पति द्वारा मानसिक उत्पीड़न या शारीरिक क्रूरता – कोर्ट में राहत कैसे प्राप्त करें

Mental Harassment or Physical Cruelty by Husband – How to Get Relief in Court

शादी को जीवन का सबसे सुरक्षित और मजबूत रिश्ता माना जाता है। हर महिला इस उम्मीद के साथ शादी करती है कि उसका पति उसका सम्मान करेगा, साथ देगा और हर परिस्थिति में उसका सहारा बनेगा। लेकिन जब यही रिश्ता डर, अपमान, गालियों, धमकियों और मारपीट में बदल जाए, तो यह केवल डोमेस्टिक इलेंस नहीं रह जाता, बल्कि ह्यूमन राइट्स का वॉयलेशन बन जाता है।

शादी के भीतर क्रूरता या अत्याचार एक कड़वी सच्चाई है, जिसे कई लोग खुलकर स्वीकार नहीं करते। कुछ महिलाएँ मारपीट जैसी शारीरिक हिंसा झेलती हैं, तो कुछ को रोज़ाना मेन्टल और इमोशनल टार्चर करा जाता हैं। मानसिक उत्पीड़न धीरे-धीरे महिला की आत्म-विश्वास, आत्मसम्मान और मानसिक शांति को तोड़ देता है।

कई महिलाएँ इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें समाज की बदनामी का डर होता है, वे आर्थिक रूप से पति पर निर्भर होती हैं, बच्चों की चिंता करती हैं या परिवार का दबाव झेलती हैं। लेकिन याद रखें, अत्याचार सहना किसी महिला का कर्तव्य नहीं है। कानून उन महिलाओं के साथ खड़ा है, जो अपने हक के लिए आवाज़ उठाती हैं।

इस ब्लॉग का उद्देश्य पीड़ित महिला को यह समझाना है कि वह अकेली नहीं है, कानून उसके साथ है और सही कदम उठाकर वह न्याय और सुरक्षा दोनों प्राप्त कर सकती है।

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मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक क्रूरता की कानूनी परिभाषा

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) धारा 85 इस धारा के अनुसार, यदि पति या उसके परिवार का कोई सदस्य महिला के साथ शारीरिक या मानसिक क्रूरता करता है, तो यह एक दंडनीय अपराध है। क्रूरता का मतलब केवल मारपीट नहीं, बल्कि ऐसा कोई भी व्यवहार है जिससे महिला को मानसिक पीड़ा हो, उसका आत्मसम्मान टूटे, या उसे नुकसान पहुँचाने की मंशा दिखाई दे।

सज़ा: धारा 85 BNS के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर आरोपी को 3 साल तक की जेल हो सकती है, या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है, या फिर जेल और जुर्माना दोनों की सज़ा दी जा सकती है।

डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 यह कानून महिलाओं को घर के भीतर हर प्रकार की हिंसा से सुरक्षा देता है। इसके तहत डोमेस्टिक वायलेंस में निम्न शामिल हैं:

  • फिजिकल वायलेंस
  • मेन्टल या इमोशनल वायलेंस
  • इकनोमिक वायलेंस
  • सेक्सुअल वायलेंस

मानसिक उत्पीड़न केवल हाथ उठाने तक सीमित नहीं होता। किसी महिला को बार-बार नीचा दिखाना, गालियाँ देना, बेवजह शक करना, डराना, मायके जाने से रोकना, दोस्तों या रिश्तेदारों से मिलने से मना करना, या बच्चों से दूर करने की धमकी देना – ये सभी मानसिक उत्पीड़न के उदाहरण हैं।

शारीरिक क्रूरता में थप्पड़ मारना, घूंसे या लात मारना, धक्का देना, बाल खींचना, जलाना, या किसी भी तरह से चोट पहुँचाना शामिल है। अगर पति या उसके परिवार का कोई सदस्य ऐसा करता है, तो महिला को कानून के तहत शिकायत करने और सुरक्षा पाने का पूरा अधिकार है।

महिलाओं को तुरंत क्या कदम उठाना चाहिए?

  • नज़दीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत करें: यदि आपके साथ मानसिक या शारीरिक क्रूरता हुई है, तो सबसे पहले नज़दीकी पुलिस स्टेशन जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराएं।
  • मेडिकल रिपोर्ट बनवाएं: अगर आपके साथ मारपीट या किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा हुई है, तो तुरंत सरकारी अस्पताल जाकर मेडिकल जांच कराएं। डॉक्टर द्वारा बनाई गई मेडिकल रिपोर्ट भविष्य में आपके केस का मजबूत सबूत बनती है और कोर्ट में बहुत उपयोगी होती है।
  • महिला हेल्पलाइन 181 या 112 पर कॉल करें: आपात स्थिति में महिला हेल्पलाइन नंबर 181 या इमरजेंसी नंबर 112 पर कॉल करें। यहां से आपको तुरंत सहायता, काउंसलिंग और जरूरत पड़ने पर पुलिस मदद भी मिल सकती है। यह सेवा गोपनीय होती है और आपकी सुरक्षा को प्राथमिकता देती है।
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महिला कोर्ट से कौन-कौन से रिलीफ मांग सकती है?

1. प्रोटेक्शन आर्डर – डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट की धारा 18

कोर्ट पति या उसके परिवार वालों को महिला के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा करने, धमकाने, संपर्क करने या परेशान करने से रोक सकता है। यह आदेश महिला की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

2. रेजिडेंस आर्डर – डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट की धारा 19

कोर्ट यह आदेश दे सकता है कि महिला को उसके वैवाहिक घर से न निकाला जाए। यदि उसे घर से बाहर कर दिया गया है, तो पति को महिला को घर में वापस रखने या वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया जा सकता है।

3. मोनेटरी रिलीफ – डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट की धारा 20

कोर्ट पति को महिला और बच्चों के दैनिक खर्च, इलाज, घरेलू जरूरतों और अन्य आवश्यक खर्चों का भुगतान करने का आदेश दे सकता है।

4. मेंटेनेंस

कोर्ट महिला को मासिक आर्थिक सहायता दिलवा सकता है, ताकि वह सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सके।मेंटेनेंस निम्न धाराओं के तहत दिया जाता है:

5. कंपनसेशन – डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट की धारा 22

कोर्ट पति को महिला को हुई मानसिक पीड़ा, भावनात्मक कष्ट और अपमान के लिए मुआवज़ा देने का आदेश दे सकता है।

कोर्ट में क्रिमिनल केस कैसे फाइल करें?

स्टेप 1: पुलिस में FIR के लिए आवेदन सबसे पहले नजदीकी पुलिस थाना या महिला थाना जाएँ और लिखित शिकायत दें। शिकायत में निम्न बातें स्पष्ट लिखें:

  • शादी की तारीख और स्थान
  • उत्पीड़न की पूरी घटनाएँ (तारीख और समय सहित)
  • पति और आरोपी व्यक्तियों के नाम
  • उपलब्ध सबूतों का विवरण

अगर पुलिस FIR दर्ज कर लेती है, तो केस की जांच शुरू हो जाती है।

स्टेप 2: यदि पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? यदि पुलिस आपकी शिकायत नहीं सुन रही है, तो आप यह कदम उठा सकती हैं:

  • सुप्रीटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (SP) या डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (DCP) को लिखित शिकायत भेजें।
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर FIR दर्ज करवाने का आदेश माँगा जा सकता है।

स्टेप 3: कोर्ट में डायरेक्ट क्रिमिनल कंप्लेंट पीड़िता स्वयं या वकील के माध्यम से मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल कंप्लेंट दाखिल कर सकती है। कोर्ट प्रारंभिक सुनवाई के बाद:

  • पुलिस को जांच का आदेश दे सकता है, या
  • सीधे आरोपी को समन जारी कर सकता है

स्टेप 4: जरूरी दस्तावेज़

  • शादी का प्रमाण
  • मेडिकल रिपोर्ट
  • फोटो/वीडियो
  • चैट, कॉल रिकॉर्ड
  • गवाहों के नाम

स्टेप 5: कोर्ट की प्रक्रिया आगे कैसे चलती है? जब केस कोर्ट में दर्ज हो जाता है, तो सबसे पहले आरोपी को सम्मन भेजा जाता है। इसके बाद पुलिस या पीड़िता द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच होती है, गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं और दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका मिलता है। अगर कोर्ट को लगता है कि आरोप साबित होते हैं, तो आरोपी को कानून के अनुसार सज़ा दी जाती है, और साथ ही पीड़िता की सुरक्षा व राहत से जुड़े आदेश भी पारित किए जा सकते हैं।

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मेडिएशन और काउंसलिंग की भूमिका

कई मामलों में कोर्ट यह देखता है कि क्या पति-पत्नी के बीच बातचीत के ज़रिए समस्या का समाधान संभव है। इसलिए कोर्ट कभी-कभी मेडिएशन या काउंसलिंग का सुझाव देता है, ताकि दोनों पक्ष अपनी बात शांति से रख सकें और आपसी समझ से विवाद सुलझ सके। इसका उद्देश्य परिवार को बचाना और अनावश्यक मुकदमेबाज़ी से बचाना होता है।

लेकिन यह ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अगर महिला को पति या ससुराल पक्ष से डर लगता है, जान-माल का खतरा है, या गंभीर शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न हो रहा है, तो उस पर मेडिएशन के लिए ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में महिला सीधे कानूनी कार्रवाई कर सकती है और कोर्ट उसकी सुरक्षा को सबसे पहली प्राथमिकता देता है।

भारतीय कानून में क्रूरता – तलाक का एक आधार

भारत में तलाक लेने के लिए क्रूरता (Cruelty) एक बहुत ही मजबूत और आम कानूनी आधार है। अगर पति अपनी पत्नी के साथ लगातार मानसिक उत्पीड़न करता है या शारीरिक हिंसा करता है, तो पत्नी को कानून यह अधिकार देता है कि वह शादी को कानूनी रूप से खत्म करने के लिए तलाक की अर्जी दाखिल कर सके।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(a) के अनुसार, यदि पति या पत्नी में से कोई एक दूसरे के साथ क्रूरता करता है, तो पीड़ित पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।

क्रूरता में शामिल हो सकता है:

  • बार-बार मारपीट या शारीरिक हिंसा
  • लगातार गाली-गलौज, अपमान या बेइज्जती करना
  • चरित्र पर झूठे आरोप लगाना
  • जान से मारने या नुकसान पहुँचाने की धमकी देना
  • दहेज के लिए परेशान करना
  • पत्नी को जबरन घर से निकाल देना
  • खाना, कपड़ा, सम्मान या प्यार जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित करना

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

समर घोष बनाम जया घोष (2007)

इस मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता दो तरह की हो सकती है – शारीरिक और मानसिक

अगर क्रूरता शारीरिक है, तो यह देखा जाएगा कि मारपीट या हिंसा कितनी गंभीर थी।
अगर क्रूरता मानसिक है, तो अदालत यह जांचेगी कि पति या पत्नी का व्यवहार कैसा था और उस व्यवहार का सामने वाले की मानसिक स्थिति पर क्या असर पड़ा।

कोर्ट ने कहा कि यह देखना ज़रूरी है कि क्या ऐसा व्यवहार इतना परेशान करने वाला था कि पीड़ित जीवनसाथी को यह डर लगने लगे कि उसके साथ रहना नुकसानदेह या असुरक्षित है।

नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली (2006)

इस मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पति या पत्नी एक-दूसरे पर चरित्रहीन होने, मानसिक रूप से बीमार होने या नपुंसक होने जैसे झूठे आरोप लगाते हैं, तो यह मानसिक क्रूरता मानी जाएगी।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि मानसिक क्रूरता के मामलों में यह ज़रूरी नहीं है कि मारपीट हुई हो या जान को खतरा साबित किया जाए। अगर किसी का व्यवहार सामने वाले को गहरा मानसिक कष्ट देता है, तो वही क्रूरता मानी जा सकती है।

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वी. भगत बनाम डी. भगत (1994)

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत आसान शब्दों में यह बताया कि मानसिक क्रूरता क्या होती है। इस केस में पत्नी ने पति पर यह आरोप लगाया कि उसका किसी और महिला से गलत संबंध है। लेकिन वह अपने आरोप को साबित नहीं कर पाई। इन झूठे आरोपों की वजह से पति को समाज में शर्मिंदगी, तनाव और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पति या पत्नी एक-दूसरे पर बिना सबूत के चरित्र पर आरोप लगाते हैं, तो यह बहुत गंभीर बात है। ऐसे आरोप सामने वाले की इज्जत को ठेस पहुँचाते हैं और उसे अंदर से तोड़ देते हैं।

कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह के झूठे और अपमानजनक आरोप मानसिक क्रूरता माने जाएंगे। इसके लिए यह जरूरी नहीं है कि किसी को शारीरिक चोट पहुँची हो। अगर किसी के व्यवहार से दूसरा व्यक्ति लगातार दुखी, अपमानित और परेशान रहता है, तो वह तलाक लेने का कानूनी आधार बन सकता है।

निष्कर्ष

हर शादी का मकसद प्यार, भरोसा और सुरक्षित माहौल होना चाहिए। लेकिन जब वही रिश्ता डर, अपमान और तकलीफ़ की वजह बन जाए, तो यह साफ संकेत है कि सब कुछ ठीक नहीं है। किसी भी महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सिर्फ रिश्ता बचाने के लिए अपना आत्म-सम्मान, सेहत और भविष्य कुर्बान कर दे।

कानून सिर्फ सज़ा देने के लिए नहीं बना है, बल्कि पीड़ित को न्याय, सुरक्षा और सम्मान दिलाने के लिए बना है। जब आप अपने अधिकारों को समझती हैं और सही कानूनी कदम उठाती हैं, तो आप अपने जीवन को दोबारा सही दिशा में ले जाने की शुरुआत करती हैं।

न्याय मांगना कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि हिम्मत की निशानी है। आप शांति, सुरक्षा और क्रूरता से मुक्त जीवन की पूरी हकदार हैं।

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FAQs

1. मानसिक क्रूरता और सामान्य पति-पत्नी के झगड़ों में क्या फर्क है?

सामान्य झगड़े कभी-कभी होते हैं और दोनों तरफ से होते हैं, जबकि मानसिक क्रूरता में बार-बार जानबूझकर ऐसा व्यवहार किया जाता है जिससे एक साथी को गहरी मानसिक पीड़ा होती है और साथ रहना मुश्किल हो जाता है।

2. अगर मारपीट न हो तो भी क्या महिला घरेलू हिंसा से सुरक्षा मांग सकती है?

हाँ। डोमेस्टिक वायलेंस, 2005 के अनुसार मानसिक, भावनात्मक, गाली-गलौज और आर्थिक उत्पीड़न भी घरेलू हिंसा माने जाते हैं, चाहे शारीरिक चोट न हुई हो।

3. क्या कोर्ट से राहत पाने के लिए हर एक घटना का सबूत देना जरूरी है?

नहीं। कोर्ट पूरे व्यवहार को देखकर फैसला करती है। कई छोटी-छोटी घटनाएँ मिलकर भी क्रूरता साबित कर सकती हैं।

4. क्या क्रूरता के आधार पर तलाक का केस चलते समय महिला भरण-पोषण मांग सकती है?

हाँ। महिला केस के दौरान अंतरिम (अस्थायी) और बाद में स्थायी भरण-पोषण की मांग कर सकती है।

5. क्या कई साल की शादी के बाद भी क्रूरता का केस किया जा सकता है?

हाँ। अगर क्रूरता जारी है या उसका असर अब भी महिला पर पड़ रहा है, तो वह कभी भी कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

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