Are you being denied access to your child despite a court visitation order What should you do

कोर्ट के विजिटेशन ऑर्डर के बाद भी बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है? क्या करें?

मान लीजिए कि अदालत ने आपको कुछ तय दिनों पर अपने बच्चे से मिलने का अधिकार दिया है। लेकिन जब मिलने का दिन आता है, तो दूसरा माता-पिता बच्चे को आपके पास लाने से मना कर देता है। कभी आपके फोन का जवाब नहीं दिया जाता, तो कभी कहा जाता है कि बच्चा बीमार है, उपलब्ध नहीं है या आपसे मिलना नहीं चाहता। अगर ऐसा बार-बार होता है, तो आपको बेबसी महसूस हो सकती है और यह चिंता भी हो सकती है कि बच्चे के साथ आपका रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है।

ऐसी स्थिति अक्सर अलग होने, तलाक या बच्चे की देखभाल को लेकर विवाद के बाद पैदा होती है। जिस माता-पिता के पास बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी होती है, उसके पास बच्चे की रोजमर्रा की दिनचर्या का नियंत्रण रहता है। वहीं, दूसरे माता-पिता को अदालत के तय किए गए मिलने के समय और नियमों पर निर्भर रहना पड़ता है।

लेकिन अदालत का मिलने का आदेश केवल एक सलाह नहीं है। अगर आदेश लागू है, तो दोनों पक्षों को उसमें दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए। साथ ही, अदालत के लिए बच्चे की भलाई, सुरक्षा और भावनात्मक स्थिति सबसे महत्वपूर्ण होती है।

अगर अदालत का आदेश होने के बावजूद आपको अपने बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है, तो धमकी देने, जबरदस्ती करने या खुद से कोई कदम उठाने से बचें। इसके बजाय, हर बार आदेश का पालन न किए जाने का रिकॉर्ड रखें और उचित कानूनी उपाय के लिए वकील से सलाह लें।

बच्चे से मिलने के आदेश में क्या-क्या तय होता है?

बच्चे से मिलने का आदेश अदालत का ऐसा निर्देश होता है, जिसके तहत वह माता-पिता, जिसके पास बच्चे की मुख्य देखभाल की जिम्मेदारी नहीं है, बच्चे से मिल सकता है या उससे संपर्क बनाए रख सकता है। अदालत के आदेश में ये बातें शामिल हो सकती हैं:

  • तय दिनों और समय पर बच्चे से आमने-सामने मिलना।
  • सप्ताहांत या छुट्टियों में बच्चे के साथ समय बिताना।
  • परिवार न्यायालय या किसी दूसरी तय जगह पर बच्चे से मिलना।
  • वीडियो कॉल या फोन पर बच्चे से बात करना।
  • स्कूल की छुट्टियों या त्योहारों के दौरान बच्चे के साथ समय बिताना।
  • जरूरत पड़ने पर किसी की निगरानी में बच्चे से मिलना।
  • बच्चे को लेने और वापस छोड़ने का तय तरीका।

आपको बच्चे से मिलने का कितना अधिकार है, यह अदालत के आदेश में लिखी शर्तों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, अगर अदालत ने हर दूसरे रविवार को बच्चे से मिलने की अनुमति दी है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप बच्चे को रात भर अपने साथ रख सकते हैं या किसी दूसरे दिन भी उससे मिलने जा सकते हैं।

इसलिए, अदालत के आदेश को ध्यान से पढ़ें। अगर उसमें मिलने की जगह, समय, निगरानी या संपर्क करने का तरीका तय किया गया है, तो उसका पालन करें।

अगर आदेश साफ नहीं है या बच्चे की परिस्थितियों में बदलाव के कारण पुरानी व्यवस्था का पालन करना मुश्किल हो गया है, तो खुद से व्यवस्था बदलने के बजाय अदालत से आदेश को स्पष्ट करने या उसमें बदलाव करने का अनुरोध कर सकते हैं।

क्या दूसरा माता-पिता अदालत के आदेश के बावजूद बच्चे से मिलने से मना कर सकता है?

आमतौर पर, कोई माता-पिता केवल दूसरे माता-पिता से निजी नाराजगी या आपसी विवाद के कारण अदालत के वैध आदेश को मानने से मना नहीं कर सकता।

उदाहरण के लिए, अगर पति-पत्नी के बीच तलाक, भरण-पोषण, संपत्ति या किसी दूसरे पारिवारिक मामले को लेकर विवाद चल रहा है, तो बच्चे की देखभाल करने वाला माता-पिता केवल इसी वजह से दूसरे माता-पिता को तय समय पर बच्चे से मिलने से नहीं रोक सकता।

हालांकि, हर मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। अगर कोई वास्तविक आपात स्थिति है, बच्चे की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है या बच्चे की सेहत से जुड़ी कोई समस्या है, तो उस बात को अदालत के सामने रखना जरूरी हो सकता है। ऐसे मामले में क्या कदम उठाना चाहिए, यह अदालत के आदेश और समस्या की प्रकृति पर निर्भर करेगा।

अगर किसी माता-पिता को लगता है कि बच्चे से मिलने की मौजूदा व्यवस्था अब सुरक्षित या उचित नहीं है, तो उसे अदालत से उचित निर्देश या आदेश में बदलाव की मांग करनी चाहिए। उसे यह नहीं मान लेना चाहिए कि वह अपनी मर्जी से बच्चे से मिलने की व्यवस्था को हमेशा के लिए रोक सकता है।

इसी तरह, जिस माता-पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार मिला है, उसे भी सुरक्षा से जुड़ी शर्तों और अदालत के निर्देशों का पालन करना चाहिए। वह अदालत के आदेश के विरुद्ध जाकर बच्चे से मिलने की जिद नहीं कर सकता।

मुख्य बात यह है कि क्या अदालत के आदेश का बिना किसी उचित कारण के जानबूझकर पालन नहीं किया जा रहा है और बच्चे की भलाई को ध्यान में रखते हुए कौन-सा कदम उठाना सही होगा।

इसे भी पढ़ें:  क्या व्हाट्सएप चैट को मैट्रिमोनियल डिस्प्यूट में इस्तेमाल कर सकते हैं? – जानिए कानून क्या कहता है?

अगर आपको अपने बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है, तो क्या करें?

अगर बच्चे की माँ या पिता बार-बार अदालत के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं और आपको बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है, तो ये कदम उठाएं।

स्टेप 1: अदालत के आदेश को ध्यान से पढ़ें

अदालत के आदेश में बच्चे से मिलने के तय दिन और समय, मिलने की जगह, बच्चे को लेने और वापस छोड़ने की व्यवस्था और अदालत की लगाई गई अन्य शर्तों को ध्यान से देखें।

यह भी जांच लें कि आदेश अभी लागू है या उस पर रोक लग गई है, उसमें बदलाव किया गया है या बाद में कोई नया आदेश जारी हुआ है।

यह जरूरी है, क्योंकि आपके लिए सही कानूनी कदम इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत ने वास्तव में क्या निर्देश दिए हैं।

स्टेप 2: हर बार मिलने से मना किए जाने का रिकॉर्ड रखें

हर उस दिन का लिखित रिकॉर्ड बनाएं, जब तय समय पर बच्चे से आपकी मुलाकात नहीं हो पाई। इसमें तारीख, समय, जगह और मिलने से मना करने का बताया गया कारण लिखें। उदाहरण के लिए, अगर बच्चे की माँ या पिता लगातार तीन रविवार को बच्चे को आपसे मिलाने नहीं लाते हैं, तो तीनों घटनाओं का अलग-अलग रिकॉर्ड रखें।

संबंधित संदेश, ईमेल और बातचीत को सुरक्षित रखें। अगर वीडियो कॉल नहीं होने दी जाती है, तो कॉल का रिकॉर्ड या उससे जुड़े दूसरे उपलब्ध प्रमाण भी संभालकर रखें। ऐसा साफ रिकॉर्ड आपके वकील को यह समझाने में मदद कर सकता है कि मुलाकात न होने की घटना केवल एक बार हुई थी या अदालत के आदेश का बार-बार पालन नहीं किया जा रहा है।

स्टेप 3: शांत तरीके से लिखित संदेश भेजें

जहां उचित हो, बच्चे की माँ या पिता को शांति से संदेश भेजकर अदालत के आदेश की याद दिलाएं और तय व्यवस्था के अनुसार बच्चे से मिलने देने का अनुरोध करें।

गाली-गलौज, धमकी या बार-बार गुस्से में संदेश भेजने से बचें। आपकी बातचीत से यह स्पष्ट होना चाहिए कि आप अदालत के आदेश का पालन करना और अपने बच्चे के साथ अच्छा संबंध बनाए रखना चाहते हैं।

अगर सीधे संपर्क करने से आपकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है या अदालत के किसी सुरक्षा आदेश का उल्लंघन हो सकता है, तो संपर्क करने से पहले वकील से सलाह लें।

स्टेप 4: परिवार संबंधी मामलों के वकील से सलाह लें

अगर बच्चे से मिलने से बार-बार रोका जा रहा है, तो चाइल्ड कस्टडी और मुलाकात से जुड़े मामलों का अनुभव रखने वाले वकील से सलाह लें।

वकील अदालत के आदेश और आपके पास मौजूद प्रमाणों की जांच करके बता सकता है कि परिवार न्यायालय में आवेदन देना चाहिए, आदेश का पालन करवाने की मांग करनी चाहिए, आदेश को स्पष्ट करवाना चाहिए या अदालत की अवमानना की कार्यवाही पर विचार करना चाहिए।

अगर मामला गंभीर है और तुरंत कार्रवाई की जरूरत है, तो कई बार मुलाकात न होने की घटनाओं का इंतजार करना जरूरी नहीं होता। सही समय पर कानूनी कदम उठाना मामले की गंभीरता और आदेश का पालन न किए जाने की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

क्या बच्चे से मिलने के आदेश का पालन करवाने के लिए फॅमिली कोर्ट जा सकते हैं?

हां। अदालत के आदेश के प्रकार और उसे जारी करने वाली अदालत के आधार पर, आप आदेश का पालन करवाने के लिए फॅमिली कोर्ट या संबंधित सक्षम अदालत में जा सकते हैं।

फॅमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 18 के अनुसार, फॅमिली कोर्ट के अधिकांश फैसलों और आदेशों का प्रभाव दीवानी अदालत के फैसलों और आदेशों जैसा होता है। ऐसे आदेशों को कानून में तय प्रक्रिया के अनुसार लागू करवाया जा सकता है। सही प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि आदेश किस तरह का है और उस पर कौन-सा कानून लागू होता है।

आपका वकील अदालत से यह निर्देश देने का अनुरोध कर सकता है कि बच्चे की माँ या पिता पहले से तय मुलाकात की व्यवस्था का पालन करें।

भविष्य में बार-बार विवाद न हो, इसके लिए भी अदालत से स्पष्ट व्यवस्था तय करने का अनुरोध किया जा सकता है। परिस्थितियों के अनुसार, इसमें ये बातें शामिल हो सकती हैं:

  • बच्चे को लेने और वापस छोड़ने की जगह साफ तौर पर तय करना।
  • बच्चे से आमने-सामने मिलने का निश्चित समय तय करना।
  • वीडियो कॉल के लिए नियमित समय निर्धारित करना।
  • जरूरत होने पर किसी तय व्यक्ति की निगरानी या सहायता में मुलाकात करवाना।
  • वास्तविक आपात स्थिति की जानकारी देने के लिए स्पष्ट निर्देश देना।
  • अदालत को उचित लगने पर छूटी हुई मुलाकात के बदले दूसरे दिन मिलने की व्यवस्था करना।

अदालत फैसला लेते समय पहले से दिए गए आदेश, उसका पालन न करने के कारण और बच्चे की भलाई को ध्यान में रखेगी।

इसे भी पढ़ें:  बिना घरवालों को बताए कोर्ट मैरिज कर ली है अब जान का खतरा है, क्या करें?

क्या बच्चे से मिलने से रोकने पर कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की पिटीशन दाखिल कर सकते हैं?

कुछ मामलों में, अदालत के आदेश का जानबूझकर और बिना किसी उचित कारण के पालन न करना कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की कार्यवाही का आधार बन सकता है।

कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट, 1971 में सिविल कंटेम्प्ट से जुड़ा प्रावधान है। इसमें अदालत के फैसले, आदेश, निर्देश या अन्य न्यायिक प्रक्रिया की जानबूझकर अवहेलना करना या अदालत को दिए गए वचन का जानबूझकर उल्लंघन करना शामिल हो सकता है।

हालांकि, हर बार बच्चे से मुलाकात न हो पाने का मतलब यह नहीं है कि कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट हुई है। अदालत यह देखेगी कि आदेश स्पष्ट था या नहीं, संबंधित व्यक्ति को आदेश की जानकारी थी या नहीं, उसका जानबूझकर पालन नहीं किया गया या नहीं और आदेश का पालन न करने के पीछे कोई वास्तविक कारण था या नहीं।

उदाहरण के लिए, अगर अदालत ने बच्चे से मिलने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं और बच्चे की माँ या पिता बिना किसी उचित कारण के बार-बार मुलाकात में रुकावट डालते हैं, तो कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की कार्यवाही की मांग की जा सकती है। दूसरी ओर, अगर बच्चे की तबीयत अचानक गंभीर रूप से खराब हो गई थी, तो उपलब्ध तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर मामले का अलग आकलन किया जा सकता है।

हितेंद्र सिंह बनाम अभिलाषा सिंह मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने 11 मई 2026 को बच्चे से मिलने के निर्देशों का लगातार पालन न किए जाने के मुद्दे पर विचार किया और जानबूझकर आर्डर के कंटेम्प्ट को गंभीर माना। यह फैसला दिखाता है कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों का पालन करना जरूरी है, हालांकि संबंधित परिस्थितियों और दिए गए स्पष्टीकरण पर भी विचार किया जाता है।

कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की कार्यवाही हर मामले में आदेश लागू करवाने का सही रास्ता नहीं होती। इसलिए, वकील से यह जांच करवाएं कि अवमानना की पिटीशन दाखिल करना उचित होगा या आदेश का पालन करवाने अथवा उसे स्पष्ट करने के लिए सीधे अदालत में आवेदन देना बेहतर रहेगा।

अगर बच्चे की माँ या पिता कहें कि बच्चा आपसे नहीं मिलना चाहता, तो क्या करें?

यह किसी भी माता-पिता के लिए बहुत मुश्किल स्थिति हो सकती है। आपको बताया जा सकता है कि बच्चा आपसे नहीं मिलना चाहता या आपसे मिलने की बात सुनकर परेशान हो जाता है।

बच्चे की भावनाओं को गंभीरता से लेना जरूरी है। साथ ही, अदालत यह समझने की कोशिश कर सकती है कि बच्चा आपसे क्यों नहीं मिलना चाहता। इसके लिए बच्चे की उम्र, समझ, उसके अनुभवों और भावनात्मक जरूरतों को ध्यान में रखा जा सकता है।

बच्चे पर मिलने के लिए दबाव न डालें, उसके सामने बच्चे की माँ या पिता को बुरा-भला न कहें और न ही उसे किसी एक का पक्ष चुनने के लिए कहें। ऐसा करने से बच्चा और अधिक तनाव में आ सकता है और आपके रिश्ते में भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

अगर बच्चे की माँ या पिता बार-बार यह कहकर अदालत के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं कि बच्चा आपसे नहीं मिलना चाहता, तो आपका वकील इस पूरी स्थिति को अदालत के सामने रख सकता है और उचित निर्देश देने का अनुरोध कर सकता है।

परिस्थितियों के अनुसार, अदालत बच्चे की काउंसलिंग, धीरे-धीरे संपर्क बढ़ाने, किसी की निगरानी में मुलाकात कराने या ऐसी दूसरी व्यवस्था पर विचार कर सकती है, जिससे बच्चा सुरक्षित महसूस करे। कौन-सी व्यवस्था उचित होगी, इसका फैसला अदालत बच्चे की भलाई और पहले से दिए गए आदेश को ध्यान में रखकर करेगी।

क्या बच्चे से मिलने की व्यवस्था में बदलाव करवाया जा सकता है?

हां। अगर पहले से तय मुलाकात का समय अब सुविधाजनक नहीं है या बार-बार होने वाले विवादों के कारण बच्चे से मिलना मुश्किल हो रहा है, तो आप संबंधित अदालत से व्यवस्था में बदलाव करने या आदेश को स्पष्ट करने का अनुरोध कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, पहले के आदेश में बच्चे की स्कूल की परीक्षाओं, आने-जाने की दूरी, बच्चे की दिनचर्या में बदलाव या वीडियो कॉल करने में होने वाली व्यावहारिक परेशानियों का ध्यान नहीं रखा गया हो सकता है।

ऐसी स्थिति में आप मुलाकात का समय स्पष्ट रूप से तय करने, मिलने की जगह बदलने, बच्चे को लेने और वापस छोड़ने के नियम साफ करने या फोन और वीडियो कॉल के लिए उचित व्यवस्था बनाने का अनुरोध कर सकते हैं।

आदेश में बदलाव की मांग करते समय यह बताना जरूरी है कि बदलाव क्यों आवश्यक है और इससे बच्चे की भलाई कैसे सुनिश्चित होगी। केवल बच्चे की माँ या पिता को परेशान करने के लिए ऐसा आवेदन नहीं देना चाहिए।

जब तक अदालत आदेश में बदलाव नहीं करती, तब तक पहले से लागू निर्देशों का पालन करें, जहां तक वे आप पर लागू होते हैं।

इसे भी पढ़ें:  क्या भारत में अडल्ट्री डाइवोर्स लेने का आधार है?

क्या बच्चे से मिलने से रोकने पर देखभाल की जिम्मेदारी मिल सकती है?

अगर बच्चे की माँ या पिता बार-बार आपको बच्चे से मिलने से रोकते हैं, तो यह बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी से जुड़े विवाद में एक महत्वपूर्ण बात हो सकती है। हालांकि, केवल मुलाकात से रोकने के कारण बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी अपने आप दूसरे माता-पिता को नहीं मिल जाती।

अदालत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात बच्चे की भलाई है। इसलिए वह दोनों माता-पिता के व्यवहार, बच्चे की जरूरतों, आदेश का पालन न करने के कारणों और पहले से तय व्यवस्था की उपयुक्तता पर विचार कर सकती है।

अगर बच्चे की माँ या पिता लगातार अदालत के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो आप इस व्यवहार के बारे में अदालत को बता सकते हैं और उचित राहत देने का अनुरोध कर सकते हैं। मामले की परिस्थितियों के अनुसार, अदालत अधिक स्पष्ट या सख्त निर्देश दे सकती है, मुलाकात की व्यवस्था में बदलाव कर सकती है या कोई अन्य उचित कदम उठा सकती है।

बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी में बदलाव एक गंभीर फैसला है। अदालत केवल किसी माता-पिता को सजा देने के लिए ऐसा फैसला नहीं करती। इसलिए, कोई भी मांग करने से पहले अपने वकील से उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर चर्चा करें।

किन गलतियों से बचना चाहिए?

अगर आपको अपने बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है, तो गुस्सा और दुख होना स्वाभाविक है। लेकिन ऐसे कदम उठाने से बचें, जिनसे आपका मामला कमजोर हो सकता है या बच्चे को परेशानी हो सकती है।

  • बच्चे को स्कूल या बच्चे की माँ या पिता के घर से जबरदस्ती अपने साथ न ले जाएं।
  • बच्चे की माँ या पिता को धमकी न दें, परेशान न करें और न ही डराने की कोशिश करें।
  • अदालत ने मिलने के लिए जो शर्तें या निगरानी के नियम तय किए हैं, उनका उल्लंघन न करें।
  • केवल बच्चे से मिलने न दिए जाने के कारण भरण-पोषण की रकम देना बंद न करें। ये दोनों अलग कानूनी मामले हैं, जब तक अदालत कोई अलग निर्देश न दे।
  • बच्चे को माता-पिता के बीच संदेश पहुंचाने के लिए इस्तेमाल न करें।
  •  इस विवाद के आरोप या निजी जानकारी सोशल मीडिया पर साझा न करें।
  • यह न मानें कि अदालत की अवमानना की पिटीशन दाखिल करने से बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी अपने आप बदल जाएगी।
  • बच्चे की सुरक्षा से जुड़ी वास्तविक चिंताओं या अदालत के सुरक्षा संबंधी आदेशों को नजरअंदाज न करें।

अपना ध्यान कानूनी तरीके से अदालत के आदेश का पालन करवाने और बच्चे की भलाई पर रखें। विवाद को बढ़ाने के बजाय शांत रहकर, घटनाओं का रिकॉर्ड संभालकर और बच्चे के हित को प्राथमिकता देकर कदम उठाना आमतौर पर अधिक उपयोगी होता है।

निष्कर्ष

अदालत का आदेश होने के बावजूद अगर आपको अपने बच्चे से मिलने नहीं दिया जा रहा है, तो घटनाओं का रिकॉर्ड रखें और वकील से सलाह लें। मामले के अनुसार, आप परिवार न्यायालय में आदेश का पालन करवाने, मिलने की व्यवस्था में बदलाव करने या जानबूझकर आदेश का पालन न होने पर कंटेम्प्ट की कार्यवाही के लिए आवेदन दे सकते हैं। हर कदम उठाते समय बच्चे की भलाई, सुरक्षा और भावनात्मक स्थिति को प्राथमिकता दें। जबरदस्ती या विवाद बढ़ाने के बजाय उचित कानूनी रास्ता अपनाएं।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. अदालत का आदेश होने के बावजूद बच्चे से मिलने न दिया जाए, तो क्या करें?

न मिलने की तारीखों का रिकॉर्ड रखें, जरूरी संदेश सुरक्षित करें और अदालत के आदेश का पालन करवाने के लिए वकील से सलाह लें।

2. क्या बच्चे से मिलने से रोकने पर कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की पिटीशन दाखिल कर सकते हैं?

हां, अगर अदालत के स्पष्ट आदेश का जानबूझकर पालन न करने के सबूत हों, तो कंटेम्प्ट की कार्यवाही की मांग की जा सकती है। हर बार मुलाकात न होना अपने आप में कंटेम्प्ट नहीं है।

3. क्या आपराधिक मामला लंबित होने से मुलाकात का अधिकार अपने आप खत्म हो जाता है?

नहीं, ऐसा जरूरी नहीं है। अदालत आरोपों, सबूतों, सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं और मौजूदा आदेशों पर विचार करती है। अपने मामले के अनुसार वकील से सलाह लें।

4. बच्चे से मिलने के विवाद में कौन-से सबूत उपयोगी हैं?

अदालत का आदेश, संदेश, फोन का रिकॉर्ड, न हो पाई मुलाकातों की तारीखें, लिखित जवाब और संबंधित रिपोर्ट उपयोगी हो सकते हैं।

5. क्या बच्चे से प्रत्यक्ष मुलाकात न होने पर वीडियो कॉल की मांग कर सकते हैं?

हां, आप वीडियो कॉल से संपर्क या मौजूदा व्यवस्था को स्पष्ट करने की मांग कर सकते हैं। अदालत का फैसला आदेश, परिस्थितियों और बच्चे की भलाई पर निर्भर करेगा।

Social Media