी सैलरी, पेंशन, कारोबार से होने वाली कमाई, प्रॉपर्टी, दूसरी आर्थिक जिम्मेदारियों और अन्य जरूरी परिस्थितियों पर विचार कर सकता है। इन बातों के आधार पर तय किया जा सकता है कि कितना मेंटेनेंस देना उचित होगा।

बच्चे की आर्थिक स्थिति के बारे में केवल अनुमान लगाने के बजाय, उपलब्ध सबूतों और लागू कानून के आधार पर फैसला किया जाता है।

3. माता-पिता की अनदेखी की जा रही हो या मदद देने से मना किया जा रहा हो

यदि बच्चे अपने पात्र माता-पिता की देखभाल नहीं करते या उनकी आर्थिक मदद करने से मना कर देते हैं, तो कानून के तहत माता-पिता उचित राहत माँग सकते हैं।

आवेदन में माता-पिता को अपनी आर्थिक जरूरतों के बारे में बताना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने कब और किस तरह मदद माँगी थी और बच्चों ने सहायता देने से कब या कैसे मना किया।

4. माँगी गई रकम वास्तविक जरूरतों के अनुसार हो

माता-पिता को जितने मेंटेनेंस की जरूरत है, उसकी माँग उचित होनी चाहिए और उनकी वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार होनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, दवाइयों, नियमित इलाज, किराए, खाने-पीने और दूसरी जरूरी चीजों का खर्च यह समझाने में मदद कर सकता है कि उन्हें मेंटेनेंस की आवश्यकता क्यों है।

एक वरिष्ठ नागरिक कितना मेंटेनेंस माँग सकता है?

हर बुजुर्ग माता-पिता को मेंटेनेंस के रूप में एक निश्चित रकम मिलने का नियम नहीं है। कितनी रकम मिल सकती है, यह लागू कानून, माता-पिता की जरूरतों, बच्चे या रिश्तेदार की आर्थिक स्थिति और मामले की दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

हालाँकि, माता-पिता जितनी रकम माँगते हैं, जरूरी नहीं कि उन्हें उतनी ही रकम देने का आदेश दिया जाए। अंतिम रकम मामले की परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार तय होती है।

वर्ष 2007 के केंद्रीय कानून की धारा 9(2) के मूल प्रावधान में हर महीने अधिकतम ₹10,000 मेंटेनेंस देने की सीमा दी गई थी। लेकिन समय के साथ हुए संशोधनों और अलग-अलग राज्यों में लागू नियमों के कारण मौजूदा कानूनी स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए, किसी निश्चित रकम की सीमा पर भरोसा करने से पहले अपने राज्य में लागू वर्तमान नियमों की जाँच करना जरूरी है।

इसलिए, माता-पिता को अपने हर महीने के जरूरी खर्चों का सही हिसाब तैयार करना चाहिए और कानूनी सलाह लेनी चाहिए, ताकि वे समझ सकें कि कानून के तहत कितनी रकम माँग सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिक मेंटेनेंस का मामला कहाँ दर्ज करा सकते हैं?

यदि कोई बुजुर्ग अपना खर्च खुद नहीं उठा सकता, तो वह वर्ष 2007 के कानून के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकता है।

आवेदन कहाँ जमा करना है, यह राज्य के नियमों पर निर्भर करता है। कई जगहों पर सब -डिविशनल अफसर (SDO), सब – डिविशनल मजिस्ट्रेट (SDM) या अन्य निर्धारित अधिकारी इस काम के लिए जिम्मेदार होते हैं।

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बुजुर्ग माता-पिता अपने जिले के एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस या सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट से संपर्क करके आवेदन की सही प्रक्रिया जान सकते हैं। जरूरत पड़ने पर वकील की मदद भी ली जा सकती है।

वरिष्ठ नागरिक मेंटेनेंस के लिए आवेदन कैसे कर सकते हैं?

मेंटेनेंस के लिए आवेदन करते समय ये कदम अपनाए जा सकते हैं:

स्टेप 1: मेंटेनेंस के लिए आवेदन तैयार करें

आवेदन में अपनी उम्र, आर्थिक स्थिति, हर महीने के खर्च, इलाज की जरूरतों और इस बात की जानकारी दें कि आपके बच्चे या जिम्मेदार रिश्तेदार आपकी पर्याप्त आर्थिक मदद क्यों नहीं कर रहे हैं।

स्टेप 2: जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करें

निम्नलिखित दस्तावेजों की कॉपी अपने पास रखें:

  • पहचान पत्र और उम्र का प्रमाण।
  • आय या पेंशन से जुड़े दस्तावेज।
  • दवाइयों और इलाज के बिल।
  • हर महीने होने वाले खर्चों का विवरण।
  • बच्चों या रिश्तेदारों से हुई बातचीत या संदेश, जिनसे मदद माँगने और मना किए जाने की बात साबित हो सके।

स्टेप 3: सही मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन जमा करें

अपने राज्य के लागू नियमों के अनुसार निर्धारित अधिकारी या ट्रिब्यूनल के सामने आवेदन जमा करें। आवेदन का सही प्रारूप, जमा करने का तरीका और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी पहले प्राप्त कर लें।

स्टेप 4: सुनवाई में शामिल हों

ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देता है। इसके बाद मामले से जुड़े तथ्यों और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर विचार किया जाता है।

स्टेप 5: आदेश प्राप्त करें और उसका पालन करवाएँ

यदि कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो ट्रिब्यूनल बच्चों या जिम्मेदार रिश्तेदारों को हर महीने मेंटेनेंस देने का आदेश दे सकता है। यदि वे आदेश का पालन नहीं करते, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत उसे लागू करवाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।

क्या कोई दूसरा व्यक्ति बुजुर्ग माता-पिता की ओर से आवेदन कर सकता है? हाँ। कानून की धारा 5 के अनुसार, यदि बुजुर्ग बीमारी या शारीरिक परेशानी के कारण खुद आवेदन नहीं कर सकते, तो उनकी ओर से कोई अधिकृत व्यक्ति या संस्था आवेदन कर सकती है। कानून के अनुसार, ट्रिब्यूनल स्वयं भी मामले पर विचार शुरू कर सकता है।

मेंटेनेंस के मामले का फैसला होने में कितना समय लगता है?

वर्ष 2007 के कानून की धारा 5(4) के अनुसार, संबंधित बच्चे या रिश्तेदार को नोटिस मिलने के बाद 90 दिनों के भीतर आवेदन का निपटारा किया जाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में लिखित कारण दर्ज करके यह अवधि एक बार में अधिकतम 30 दिन बढ़ाई जा सकती है।

हालाँकि, नोटिस पहुँचने, सबूत जुटाने और सुनवाई जैसी परिस्थितियों के कारण वास्तविक समय अलग हो सकता है।

क्या मामला लंबित रहने के दौरान भी मेंटेनेंस मिल सकता है? हाँ। धारा 5(2) के तहत, ट्रिब्यूनल मामला लंबित रहने के दौरान अंतरिम मेंटेनेंस देने का आदेश दे सकता है। इसकी रकम और मंजूरी मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

यदि बच्चे ट्रिब्यूनल के आदेश के बावजूद मेंटेनेंस देने से मना कर दें, तो क्या होगा?

यदि बच्चे या जिम्मेदार रिश्तेदार बिना उचित कारण के मेंटेनेंस देने के आदेश का पालन नहीं करते, तो कानून की धारा 5(8) के तहत वसूली की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

कानूनी शर्तें पूरी होने पर बकाया रकम वसूलने के लिए वारंट जारी किया जा सकता है और संबंधित प्रावधान के तहत एक महीने तक की कैद भी हो सकती है। हालाँकि, भुगतान में देरी होने से अपने आप जेल नहीं होती; निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

ऐसी स्थिति में माता-पिता को ट्रिब्यूनल के आदेश की प्रति, बकाया रकम का रिकॉर्ड और संबंधित संदेश या पत्र सुरक्षित रखने चाहिए। इन दस्तावेजों की मदद से वे ट्रिब्यूनल में आदेश लागू करवाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

अगर वरिष्ठ नागरिक ने अपनी प्रॉपर्टी बच्चों के नाम कर दी है, तो क्या होगा?

प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद बुजुर्ग माता-पिता के लिए बड़ी परेशानी बन सकते हैं। कई बार माता-पिता प्यार और भरोसे के कारण अपना घर, जमीन या दूसरी प्रॉपर्टी बच्चों के नाम कर देते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि बच्चे बदले में उनके खाने-पीने, रहने और इलाज का ध्यान रखेंगे। लेकिन कुछ मामलों में प्रॉपर्टी मिलने के बाद बच्चे माता-पिता की देखभाल करना बंद कर देते हैं।

वर्ष 2007 के कानून की धारा 23 ऐसी कुछ परिस्थितियों में बुजुर्गों को कानूनी राहत देती है। यदि किसी वरिष्ठ नागरिक ने इस कानून के लागू होने के बाद इस शर्त पर अपनी प्रॉपर्टी किसी को दी थी कि वह उनकी जरूरी जरूरतों और देखभाल का ध्यान रखेगा, लेकिन वह ऐसा नहीं करता, तो ट्रिब्यूनल कुछ शर्तें पूरी होने पर प्रॉपर्टी के ट्रांसफर को रद्द घोषित कर सकता है।

हालाँकि, प्रॉपर्टी के दस्तावेज, उसमें लिखी शर्तें और उपलब्ध सबूत महत्वपूर्ण होते हैं। केवल पारिवारिक विवाद होने से हर प्रॉपर्टी का उपहार या ट्रांसफर अपने आप रद्द नहीं हो जाता।

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क्या बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों को घर खाली करने के लिए कह सकते हैं?

कुछ परिस्थितियों में वरिष्ठ नागरिक लागू कानूनी प्रक्रिया के तहत अपने घर या प्रॉपर्टी से बच्चे या रिश्तेदार को बाहर निकालने की माँग कर सकते हैं। लेकिन मेंटेनेंस का विवाद होने मात्र से घर खाली कराने का आदेश अपने आप नहीं मिल जाता।

वर्ष 2025 में कमलाकांत मिश्र बनाम अपर कलेक्टर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत ट्रिब्यूनल की शक्तियों और प्रॉपर्टी से बेदखली से जुड़े मुद्दों पर विचार किया। राहत मिलेगी या नहीं, यह लागू कानून और मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।

यदि कोई बुजुर्ग अपना घर वापस लेना चाहता है, तो उसे प्रॉपर्टी के कागजात, ट्रांसफर की शर्तों, घर में रहने वाले अन्य लोगों के अधिकारों और राज्य में लागू नियमों के बारे में वकील से सलाह लेनी चाहिए।

उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित एवं अन्य (2025)

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: इस मामले में उर्मिला दीक्षित नाम की एक बुजुर्ग माँ ने अपने बेटे को इस उम्मीद में प्रॉपर्टी उपहार दी थी कि वह उनकी और उनके पति की देखभाल करेगा। जब बेटे ने कथित तौर पर इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं किया, तो माँ ने वर्ष 2007 के कानून की धारा 23 के तहत गिफ्ट डीड रद्द करने के लिए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने माँ के पक्ष में फैसला देते हुए गिफ्ट डीड रद्द करने वाले आदेश को बहाल किया। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए इस कानून की प्रभावी ढंग से व्याख्या की जानी चाहिए। कानूनी शर्तें पूरी होने पर ट्रिब्यूनल प्रॉपर्टी का ट्रांसफर रद्द करने और प्रॉपर्टी का कब्जा वापस दिलाने का आदेश दे सकता है।

इस फैसले का कानूनी महत्व: यदि कोई बुजुर्ग अपनी प्रॉपर्टी इस शर्त पर किसी को देता है कि वह उसकी देखभाल और मेंटेनेंस करेगा, लेकिन वह व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करता, तो धारा 23 के तहत प्रॉपर्टी का ट्रांसफर रद्द कराया जा सकता है। इसके लिए दस्तावेजों और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है।

निष्कर्ष

भारत में बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा यह दर्शाती है कि पारिवारिक रिश्तों में केवल प्यार ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारियाँ भी होती हैं। मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007 इस जिम्मेदारी को कानूनी मान्यता देता है। वहीं, उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित एवं अन्य (2025) जैसे फैसले बुजुर्गों की उपेक्षा और उनकी प्रॉपर्टी की सुरक्षा के महत्व को उजागर करते हैं। हालाँकि, अपने अधिकारों की जानकारी और समय पर कानूनी सहायता मिलना भी जरूरी है।

यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकारी सहायता और सामाजिक सेवाओं की अलग-अलग व्यवस्थाएँ हैं। भारत में कानून कुछ परिस्थितियों में पात्र बच्चों और रिश्तेदारों पर मेंटेनेंस देने की जिम्मेदारी डालता है। अंततः, किसी समाज की प्रगति इस बात से भी मापी जाती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जीने का अवसर देता है।

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FAQs

Q1. क्या बुजुर्ग माता-पिता भारत में अपने बच्चों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं?

हाँ। वर्ष 2007 के कानून के तहत, यदि माता-पिता अपना खर्च खुद उठाने में सक्षम नहीं हैं और कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो वे अपने बच्चों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं।

Q2. क्या माँ अपनी शादीशुदा बेटी से मेंटेनेंस माँग सकती है?

हाँ। शादीशुदा बेटी की भी अपने माता-पिता की आर्थिक मदद करने की कानूनी जिम्मेदारी हो सकती है। केवल शादी हो जाने से यह जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।

Q3. क्या पेंशन पाने वाले माता-पिता भी मेंटेनेंस माँग सकते हैं?

हाँ। पेंशन मिलने से मेंटेनेंस माँगने का अधिकार अपने आप खत्म नहीं होता। यह देखा जाता है कि पेंशन और दूसरे साधनों से माता-पिता की जरूरी जरूरतें पूरी हो पा रही हैं या नहीं।

Q4. क्या बुजुर्ग माता-पिता एक से अधिक बच्चों से मेंटेनेंस माँग सकते हैं?

हाँ। कानून की धारा 5(5) के तहत, जरूरी शर्तें पूरी होने पर माता-पिता एक या एक से अधिक बच्चों या पात्र रिश्तेदारों के खिलाफ आवेदन कर सकते हैं।

Q5. अगर बच्चे मेंटेनेंस देने से मना कर दें, तो माता-पिता क्या कर सकते हैं?

माता-पिता अपने खर्चों, आय, इलाज और बच्चों से मदद माँगने से जुड़े सबूत इकट्ठा करके संबंधित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकते हैं। यदि पहले से मेंटेनेंस देने का आदेश है और बच्चे उसका पालन नहीं करते, तो वे आदेश लागू करवाने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं।

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