Did the Internal Committee overlook the POSH complaint What legal remedies are available to the employee

क्या इंटरनल कमिटी ने POSH कंप्लेंट को नज़रअंदाज़ कर दिया? कर्मचारी के पास क्या कानूनी उपाय हैं?

अगर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के बाद इंटरनल कमिटी कोई कार्रवाई नहीं करती, जांच में देरी करती है या जांच रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल नहीं होता, तो कर्मचारी को अपने अधिकारों और आगे के कदमों को लेकर परेशानी हो सकती है। खासकर तब, जब शिकायत जिस व्यक्ति के खिलाफ की गई है, वह ऊंचे पद पर हो या कर्मचारी की नौकरी से जुड़े फैसले लेता हो।

सेक्शुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट, 2013 (POSH Act) के तहत इंटरनल कमिटी और नियोक्ता की कुछ जिम्मेदारियां तय की गई हैं। शिकायत पर कार्रवाई न होने, जांच में देरी या जांच रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू न करने पर अलग-अलग कानूनी उपाय अपनाने पड़ सकते हैं। इसलिए अपनी स्थिति समझकर उचित कानूनी कदम उठाना जरूरी है।

POSH एक्ट के तहत इंटरनल कमिटी की क्या भूमिका है?

POSH एक्ट के तहत कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई के लिए कानूनी व्यवस्था बनाई गई है। इस कानून की धारा 4 के अनुसार, जिन कार्यस्थलों पर आमतौर पर 10 या उससे अधिक कर्मचारी होते हैं, वहां इंटरनल कमिटी बनाना जरूरी है।

इंटरनल कमिटी की जिम्मेदारी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली शिकायतों को लेना और कानून के अनुसार उनकी जांच करना है। उसका काम केवल शिकायत लेना या उसे प्रबंधन तक पहुंचाना नहीं है। उसे तय प्रक्रिया का पालन करना होता है और शिकायत करने वाली महिला तथा जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत की गई है, दोनों को अपना पक्ष रखने का उचित मौका देना होता है।

इंटरनल कमिटी की जिम्मेदारियों में ये काम शामिल हो सकते हैं:

  • लिखित शिकायत लेना और उसकी जांच करना।
  • दोनों पक्षों को जांच की प्रक्रिया के बारे में बताना।
  • शिकायत करने वाली महिला और जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत है, दोनों को अपना पक्ष रखने का उचित मौका देना।
  • संबंधित दस्तावेजों, संदेशों और गवाहों के बयानों पर विचार करना।
  • कानून में तय नियमों के अनुसार जांच करना।
  • तय समय-सीमा के भीतर जांच पूरी करना।
  • कानून के अनुसार जांच के निष्कर्ष तैयार करना और संबंधित पक्षों को उनकी जानकारी देना।
  • कानून के तहत जरूरी होने पर उचित सिफारिशें करना।

इंटरनल कमिटी को POSH एक्ट में गोपनीयता से जुड़े नियमों का भी पालन करना होता है। शिकायत, दोनों पक्षों की पहचान, जांच की कार्यवाही और सिफारिशों से जुड़ी जानकारी को कानून के विरुद्ध सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

जब इंटरनल कमिटी शिकायत पर ध्यान नहीं देती तो इसका क्या मतलब है?

शिकायत पर ध्यान न देने का मतलब अलग-अलग हो सकता है। सही कानूनी कदम उठाने के लिए यह समझना जरूरी है कि इंटरनल कमिटी ने किस तरह की लापरवाही की है।

शिकायत मिलने की पुष्टि न करना

शिकायत करने वाली महिला ने ईमेल या किसी दूसरे आधिकारिक माध्यम से लिखित शिकायत दी हो, लेकिन उसे शिकायत मिलने की कोई पुष्टि न मिली हो। ऐसी स्थिति में शिकायत भेजने का प्रमाण सुरक्षित रखें और लिखित रूप में पूछें कि शिकायत मिली है या नहीं और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।

जांच शुरू न करना

इंटरनल कमिटी ने शिकायत मिलने की पुष्टि तो कर दी, लेकिन जांच शुरू नहीं की या अब तक की कार्रवाई के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। अगर बिना उचित कारण के देरी हो रही है, तो लिखित रूप में जांच की स्थिति पूछें और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारी के सामने मामला उठाएं।

तय समय-सीमा से अधिक देरी करना

POSH एक्ट की धारा 11 के अनुसार, जांच 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। अगर इस अवधि के बाद भी जांच लंबित है, तो शिकायत करने वाली महिला लिखित रूप में देरी का कारण पूछ सकती है और परिस्थितियों के अनुसार उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकती है।

जांच के दौरान नियमों का पालन न करना

शिकायत करने वाली महिला को यह चिंता हो सकती है कि जरूरी सबूतों पर विचार नहीं किया गया, गवाहों से ठीक से पूछताछ नहीं हुई या जांच तय प्रक्रिया के अनुसार नहीं की गई।

हालांकि, जांच के किसी एक फैसले से असहमत होने का मतलब अपने आप यह नहीं है कि कानून का उल्लंघन हुआ है। लेकिन अगर प्रक्रिया में कोई गंभीर कमी है, तो परिस्थितियों के अनुसार जांच की प्रक्रिया या उसके नतीजे को चुनौती देने का आधार बन सकता है।

जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई न करना

इंटरनल कमिटी ने जांच पूरी करके अपनी रिपोर्ट दे दी हो, लेकिन नियोक्ता ने उसकी सिफारिशों पर अमल न किया हो। POSH एक्ट की धारा 13 के अनुसार, संबंधित मामले में नियोक्ता या जिला अधिकारी को रिपोर्ट मिलने के 60 दिनों के भीतर सिफारिशों पर कार्रवाई करनी होती है।

इन सभी स्थितियों को अलग-अलग समझना जरूरी है, क्योंकि लंबित जांच के मामले में उपलब्ध कानूनी उपाय, जांच रिपोर्ट को चुनौती देने या उसकी सिफारिशों पर कार्रवाई न होने के मामले से अलग हो सकते हैं।

POSH एक्ट के तहत शिकायत और जांच की समय-सीमा क्या है?

POSH एक्ट में शिकायत दर्ज करने, जांच पूरी करने और जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के लिए अलग-अलग समय-सीमाएं तय की गई हैं। अगर इन समय-सीमाओं का पालन नहीं होता, तो यह देखना जरूरी है कि देरी किस स्टेप पर हुई है और उसके लिए कौन-सा कानूनी कदम उठाया जा सकता है।

इसे भी पढ़ें:  POSH एक्ट के तहत कंप्लेंट कैसे करें? जानिए पूरी प्रक्रिया और आपके अधिकार

शिकायत दर्ज करने की समय-सीमा

POSH एक्ट की धारा 9 के अनुसार, आमतौर पर घटना होने के तीन महीने के भीतर लिखित शिकायत दर्ज करनी चाहिए। अगर कई घटनाएं हुई हैं, तो यह समय-सीमा आमतौर पर आखिरी घटना की तारीख से गिनी जाती है।

इंटरनल कमिटी या लोकल कमिटी, जैसा भी मामला हो, उचित परिस्थितियों में शिकायत दर्ज करने के लिए तीन महीने तक का अतिरिक्त समय दे सकती है। इसके लिए कानून में बताई गई शर्तों के अनुसार कारण लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है। महिला किन परिस्थितियों के कारण तय समय में शिकायत नहीं कर सकी, इस बात पर भी विचार किया जाता है।

अगर शुरुआती समय-सीमा निकल चुकी है, तो शिकायत करने वाली महिला को कानूनी सलाह लेकर यह पता करना चाहिए कि समय बढ़ाने की अनुमति मिल सकती है या नहीं और किस कमिटी के सामने आवेदन करना उचित होगा।

जांच पूरी करने की समय-सीमा

POSH एक्ट की धारा 11 के अनुसार, जांच 90 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए। अगर इस अवधि के बाद भी जांच लंबित है, तो शिकायत करने वाली महिला लिखित रूप में देरी का कारण पूछ सकती है। वह कानून में तय प्रक्रिया का पालन कराने के लिए उचित कदम उठाने पर भी विचार कर सकती है।

जांच रिपोर्ट देने की समय-सीमा

POSH एक्ट की धारा 13 के अनुसार, जांच पूरी होने के दस दिनों के भीतर इंटरनल कमिटी को अपनी रिपोर्ट नियोक्ता या संबंधित मामले में जिला अधिकारी को देनी होती है। यह रिपोर्ट संबंधित पक्षों को भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

सिफारिशों पर कार्रवाई करने की समय-सीमा

रिपोर्ट मिलने के 60 दिनों के भीतर नियोक्ता या संबंधित मामले में जिला अधिकारी को इंटरनल कमिटी की सिफारिशों पर कार्रवाई करनी होती है।

ये समय-सीमाएं शिकायत का समय पर निपटारा करने के लिए तय की गई हैं। हालांकि, किसी समय-सीमा का पालन न होने पर क्या कानूनी परिणाम होंगे और कौन-सा उपाय अपनाया जा सकता है, यह देरी की प्रकृति और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

अगर POSH शिकायत पर कार्रवाई नहीं हो रही है तो कर्मचारी क्या करे?

अगर इंटरनल कमिटी शिकायत का जवाब नहीं दे रही है या जांच आगे नहीं बढ़ रही है, तो शिकायत करने वाली महिला को अपनी शिकायत और उसके बाद हुई बातचीत का लिखित रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए।

स्टेप 1: शिकायत जमा करने का प्रमाण सुरक्षित रखें

शिकायत करने वाली महिला को अपनी मूल शिकायत की प्रति, शिकायत भेजने वाला ईमेल, उसके पहुंचने की पुष्टि और इंटरनल कमिटी से मिली किसी भी सूचना को सुरक्षित रखना चाहिए।

अगर शिकायत कार्यालय में जाकर जमा की गई थी, तो उस पर मिली प्राप्ति की मुहर वाली प्रति या जमा करने का कोई दूसरा प्रमाण संभालकर रखें। अगर शिकायत किसी आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से की गई थी, तो उसकी संदर्भ संख्या और संबंधित रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखें।

स्टेप 2: लिखित रूप में दोबारा संपर्क करें

शिकायत करने वाली महिला इंटरनल कमिटी की पीठासीन अधिकारी या कमिटी के आधिकारिक ईमेल पते पर लिखित संदेश भेज सकती है। इसमें मूल शिकायत की तारीख, पहले मिली पुष्टि और अब तक हुई कार्रवाई का उल्लेख करते हुए जांच की वर्तमान स्थिति पूछनी चाहिए।

स्टेप 3: देरी का कारण पूछें

अगर जांच लंबे समय से लंबित है, तो शिकायत करने वाली महिला लिखित रूप में पूछ सकती है कि जांच किस स्टेप पर है और उसमें देरी क्यों हो रही है।

लिखित जवाब से यह समझने में मदद मिल सकती है कि जांच आगे बढ़ रही है या नहीं और अब आगे कोई कदम उठाने की जरूरत है या नहीं।

स्टेप 4: सभी घटनाओं का तारीख के अनुसार रिकॉर्ड रखें

शिकायत करने वाली महिला को शिकायत की तारीख, शिकायत मिलने की पुष्टि, दोबारा भेजे गए संदेश, बैठकों, सबूतों से जुड़ी मांगों और मिले जवाबों का तारीख के अनुसार रिकॉर्ड तैयार रखना चाहिए।

अगर बाद में नियोक्ता, लोकल कमिटी, संबंधित अपीलीय अधिकारी या सक्षम अदालत के सामने मामला उठाना पड़े, तो यह रिकॉर्ड उपयोगी हो सकता है।

अगर बार-बार अनौपचारिक रूप से अनुरोध करने के बाद भी इंटरनल कमिटी कोई जवाब नहीं देती, तो उपलब्ध कानूनी उपायों पर विचार करना चाहिए।

क्या शिकायत करने वाली महिला नियोक्ता या वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क कर सकती है?

मामले की परिस्थितियों के अनुसार, शिकायत करने वाली महिला इंटरनल कमिटी की निष्क्रियता के बारे में नियोक्ता या संगठन के किसी उचित वरिष्ठ अधिकारी को लिखित रूप में बता सकती है।

POSH एक्ट की धारा 19 के तहत नियोक्ता की कुछ खास जिम्मेदारियां तय की गई हैं। इनमें कार्यस्थल पर सुरक्षा सुनिश्चित करना और कानून के प्रावधानों का पालन करने के लिए उचित कदम उठाना शामिल है।

अगर इंटरनल कमिटी ने शिकायत मिलने की पुष्टि नहीं की, जांच शुरू नहीं की या कोई उचित जानकारी नहीं दी, तो शिकायत करने वाली महिला लिखित आवेदन देकर इस लापरवाही की जानकारी दे सकती है और उचित कार्रवाई की मांग कर सकती है।

इसे भी पढ़ें:  क्या आपकी बेल रिजेक्ट हो गई है? बेल रिजेक्ट होने के बाद के कानूनी उपाय

आवेदन में कानून के पालन और शिकायत पर समय से कार्रवाई करने की मांग होनी चाहिए। इसमें पहले से यह मांग नहीं करनी चाहिए कि जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत है, उसे दोषी घोषित किया जाए। जांच निष्पक्ष तरीके से और तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए।

हालांकि, हर मामले में संगठन के भीतर शिकायत उठाना उचित या प्रभावी नहीं होगा। अगर नियोक्ता के खिलाफ ही शिकायत की गई है, वह कथित घटना में सीधे शामिल है या उसके हितों का टकराव है, तो शिकायत करने वाली महिला को किसी दूसरे उचित मंच पर जाने के बारे में कानूनी सलाह लेनी चाहिए।

सभी पत्रों, ईमेल और जवाबों को सुरक्षित रखें। साथ ही, शिकायत की जानकारी संगठन में अनावश्यक रूप से दूसरे लोगों के साथ साझा न करें, क्योंकि POSH एक्ट में गोपनीयता से जुड़े नियम भी हैं।

शिकायत करने वाली महिला लोकल कमिटी के पास कब जा सकती है?

कुछ परिस्थितियों में शिकायत करने वाली महिला लोकल कमिटी के पास शिकायत कर सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मामला उसके कानूनी अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं।

POSH एक्ट की धारा 6 के तहत जिले के स्तर पर लोकल कमिटी बनाई जाती है, जो कानून में बताई गई कुछ परिस्थितियों में शिकायतें सुनती है। इनमें ऐसे कार्यस्थल शामिल हैं जहां 10 से कम कर्मचारी होने के कारण इंटरनल कमिटी बनाना जरूरी नहीं है। कानून में बताई गई परिस्थितियों में नियोक्ता के खिलाफ की गई शिकायत भी लोकल कमिटी के अधिकार क्षेत्र में आ सकती है।

अगर कार्यस्थल पर सही तरीके से इंटरनल कमिटी नहीं बनाई गई है या शिकायत लोकल कमिटी के अधिकार क्षेत्र में आती है, तो शिकायत करने वाली महिला उचित प्रक्रिया की जानकारी लेने के लिए जिला अधिकारी या लोकल कमिटी से संपर्क कर सकती है।

हालांकि, केवल इसलिए कि पहले से बनी इंटरनल कमिटी जांच में देरी कर रही है, यह जरूरी नहीं कि मामले का अधिकार क्षेत्र अपने आप लोकल कमिटी को मिल जाए। सही मंच का चुनाव शिकायत की प्रकृति, कार्यस्थल और मामले पर लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए।

संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग या जिला प्रशासन से संपर्क करके अपने जिले की लोकल कमिटी और जिला अधिकारी की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

क्या POSH एक्ट की धारा 18 के तहत अपील की जा सकती है?

POSH एक्ट की धारा 18 के तहत कुछ खास परिस्थितियों में अपील करने का अधिकार दिया गया है। इनमें धारा 13 के तहत की गई कुछ सिफारिशें, धारा 14 के तहत की गई कुछ सिफारिशें, धारा 17 के तहत की गई कार्रवाई और इस धारा में शामिल सिफारिशों पर अमल न करना शामिल हो सकता है।

आमतौर पर अपील 90 दिनों के भीतर दाखिल करनी होती है। इसके लिए लागू सेवा नियमों या, ऐसे नियम न होने पर, कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।

हालांकि, अपील की जा सकती है या नहीं, यह शिकायत की प्रकृति पर निर्भर करता है। अगर इंटरनल कमिटी ने जांच शुरू ही नहीं की है या शिकायत का कोई जवाब नहीं दिया है, तो धारा 18 के तहत औपचारिक अपील करना जरूरी नहीं कि सही कानूनी उपाय हो।

अगर जांच रिपोर्ट जारी हो चुकी है या नियोक्ता ने सिफारिशों पर अमल नहीं किया है, तो परिस्थितियों के अनुसार अपील का विकल्प उपलब्ध हो सकता है। लेकिन अगर शिकायत पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है, तो शिकायत करने वाली महिला को दूसरे उपायों पर विचार करना पड़ सकता है। इनमें लिखित आवेदन देना, सक्षम अधिकारी से संपर्क करना या अदालत से राहत लेने के बारे में कानूनी सलाह लेना शामिल हो सकता है।

यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि हर तरह की देरी को एक ही अपील प्रक्रिया के जरिए चुनौती दी जा सकती है। सही मंच और लागू समय-सीमा तय करने के लिए वकील को संबंधित आदेश, सिफारिश या कार्रवाई न किए जाने की स्थिति की जांच करनी चाहिए।

क्या POSH जांच लंबित होने पर पुलिस में शिकायत की जा सकती है?

हां, अगर कथित घटना से कोई आपराधिक अपराध बनता है, तो इंटरनल कमिटी की जांच पूरी होने से पहले भी पुलिस में शिकायत की जा सकती है।

  1. पुलिस में शिकायत का विकल्प: शिकायत करने वाली महिला को पुलिस से संपर्क करने के लिए इंटरनल कमिटी की जांच पूरी होने तक इंतजार करना जरूरी नहीं है।
  2. दोनों कार्यवाहियां अलग हैं: POSH एक्ट के तहत इंटरनल कमिटी की जांच और पुलिस की आपराधिक जांच के उद्देश्य अलग-अलग हैं। मामले के तथ्यों के आधार पर दोनों कार्यवाहियां एक साथ चल सकती हैं।
  3. घटना की सही जानकारी दें: पुलिस में शिकायत करते समय घटना का सही विवरण दें और कोई जरूरी जानकारी न छिपाएं।
  4. सबूत सुरक्षित रखें: संदेश, ईमेल, संबंधित दस्तावेज और अन्य उपलब्ध सबूत संभालकर रखें।
  5. लागू कानून की जानकारी लें: आरोपों की प्रकृति के अनुसार भारतीय न्याय संहिता, 2023 या अन्य लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। सही कानूनी प्रावधानों के लिए वकील से सलाह लेना उचित है।
  6. इंटरनल कमिटी की निष्क्रियता का अलग समाधान तलाशें: पुलिस में शिकायत करने से अपने आप इंटरनल कमिटी की जांच में देरी या कार्रवाई न करने की समस्या हल नहीं होती। इसके लिए अलग कानूनी उपाय अपनाने पड़ सकते हैं।
  7. सही कानूनी कदम चुनें: कौन-सी कार्रवाई उचित होगी, यह घटना की प्रकृति, उपलब्ध सबूत और मांगी जा रही राहत पर निर्भर करता है।
इसे भी पढ़ें:  क्या पति-पत्नी को जबरदस्ती साथ रहने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

कौन-से सबूत सुरक्षित रखने चाहिए?

सबूत मूल शिकायत को साबित करने और यह दिखाने में मदद कर सकते हैं कि इंटरनल कमिटी या नियोक्ता ने उचित कार्रवाई नहीं की है।

शिकायत करने वाली महिला को उपलब्ध होने पर ये रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए:

  • मूल POSH शिकायत की प्रति।
  • शिकायत जमा करने या भेजने का प्रमाण।
  • शिकायत मिलने की पुष्टि और शिकायत की संदर्भ संख्या।
  • दोबारा भेजे गए ईमेल और लिखित आवेदन।
  • इंटरनल कमिटी या प्रबंधन से मिले जवाब।
  • कथित यौन उत्पीड़न से जुड़े संदेश, ईमेल, तस्वीरें या अन्य सामग्री।
  • संभावित गवाहों के नाम और उन घटनाओं की जानकारी, जिन्हें उन्होंने देखा या सुना हो।
  • बैठकों का रिकॉर्ड और उनके होने की तारीखें।
  • जांच रिपोर्ट, अगर जारी की गई हो।
  • जांच रिपोर्ट या सिफारिशों पर नियोक्ता का जवाब।
  • शिकायत से जुड़े किसी प्रतिकूल नौकरी संबंधी फैसले के दस्तावेज।

जहां तक संभव हो, मूल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। दस्तावेजों या संदेशों में इस तरह बदलाव न करें जिससे घटनाओं की सही जानकारी गलत तरीके से पेश हो।

शिकायत, गवाहों के बयान और जांच से जुड़ी सामग्री सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें। POSH एक्ट में गोपनीयता से जुड़े नियम हैं और बिना अनुमति जानकारी सार्वजनिक करने से अतिरिक्त कानूनी परेशानी हो सकती है।

जरूरी सामग्री लागू गोपनीयता नियमों का पालन करते हुए संबंधित अधिकारियों और कानूनी सलाहकार के साथ साझा करें।

किन गलतियों से बचना चाहिए?

अगर POSH शिकायत पर कार्रवाई नहीं हो रही है, तो शिकायत करने वाली महिला को ऐसी गलतियों से बचना चाहिए जिनसे मामला कमजोर हो सकता है या नई कानूनी परेशानी पैदा हो सकती है।

  • यह न मानें कि जवाब न मिलने का मतलब शिकायत खारिज हो गई है।
  • केवल मौखिक बातचीत पर निर्भर न रहें। लिखित रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।
  • कानून में तय समय-सीमा और अपील की समय-सीमा को नजरअंदाज न करें।
  • यह न मानें कि हर तरह की देरी के मामले में धारा 18 के तहत अपील करना ही सही उपाय है।
  • किसी दूसरे व्यक्ति के दबाव में आकर शिकायत वापस न लें।
  • जांच से जुड़ी गोपनीय सामग्री सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें।
  • तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश न करें और सबूतों में बदलाव न करें।
  • यह न मानें कि कार्यस्थल पर हर विवाद अपने आप यौन उत्पीड़न माना जाएगा। कथित व्यवहार और उससे जुड़ी परिस्थितियों का स्पष्ट विवरण दें।
  • अगर नियोक्ता खुद मामले में शामिल है या मामला आपकी सुरक्षा अथवा नौकरी को प्रभावित कर रहा है, तो कानूनी सलाह लेने में देरी न करें।

सभी घटनाओं और बातचीत का सही तथा स्पष्ट रिकॉर्ड रखने से संबंधित अधिकारी शिकायत का आकलन करने और उचित कानूनी कदम तय करने में मदद पा सकते हैं।

निष्कर्ष

अगर इंटरनल कमिटी POSH शिकायत पर कार्रवाई नहीं करती, तो शिकायत करने वाली महिला लिखित रूप में जवाब मांग सकती है और मामले के अनुसार नियोक्ता, लोकल कमिटी, संबंधित अपीलीय अधिकारी या सक्षम अदालत से मदद ले सकती है। अगर घटना से आपराधिक अपराध बनता है, तो पुलिस में शिकायत भी की जा सकती है। सही कानूनी उपाय चुनने के लिए उपलब्ध दस्तावेजों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर वकील से सलाह लेना उचित है।

किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।

FAQs

1. अगर इंटरनल कमिटी POSH शिकायत पर कार्रवाई नहीं करती तो क्या करें?

शिकायत जमा करने का प्रमाण सुरक्षित रखें, लिखित रूप में दोबारा संपर्क करें और जांच की स्थिति पूछें। कार्रवाई न होने पर संबंधित अधिकारी से संपर्क करें या कानूनी सलाह लें।

2. POSH जांच पूरी करने के लिए कितने दिन मिलते हैं?

POSH एक्ट की धारा 11 के अनुसार, जांच 90 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए। देरी होने पर लिखित रूप में कारण पूछें और उचित कानूनी कदम उठाने पर विचार करें।

हैं।

3. क्या इंटरनल कमिटी की रिपोर्ट के खिलाफ अपील कर सकते हैं?

हां, धारा 18 के तहत कानून में बताई गई परिस्थितियों में अपील की जा सकती है। आमतौर पर इसके लिए 90 दिनों की समय-सीमा लागू होती है। सही प्रक्रिया मामले के तथ्यों और लागू नियमों पर निर्भर करती है।

4. POSH शिकायत के बाद नौकरी से निकालने की धमकी मिले तो क्या करें?

धमकी से जुड़े संदेश, ईमेल और नौकरी के दस्तावेज सुरक्षित रखें। इसके बाद मामले की परिस्थितियों के अनुसार कानूनी सलाह लें।

5. क्या POSH जांच में देरी होने से शिकायत अपने आप साबित हो जाती है?

नहीं। जांच में देरी होने से आरोप अपने आप साबित नहीं होते। हालांकि, यह प्रक्रिया से जुड़ी समस्या हो सकती है, जिसके समाधान के लिए उचित कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

Social Media