Can a government employee be suspended during the course of a criminal case

क्या किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक मामले के दौरान ससपेंड किया जा सकता है?

सरकारी कर्मचारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपना काम ईमानदारी से करें और अपने विभाग के नियमों का पालन करें। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ पुलिस में शिकायत हो जाती है, पुलिस जाँच शुरू हो जाती है या अदालत में आपराधिक मामला चलने लगता

ऐसी स्थिति में सबसे पहले यह सवाल उठता है कि क्या किसी सरकारी कर्मचारी को उसके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले के दौरान नौकरी से ससपेंड किया जा सकता है?

इसका जवाब मामले की परिस्थितियों, लगाए गए आरोपों और विभाग के नियमों पर निर्भर करता है। केवल शिकायत दर्ज होने या पुलिस की जाँच शुरू होने से हर मामले में सस्पेंशन जरूरी नहीं होता। लेकिन यदि आरोप गंभीर हैं या कर्मचारी के पद पर बने रहने से जाँच प्रभावित होने का डर है, तो विभाग उसे ससपेंड कर सकता है।

क्या आपराधिक मामला चलने के दौरान सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है?

हाँ, किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला चलने के दौरान उसे ससपेंड किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए कर्मचारी पर लागू सरकारी नियमों का पालन करना जरूरी है।

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सेंट्रल सिविल सर्विस (क्लासिफिकेशन कण्ट्रोल एंड अपील) रूल्स, 1965 के नियम 10 में ससपेंड करने से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। वहीं, राज्य सरकार के कर्मचारियों, पुलिस कर्मचारियों और अन्य सरकारी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों पर अलग-अलग नियम लागू हो सकते हैं।

सरकारी कर्मचारी को इन परिस्थितियों में ससपेंड किया जा सकता है:

  • जब उसके खिलाफ विभागीय जाँच चल रही हो या शुरू करने की तैयारी हो।
  • जब उसके खिलाफ आपराधिक मामला हो और लागू नियमों के अनुसार ससपेंड करना उचित हो।
  • जब नियमों के तहत सक्षम अधिकारी को कर्मचारी को ससपेंड करना जरूरी लगे।
  • जब कर्मचारी को तय समय से अधिक हिरासत में रखा गया हो और लागू नियमों के अनुसार उसे अपने आप ससपेंड माना जाता हो।

हालाँकि, कर्मचारी को ससपेंड करने की सही शर्तें उसके पद और उस पर लागू सरकारी नियमों पर निर्भर करती हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी सरकारी अधिकारी पर सरकारी धन में गड़बड़ी करने का गंभीर आरोप है और पुलिस जाँच कर रही है, तो विभाग सरकारी कागजों की सुरक्षा और जाँच में किसी तरह की रुकावट रोकने के लिए उसे ससपेंड कर सकता है।

लेकिन केवल आरोप लगने के कारण कर्मचारी को ससपेंड करना सजा देने के समान नहीं माना जाना चाहिए।

ध्यान रखें: ससपेंड करना अंतिम सजा नहीं है। यह जाँच या मामले के दौरान उठाया जाने वाला एक अस्थायी कदम है। इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी को दोषी साबित कर दिया गया है।

क्या केवल FIR दर्ज होने से सरकारी कर्मचारी ससपेंड हो जाता है?

नहीं। केवल FIR दर्ज होने से हर सरकारी कर्मचारी को अपने आप ससपेंड नहीं किया जाता।

FIR का मतलब है कि पुलिस ने किसी ऐसे अपराध से जुड़ी जानकारी को औपचारिक रूप से दर्ज किया है, जिसकी जाँच पुलिस कानून के अनुसार कर सकती है। लेकिन केवल FIR दर्ज होने से यह साबित नहीं होता कि जिस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है, उसने अपराध किया ही है।

FIR दर्ज होने के बाद विभाग कई बातों पर विचार कर सकता है। इन बातों के आधार पर यह तय किया जाता है कि कर्मचारी को ससपेंड करना जरूरी है या नहीं।

विभाग आमतौर पर इन बातों पर ध्यान देता है:

  1. अपराध कितना गंभीर है: क्या कर्मचारी पर रिश्वत लेने, भ्रष्टाचार करने, धोखाधड़ी करने या अपने सरकारी पद का गलत इस्तेमाल करने का आरोप है?
  2. अपराध का सरकारी काम से संबंध: क्या आरोपित काम कर्मचारी ने अपने सरकारी पद का इस्तेमाल करके किया है?
  3. जाँच पर पड़ने वाला असर: क्या कर्मचारी गवाहों पर दबाव डाल सकता है, सरकारी कागजों में बदलाव कर सकता है या जाँच में रुकावट पैदा कर सकता है?
  4. कर्मचारी का पद: क्या कर्मचारी के पास जरूरी सरकारी कागजों, पैसों, गोपनीय जानकारी या महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार है?
  5. सरकारी नियम: क्या कर्मचारी पर लागू नियम ऐसी परिस्थिति में उसे ससपेंड करने की अनुमति देते हैं?
  6. मामले की परिस्थितियाँ: क्या कर्मचारी को ससपेंड करना सच में जरूरी है या किसी दूसरे प्रशासनिक तरीके से स्थिति को संभाला जा सकता है?

संबंधित अधिकारी को मामले के तथ्यों और कर्मचारी पर लागू नियमों को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।

उदाहरण के लिए, यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर सरकारी पैसों से जुड़े कागजों में हेरफेर करने का आरोप है, तो विभाग को सरकारी कागजों की सुरक्षा और जाँच को लेकर चिंता हो सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को ससपेंड करने पर विचार किया जा सकता है।

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वहीं, यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ उसके निजी झगड़े को लेकर आपराधिक मामला दर्ज हुआ है, तो उसकी स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि निजी झगड़े से जुड़े मामले में कर्मचारी को कभी ससपेंड नहीं किया जा सकता। ऐसे मामले में भी फैसला कर्मचारी पर लागू नियमों और मामले की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर लिया जाएगा।

इसलिए, सरकारी कर्मचारी को यह नहीं मानना चाहिए कि FIR दर्ज होते ही उसकी नौकरी खत्म हो जाएगी या उसे हर हाल में ससपेंड कर दिया जाएगा। केवल FIR दर्ज होना अपने आप में ससपेंड करने का अंतिम आधार नहीं है। विभाग को लागू नियमों के अनुसार मामले की परिस्थितियों को देखकर उचित फैसला लेना होता है।

अगर किसी सरकारी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया जाए, तो क्या होगा?

किसी सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी होने पर उसकी स्थिति FIR दर्ज होने से अलग हो सकती है।

केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू सेंट्रल सिविल सर्विस (क्लासिफिकेशन कण्ट्रोल एंड अपील) रूल्स, 1965 के नियम 10(2) के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी को 48 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है, तो आमतौर पर उसे हिरासत में लिए जाने की तारीख से ही ससपेंड माना जाता है। यह नियम लागू होने की स्थिति में ऐसा होता है।

इसे अपने आप ससपेंड होना कहा जाता है। इसका मतलब है कि कर्मचारी को ससपेंड करने के लिए विभाग के अलग से आदेश देने पर ही सब कुछ निर्भर नहीं करता, बल्कि संबंधित नियम के अनुसार भी ससपेंड होने की स्थिति बन सकती है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि किसी सरकारी कर्मचारी को सोमवार को गिरफ्तार किया गया और वह 48 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रहा। यदि उस कर्मचारी पर नियम 10(2) लागू होता है, तो उसे हिरासत में लिए जाने की तारीख से ससपेंड माना जा सकता है।

हालाँकि, राज्य सरकार के कर्मचारियों और दूसरे सरकारी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए स्थिति अलग हो सकती है, क्योंकि उन पर अलग नियम लागू हो सकते हैं।

अगर कर्मचारी को बेल मिल जाए, तो क्या होगा? कर्मचारी को बेल मिलने से उसका ससपेंड होना अपने आप खत्म नहीं हो जाता। लागू नियमों के अनुसार विभाग उसका ससपेंड रहना जारी रख सकता है। हालाँकि, इस फैसले की समय-समय पर समीक्षा की जा सकती है और कर्मचारी इसे कानून के अनुसार चुनौती भी दे सकता है।

कर्मचारी को यह भी समझना चाहिए कि बेल मिलने का मतलब यह नहीं है कि उसके खिलाफ चल रहा आपराधिक मामला खत्म हो गया है। इसी तरह, केवल गिरफ्तार होने से यह साबित नहीं होता कि कर्मचारी दोषी है।

क्या कर्मचारी को अपनी गिरफ्तारी की जानकारी विभाग को देनी जरूरी है? केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए जारी सेवा संबंधी निर्देशों के अनुसार, किसी कर्मचारी को अपनी गिरफ्तारी और उससे जुड़ी परिस्थितियों की जानकारी जल्द से जल्द अपने वरिष्ठ अधिकारी को देनी चाहिए। यह जिम्मेदारी तब भी बनी रहती है, जब कर्मचारी को बाद में बेल मिल जाए।

यदि कर्मचारी जरूरी जानकारी देने में असफल रहता है, तो उसके खिलाफ अलग से विभागीय कार्रवाई भी की जा सकती है।

इसलिए, सरकारी कर्मचारियों को अपने ऊपर लागू सेवा नियमों का पालन करना चाहिए और गिरफ्तारी की जानकारी देने की जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। केवल बेल मिलने के कारण विभाग को जानकारी देने की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।

क्या बिना गिरफ्तार हुए भी सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है?

हाँ, किसी सरकारी कर्मचारी को बिना गिरफ्तार हुए भी ससपेंड किया जा सकता है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू सेंट्रल सिविल सर्विस (क्लासिफिकेशन कण्ट्रोल एंड अपील) रूल्स, 1965 के नियम 10(1)(b) के अनुसार, यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला जाँच, पूछताछ या अदालत में सुनवाई के दौरान है, तो लागू नियमों की शर्तों के अनुसार उसे ससपेंड किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी कर्मचारी पर रिश्वत लेने या सरकारी पैसों में गड़बड़ी करने का आरोप है, तो विभाग जाँच और गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उसे ससपेंड करने पर विचार कर सकता है, भले ही उसे गिरफ्तार न किया गया हो।

हालाँकि, केवल आरोप लगने से कर्मचारी दोषी साबित नहीं होता। विभाग को मामले की परिस्थितियों और लागू नियमों के अनुसार ही फैसला लेना चाहिए।

क्या निजी आपराधिक मामले में भी सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है?

हाँ, कुछ परिस्थितियों में निजी आपराधिक मामले में भी सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है। लेकिन हर निजी विवाद में ऐसा करना जरूरी नहीं होता। उदाहरण के लिए, यदि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जमीन या संपत्ति के निजी विवाद को लेकर शिकायत दर्ज होती है, तो विभाग को आरोपों की गंभीरता, कर्मचारी के व्यवहार और लागू सेवा नियमों को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।

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विभाग यह भी देख सकता है कि क्या कर्मचारी के नौकरी पर बने रहने से जाँच प्रभावित हो सकती है या सरकारी काम पर कोई असर पड़ सकता है।

इसलिए, निजी मामले में कर्मचारी को ससपेंड करना है या नहीं, यह लागू सरकारी नियमों और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

ससपेंड होने पर सरकारी कर्मचारी को कितनी सैलरी मिलती है?

जब किसी सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जाता है, तो आमतौर पर उसे पहले की तरह पूरी सैलरी नहीं मिलती। इसके बजाय, लागू सरकारी नियमों के अनुसार उसे मेंटेनेंस दिया जा सकता है। यह पैसा कर्मचारी को ससपेंड रहने के दौरान अपने रोजमर्रा के जरूरी खर्च पूरे करने के लिए दिया जाता है।

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सेंट्रल सिविल सर्विसेज (लीव) रूल्स, 1972 के नियम 53 में मेंटेनेंस से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। इसकी रकम कर्मचारी के वेतन, ससपेंड रहने की अवधि और लागू नियमों पर निर्भर करती है।

क्या ससपेंड होने पर विभाग पूरा पैसा रोक सकता है? नहीं, विभाग केवल ससपेंड होने के कारण कर्मचारी को मिलने वाला हर भुगतान अपने आप नहीं रोक सकता। कर्मचारी को कितना मेंटेनेंस मिलेगा, यह लागू नियमों के अनुसार तय किया जाता है।

यदि कर्मचारी को नियमों के अनुसार मिलने वाला मेंटेनेंस नहीं मिल रहा है, तो वह संबंधित अधिकारी को लिखित शिकायत देकर अपना बकाया पैसा माँग सकता है।

क्या दोबारा नौकरी पर आने के बाद पूरी सैलरी मिलती है? इसका जवाब मामले के अंतिम फैसले और लागू सरकारी नियमों पर निर्भर करता है। दोबारा नौकरी पर आने के बाद विभाग यह तय करता है कि ससपेंड रहने की अवधि को किस तरह माना जाएगा और उस समय का कितना वेतन तथा भत्ते दिए जाएँगे।

इसलिए, नौकरी पर वापस आने का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी को ससपेंड रहने की पूरी अवधि की सैलरी हर स्थिति में मिल ही जाएगी।

क्या आपराधिक मामला खत्म होने तक सरकारी कर्मचारी ससपेंड रह सकता है?

हाँ, आपराधिक मामला चलने के दौरान सरकारी कर्मचारी को ससपेंड रखा जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बिना उचित कारण और समीक्षा के उसे अनिश्चित समय तक ससपेंड रखा जा सकता है।

आपराधिक मामलों की सुनवाई में कई साल लग सकते हैं। यदि हर कर्मचारी को मामला खत्म होने तक ससपेंड रखा जाए, तो उसे आर्थिक और नौकरी से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक ससपेंड रखने के फैसले की समीक्षा करना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: अजय कुमार चौधरी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया

अजय कुमार चौधरी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया, (2015) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि तीन महीने के भीतर कर्मचारी को आरोप-पत्र नहीं दिया जाता, तो आमतौर पर उसे ससपेंड रखने का आदेश तीन महीने से आगे जारी नहीं रहना चाहिए। यदि आरोप-पत्र दे दिया गया है, तो ससपेंड रखने की अवधि बढ़ाने के लिए उचित कारण बताते हुए आदेश जारी किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर कर्मचारी का दूसरे कार्यालय में तबादला करने या जरूरी कागजों और गवाहों तक उसकी पहुँच सीमित करने जैसे दूसरे उपाय अपनाए जा सकते हैं।

हालाँकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हर कर्मचारी का ससपेंड करने का आदेश तीन महीने बाद अपने आप रद्द हो जाता है। मामले की परिस्थितियों और लागू सरकारी नियमों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सेंट्रल सिविल सर्विस (क्लासिफिकेशन कण्ट्रोल एंड अपील) रूल्स, 1965 के नियम 10(6) और 10(7) में ससपेंड करने के आदेश की समीक्षा और उसे जारी रखने के प्रावधान दिए गए हैं। इसलिए, लंबे समय से ससपेंड कर्मचारी को यह जाँचना चाहिए कि संबंधित अधिकारी ने जरूरी समीक्षा की है या नहीं और अवधि बढ़ाने का उचित आदेश जारी किया है या नहीं।

गलत तरीके से ससपेंड करने पर क्या कानूनी कार्रवाई कर सकते है?

हाँ, यदि किसी सरकारी कर्मचारी को गलत तरीके से ससपेंड किया गया है या बिना उचित कारण के लंबे समय तक ससपेंड रखा गया है, तो वह इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि ससपेंड करने वाला अधिकारी सक्षम नहीं है, सरकारी नियमों का पालन नहीं किया गया है या समय पर जरूरी समीक्षा नहीं हुई है, तो कर्मचारी आदेश को चुनौती दे सकता है। हालाँकि, केवल आदेश से असहमत होने पर उसे रद्द नहीं कराया जा सकता। इसके लिए उचित कानूनी आधार होना जरूरी है।

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कर्मचारी के पास क्या कानूनी रास्ते हैं? कर्मचारी अपने ससपेंड होने के आदेश के खिलाफ ये कदम उठा सकता है:

  1. विभाग में शिकायत देना: कर्मचारी ससपेंड करने का आदेश रद्द करने या उसकी समीक्षा करने के लिए लिखित आवेदन दे सकता है।
  2. एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में जाना: जहाँ लागू हो, कर्मचारी केंद्रीय या राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण में मामला रख सकता है।
  3. हाई कोर्ट में पिटीशन देना: उचित परिस्थितियों में कर्मचारी हाई कोर्ट में आदेश को चुनौती दे सकता है।
  4. अंतरिम रिलीफ मांगना: मामले के अनुसार कर्मचारी अदालत या न्यायाधिकरण से अंतरिम राहत भी माँग सकता है।

कानूनी कार्रवाई करने से पहले कर्मचारी को ससपेंड करने का आदेश, अवधि बढ़ाने के आदेश और दूसरे जरूरी कागज अपने पास रखने चाहिए। इससे उसे अपना पक्ष रखने में मदद मिलेगी।

ससपेंड होने के बाद सरकारी कर्मचारी को क्या करना चाहिए?

यदि किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक मामले के दौरान ससपेंड कर दिया गया है, तो उसे अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए ये कदम उठाने चाहिए।

  1. ससपेंड करने का आदेश पढ़ें: आदेश में दिए गए कारण, तारीख और संबंधित नियमों को ध्यान से देखें।
  2. लागू नियमों की जानकारी लें: पता करें कि आपके ऊपर केंद्र सरकार, राज्य सरकार या विभाग के कौन-से नियम लागू होते हैं।
  3. समीक्षा की जाँच करें: देखें कि ससपेंड रखने की अवधि बढ़ाने के लिए जरूरी समीक्षा और आदेश हुआ है या नहीं।
  4. मेंटेनेंस जाँचें: सुनिश्चित करें कि आपको नियमों के अनुसार मेंटेनेंस मिल रहा है।
  5. लिखित आवेदन दें: आदेश गलत होने पर उसे रद्द करने या उसकी समीक्षा के लिए विभाग में आवेदन दें।
  6. वकील से सलाह लें: जरूरत पड़ने पर सेवा कानून के जानकार वकील से संपर्क करें।

ससपेंड रहने के दौरान विभाग के उचित निर्देशों का पालन करें। गोपनीय सरकारी कागजों तक बिना अनुमति पहुँचने या जाँच को प्रभावित करने वाले कामों से बचें।

निष्कर्ष

भारत में आपराधिक मामला चलने के दौरान सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उस पर लागू सरकारी नियमों का पालन करना जरूरी है। केवल FIR दर्ज होने, गिरफ्तारी होने या अदालत में मामला चलने से कर्मचारी दोषी साबित नहीं होता।

कर्मचारी को मेंटेनेंस पाने, ससपेंड करने के आदेश की समीक्षा माँगने और गलत आदेश को अदालत में चुनौती देने का अधिकार हो सकता है।

यदि आपको ससपेंड किया गया है, तो आदेश और लागू नियमों की जाँच करें। ससपेंड होने का मतलब यह नहीं है कि आपकी नौकरी या भविष्य खत्म हो गया है। आपके कानूनी अधिकार मामले की परिस्थितियों और लागू नियमों पर निर्भर करेंगे।

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FAQs

Q1. क्या FIR दर्ज होने के बाद सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है?

हाँ, यदि कर्मचारी पर लागू सरकारी नियम इसकी अनुमति देते हैं और मामले की परिस्थितियाँ उचित हैं, तो उसे ससपेंड किया जा सकता है। लेकिन केवल FIR दर्ज होने से हर मामले में ससपेंड करना जरूरी नहीं है।

Q2. क्या बेल मिलने के बाद सरकारी कर्मचारी दोबारा नौकरी पर जा सकता है?

बेल मिलने से ससपेंड करने का आदेश अपने आप खत्म नहीं होता। कर्मचारी तभी काम पर वापस जा सकता है, जब लागू नियमों और संबंधित आदेशों के अनुसार इसकी अनुमति हो।

Q3. क्या विभागीय जाँच के बिना सरकारी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है?

हाँ, आपराधिक मामले की जाँच या अदालत में सुनवाई के दौरान विभागीय जाँच शुरू हुए बिना भी कर्मचारी को ससपेंड किया जा सकता है। हालाँकि, विभाग को लागू सरकारी नियमों का पालन करना जरूरी है।

Q4. क्या ससपेंड होने से सरकारी कर्मचारी की नौकरी खत्म हो जाती है?

नहीं, ससपेंड करना आमतौर पर एक अस्थायी कदम है। इसका मतलब नौकरी से निकालना नहीं है। आगे क्या कार्रवाई होगी, यह मामले के नतीजे और लागू सरकारी नियमों पर निर्भर करता है।

Q5. क्या लंबे समय तक ससपेंड रहने के खिलाफ सरकारी कर्मचारी अदालत जा सकता है?

हाँ, यदि कर्मचारी को बिना उचित कारण के लंबे समय तक ससपेंड रखा गया है या जरूरी समीक्षा नहीं की गई है, तो वह कानूनी आधार पर आदेश को चुनौती दे सकता है। हालाँकि, केवल समय बीतने से ससपेंड करने का आदेश अपने आप रद्द नहीं होता।

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