भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जसकरन जीत सिंह देयोल बनाम पंजाब राज्य मामले में 21 सितंबर 2026 को गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस अनुच्छेद 22(1) और अनुच्छेद 22(2) में दिए जरूरी नियमों का पालन नहीं करती है, तो इसे सिर्फ छोटी कानूनी गलती नहीं माना जा सकता। इस मामले में गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में नहीं दी गई थी और उसे 24 घंटे से ज्यादा समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि अगर अनुच्छेद 22(1) का पालन नहीं किया गया, तो गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत गलत हो सकती है और व्यक्ति को रिहा करना पड़ सकता है। इसी तरह, अगर किसी व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता है, जैसा कि अनुच्छेद 22(2) में बताया गया है, तो ऐसी हिरासत गैरकानूनी हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे व्यक्ति को उसी जांच करने वाली पुलिस टीम द्वारा अपनी मर्जी से दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
अगर दोबारा गिरफ्तारी जरूरी हो, तो पुलिस को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देना होगा और गिरफ्तारी की वजह, पहले कारण न बताने की वजह और दोबारा हिरासत की जरूरत बतानी होगी। कोर्ट ने आगे की जांच किसी दूसरे अधिकारी को देने और जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने का भी निर्देश दिया। यह फैसला बताता है कि गिरफ्तारी के समय पुलिस को संविधान में दिए व्यक्ति के अधिकारों का पालन करना कितना जरूरी है।
यह फैसला उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो यह समझना चाहते हैं कि गिरफ्तारी के बाद उनके क्या अधिकार हैं और अगर पुलिस इन जरूरी संवैधानिक नियमों का पालन नहीं करती है, तो ऐसे मामले में व्यक्ति कौन-से कानूनी कदम उठा सकता है।
अनुच्छेद 22 क्या है और गिरफ्तारी के बाद यह क्यों जरूरी है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 22 किसी व्यक्ति को गलत या मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत से बचाने के लिए कुछ जरूरी अधिकार देता है। आम गिरफ्तारी के मामलों में अनुच्छेद 22(1) और अनुच्छेद 22(2) बहुत महत्वपूर्ण हैं।
अनुच्छेद 22(1) के अनुसार, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को जितनी जल्दी हो सके, उसे गिरफ्तार करने की वजह बताना जरूरी है। उसे अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने और अपनी तरफ से केस लड़ने का भी अधिकार है।
अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। इसमें गिरफ्तारी की जगह से कोर्ट तक पहुंचने में लगा जरूरी सफर का समय शामिल नहीं किया जाता। मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना किसी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
ये अधिकार इसलिए जरूरी हैं क्योंकि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से उसकी आजादी सीधे प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट ने जसकरन जीत सिंह देयोल बनाम पंजाब राज्य मामले में साफ किया कि अनुच्छेद 22 में दिए गए ये नियम केवल कागजी कार्रवाई या छोटी कानूनी औपचारिकताएं नहीं हैं। ये संविधान में दिए जरूरी अधिकार हैं और इनका पालन करना जरूरी है।
इसका मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध का आरोप भी है, तब भी पुलिस यह नहीं कह सकती कि अपराध गंभीर है इसलिए इन संवैधानिक नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं है। अपराध कितना भी गंभीर हो, इससे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये संवैधानिक सुरक्षा अलग-अलग अपराधों के मामलों में लागू होती है और केवल किसी खास कानून के तहत होने वाली गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है।
यही 2026 के इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जब राज्य किसी व्यक्ति की आजादी छीनता है, तब अनुच्छेद 22 में दिए गए जरूरी संवैधानिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
जसकरन जीत सिंह देयोल मामले में क्या हुआ?
यह मामला पंजाब में दर्ज एक FIR से शुरू हुआ था, जिसमें व्यक्ति पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। फैसले के अनुसार, जसकरन जीत सिंह देयोल को 17 मई 2026 को सुबह करीब 7:54 बजे गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 18 मई 2026 को दोपहर करीब 12 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, यानी गिरफ्तारी के 24 घंटे से ज्यादा समय बाद। साथ ही, उन्हें गिरफ्तार करने की वजह लिखित रूप में नहीं दी गई थी।
जब मामला मजिस्ट्रेट के सामने पहुंचा, तो गिरफ्तार व्यक्ति को इस आधार पर रिहा कर दिया गया कि उसे गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में नहीं बताई गई थी। इसके बाद जांच करने वाली एजेंसी ने उन्हें दोबारा हिरासत में लेने की मांग की। इसके लिए कस्टडी में पूछताछ और जांच से जुड़ी चीजें बरामद करने जैसी वजहें बताई गईं। लेकिन एडिशनल चीफ जुडिशल मजिस्ट्रेट ने यह आवेदन खारिज कर दिया, क्योंकि गिरफ्तारी की वजह अभी भी लिखित रूप में नहीं दी गई थी और रिहा किए जा चुके व्यक्ति की गैर-मौजूदगी में उसे दोबारा कस्टडी में नहीं दिया जा सकता था।
इसके बाद जसकरन जीत सिंह देयोल ने पंजाब और हरयाणा हाई कोर्ट में दोबारा गिरफ्तारी से सुरक्षा मांगते हुए याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी मांगने से पूरी तरह नहीं रोका। कोर्ट ने कहा कि पहली गिरफ्तारी को लिखित में गिरफ्तारी की वजह न देने के कारण गलत माना गया था, लेकिन पुलिस कानून के अनुसार आगे कार्रवाई कर सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप गंभीर होने के कारण व्यक्ति को भविष्य में गिरफ्तारी से पूरी तरह छूट नहीं मिल जाती।
इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से दो संवैधानिक सवालों पर विचार किया:
- क्या गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में न देना अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन है?
- क्या 24 घंटे से ज्यादा समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन है?
इसके बाद कोर्ट ने यह भी देखा कि अगर इन संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो चुका है, तो भी अगर जांच एजेंसी उस व्यक्ति को दोबारा हिरासत में लेना चाहती है, तो उसे किन जरूरी नियमों और सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा।
गिरफ़्तारी के लिखित आधार के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले में अनुच्छेद 22(1) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत जरूरी बात कही।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में बताना जरूरी है। यह जानकारी ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझ सके। साथ ही, गिरफ्तारी की वजह की एक कॉपी भी गिरफ्तार व्यक्ति को देना जरूरी है। इसमें कोई सामान्य छूट नहीं है।
यह सिर्फ एक फॉर्मेलिटी नहीं है। इसका सीधा मकसद यह है कि जिस व्यक्ति की आजादी छीनी गई है, उसे यह पता होना चाहिए कि उसे आखिर किस वजह से गिरफ्तार किया गया है। अगर उसे गिरफ्तारी की वजह ही नहीं पता होगी, तो वह सही तरीके से वकील से सलाह लेने, गिरफ्तारी को चैलेंज करने, जरूरी लीगल राहत मांगने या अपने खिलाफ मामले को समझने में परेशानी का सामना कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस संवैधानिक नियम का उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड की कानूनी वैधता प्रभावित होती है।
जजमेंट के अनुसार, अगर अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हुआ है, तो व्यक्ति को रिहा करना होगा क्योंकि उसकी हिरासत संविधान के खिलाफ और गैरकानूनी हो जाती है। बाद में चार्जशीट दाखिल कर देने या कोर्ट द्वारा कॉग्निजेंस लेने से गिरफ्तारी में हुई इस संवैधानिक गलती अपने आप ठीक नहीं हो जाती।
कोर्ट ने एक और जरूरी बात साफ की कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किए गए व्यक्ति की रिहाई साधारण बेल पर रिहाई नहीं होती। इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को इसलिए रिहा किया जाता है क्योंकि उसे गैरकानूनी और असंवैधानिक हिरासत में रखा गया था।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस उस व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करके हिरासत में ले सकती है।
अगर पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं करती तो क्या होगा?
अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तार व्यक्ति को एक अलग और जरूरी सुरक्षा देता है।
गिरफ्तारी के बाद किसी व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। इसमें गिरफ्तारी की जगह से कोर्ट तक पहुंचने में लगा जरूरी सफर का समय शामिल नहीं किया जाता। इसके बाद व्यक्ति को हिरासत में रखने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी होती है।
जसकरन जीत सिंह देयोल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि व्यक्ति को 17 मई को सुबह करीब 7:54 बजे गिरफ्तार किया गया था और 18 मई को दोपहर करीब 12 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था। यानी उसे 24 घंटे के अंदर पेश नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के संवैधानिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर किसी व्यक्ति को 24 घंटे की तय सीमा के बाद भी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता है, तो उसकी लगातार हिरासत गैरकानूनी हो सकती है।
कोर्ट ने साफ किया कि 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की शर्त संविधान का जरूरी नियम है, सिर्फ एक सामान्य प्रोसीजर नहीं। पुलिस किसी गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी कस्टडी में रखकर बाद में मजिस्ट्रेट से अनुमति नहीं ले सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसलों का भी जिक्र किया, जिनमें बताया गया है कि अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन गिरफ्तारी और हिरासत की कानूनी वैधता को प्रभावित कर सकता है और व्यक्ति के अनुच्छेद 21 के अधिकारों का भी सवाल पैदा कर सकता है।
इसलिए अगर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है और उसे तय 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया, तो गिरफ्तारी का सही समय और मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का समय बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
व्यक्ति या उसके वकील को गिरफ्तारी का सही समय, गिरफ्तारी की जगह, कोर्ट पहुंचने का समय, रिमांड एप्लीकेशन और मजिस्ट्रेट द्वारा पास किया गया ऑर्डर सुरक्षित रखना चाहिए।
अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के बाद क्या पुलिस दोबारा गिरफ्तार कर सकती है?
यह 2026 के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि अगर किसी व्यक्ति को अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण रिहा कर दिया गया है, तो उसे कभी भी दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, कोर्ट ने दोबारा गिरफ्तारी के लिए एक खास ज्यूडिशियल सेफगार्ड तय किया है।
अगर किसी आरोपी को अनुच्छेद 22(1) के नियमों का पालन न होने के कारण रिहा कर दिया गया है और जांच करने वाली एजेंसी को फिर भी लगता है कि उससे कस्टोडियल इंटरोगेशन जरूरी है, तो एजेंसी को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने एप्लीकेशन देनी होगी।
इस एप्लीकेशन में:
- दोबारा गिरफ्तारी की जरूरत के कारण बताने होंगे;
- यह बताना होगा कि कस्टोडियल इंटरोगेशन क्यों जरूरी है;
- यह बताना होगा कि पहली गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी की वजह क्यों नहीं दी गई;
- आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी की वजह देने के बाद ही एप्लीकेशन दाखिल करनी होगी; और
- एप्लीकेशन पर संबंधित सीनियर अधिकारी की अप्रूवल/एंडोर्समेंट होना चाहिए।
- सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि यह अतिरिक्त सुरक्षा क्यों जरूरी है।
अनुच्छेद 22 का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है?
यह फैसला पुलिस की जवाबदेही के मामले में भी महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के बाद जांच एजेंसी दोबारा गिरफ्तारी की मांग करती है, तो सीनियर अथॉरिटी को केवल उस मांग को मंजूर करके उसी पुलिस अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी नहीं देनी चाहिए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच किसी दूसरे पुलिस अधिकारी को दी जाए और इस गंभीर गलती के लिए डिपार्टमेंटल इंक्वायरी शुरू की जाए। अगर जांच में पुलिस अधिकारी के खिलाफ गलतियां साबित होती हैं, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है। इसमें उसके सर्विस रिकॉर्ड में एंट्री भी की जा सकती है।
इस मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जांच अधिकारी को सस्पेंड किया गया था और स्टेशन हाउस अफसर को पुलिस लाइन्स भेजा गया था, साथ ही विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई थी।
इस फैसले से यह साफ होता है कि अनुच्छेद 22 के अधिकारों का उल्लंघन होने पर गिरफ्तारी और जांच के जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।
क्या गैरकानूनी हिरासत के लिए मुआवजा मिल सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि गैरकानूनी हिरासत से रिहाई ही हमेशा एकमात्र लीगल रेमेडी नहीं होती।
कोर्ट ने भीम सिंह बनाम जम्मू और कश्मीर राज्य 1985 जैसे पहले के मामलों का भी जिक्र किया, जिनमें संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए कम्पनसेशन दिया गया था। कोर्ट ने ऐसे फैसलों का भी जिक्र किया जिनमें अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के लिए पब्लिक लॉ रेमेडी के रूप में मुआवजा देने की बात मानी गई है।
जसकरन जीत सिंह देयोल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के फैक्ट्स और परिस्थितियों के आधार पर, अगर अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन हुआ है, तो हाई कोर्ट पब्लिक लॉ रेमेडी के तहत कम्पनसेशन देने का आदेश दे सकता है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ऐसी रेमेडी लेने से व्यक्ति का प्राइवेट सिविल लॉ रेमेडी लेने का रास्ता जरूरी नहीं कि बंद हो जाए।
इसलिए अगर किसी व्यक्ति को असंवैधानिक तरीके से हिरासत में रखा गया है, तो मामला सिर्फ उसे रिहा कराने तक सीमित नहीं रह सकता। कुछ मामलों में कम्पनसेशन की मांग भी की जा सकती है।
हालांकि, अनुच्छेद 22 के हर उल्लंघन में अपने आप कोई तय रकम का कम्पनसेशन नहीं मिलता। इसके लिए मामले के फैक्ट्स, गैरकानूनी हिरासत कितने समय तक रही, उल्लंघन किन परिस्थितियों में हुआ, अधिकारियों का आचरण और लागू कानूनी नियमों को ध्यान में रखना होगा।
अगर आपको लगता है कि आपकी गिरफ्तारी में अनुच्छेद 22 का उल्लंघन हुआ है तो क्या करें?
अगर आपको लगता है कि आपकी गिरफ्तारी के समय पुलिस ने संविधान में दिए जरूरी नियमों का पालन नहीं किया, तो सबसे पहले सभी जरूरी प्रूफ और रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।
खास तौर पर इन चीजों का सही रिकॉर्ड रखें:
- गिरफ्तारी की तारीख और सही समय;
- गिरफ्तारी की जगह;
- गिरफ्तारी की वजह कब बताई गई;
- गिरफ्तारी की वजह किस फॉर्म में दी गई;
- गिरफ्तारी की वजह किस भाषा में दी गई;
- मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का समय;
- रिमांड एप्लीकेशन;
- मजिस्ट्रेट का ऑर्डर;
- अरेस्ट मेमो;
- कस्टडी रिकार्ड्स;
- मेडिकल जांच के रिकॉर्ड;
- FIR और केस से जुड़े जरूरी डॉक्यूमेंट; और
- पुलिस या जांच एजेंसी के साथ हुई सभी संचार।
अगर आपको गिरफ्तारी की लिखित वजह नहीं दी गई, तो आपका वकील इस मुद्दे को संबंधित कोर्ट के सामने उठा सकता है।
इसके बाद कोर्ट यह देख सकता है कि वास्तव में अनुच्छेद 22(1) या अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन हुआ है या नहीं और ऐसी स्थिति में कौन-सी लीगल रेमेडी मिल सकती है।
यह समझना भी जरूरी है कि ऐसी रिहाई को हर तरह की बेल न समझें। सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक गिरफ्तारी के कारण हुई रिहाई, सामान्य बेल और डिफ़ॉल्ट बेल के बीच अंतर बताया है। कोर्ट ने समझाया कि डिफ़ॉल्ट बेल से जुड़े मामलों में अलग कानूनी सवाल होते हैं और उन मामलों के नियम इस तरह की स्थिति पर अपने आप लागू नहीं होते।
निष्कर्ष
जसकरन जीत सिंह देयोल बनाम पंजाब राज्य का फैसला यह साफ करता है कि अनुच्छेद 22 में दिए गए संवैधानिक अधिकार सिर्फ एक फॉर्मेलिटी नहीं हैं। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में बताना और उसे तय समय के अंदर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। इन नियमों का उल्लंघन होने पर गंभीर लीगल असर हो सकता है, जिसमें गैरकानूनी हिरासत से रिहाई भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति को अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया है, तो पुलिस अपनी मर्जी से उसे तुरंत दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। पुलिस को मजिस्ट्रेट के सामने जाना होगा, लिखित में गिरफ्तारी की वजह देनी होगी, पहले हुए उल्लंघन की वजह बतानी होगी और दोबारा कस्टडी की जरूरत समझानी होगी। इसलिए ऐसी स्थिति में अरेस्ट रिकॉर्ड, मजिस्ट्रेट ऑर्डर्स और समय पर ली गई लीगल हेल्प बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।
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FAQs
1. क्या पुलिस को गिरफ्तारी की वजह लिखित रूप में देना जरूरी है?
हां। अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह बताना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि यह वजह लिखित रूप में और ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे व्यक्ति समझ सके।
2. गिरफ्तार व्यक्ति को कितने समय के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है?
अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को सामान्य रूप से 24 घंटे के अंदर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है। इसमें गिरफ्तारी की जगह से कोर्ट तक पहुंचने में लगा जरूरी सफर का समय शामिल नहीं किया जाता।
3. अगर गिरफ्तारी के समय अनुच्छेद 22 का पालन नहीं हुआ तो क्या व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है?
हां, परिस्थितियों के अनुसार ऐसा हो सकता है। अगर अनुच्छेद 22(1) या अनुच्छेद 22(2) का गंभीर उल्लंघन हुआ है, तो हिरासत की कानूनी वैधता पर सवाल उठ सकता है और कोर्ट व्यक्ति की रिहाई का आदेश दे सकता है।
4. अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के बाद क्या पुलिस व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार कर सकती है?
दोबारा गिरफ्तारी हर स्थिति में अपने आप प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन अगर व्यक्ति को अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया है, तो जसकरन जीत सिंह देयोल के अनुसार पुलिस को दोबारा कस्टडी लेने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने एप्लीकेशन देकर ज्यूडिशियल अप्रूवल लेना होगा और दोबारा गिरफ्तारी की जरूरत बतानी होगी।
5. क्या अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के लिए कम्पनसेशन भी मिल सकता है?
कुछ परिस्थितियों में कम्पनसेशन की मांग की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के मामलों में हाई कोर्ट पब्लिक लॉ रेमेडी के रूप में कम्पनसेशन दे सकता है। हालांकि, हर मामले में कम्पनसेशन अपने आप या एक तय रकम में नहीं मिलता।



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