विकलांग कर्मचारियों के साथ वर्कप्लेस हरस्मेंट – जानिए कानूनी उपाय क्या हैं?

Workplace Harassment Against Employees with Disabilities – Know the Legal Remedies

हर कर्मचारी को ऐसा वर्कप्लेस मिलने का अधिकार है, जहां वह बिना किसी डर, भेदभाव या हरस्मेंट के सम्मान के साथ काम कर सके। यह अधिकार विकलांग कर्मचारियों के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें पहले से ही चलने-फिरने, सुनने, देखने, बोलने या संवाद करने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

किसी व्यक्ति की विकलांगता कभी भी उसके साथ भेदभाव करने, उसका मजाक उड़ाने, उसे परेशान करने या उसके अधिकारों से वंचित करने का कारण नहीं बन सकती। फिर भी कई बार केवल विकलांगता के कारण कर्मचारियों के साथ वर्कप्लेस पर गलत व्यवहार किया जाता है।

भारत का कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी कर्मचारी के साथ केवल उसकी विकलांगता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। हर एम्प्लायर की जिम्मेदारी है कि वह ऐसा वर्कप्लेस उपलब्ध कराए, जहां विकलांग कर्मचारी सम्मान, समान अवसर और सुरक्षित माहौल में अपना काम कर सकें।

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विकलांग कर्मचारियों के साथ वर्कप्लेस हरस्मेंट क्या होता है?

वर्कप्लेस हरस्मेंट का मतलब है कि किसी कर्मचारी के साथ उसकी विकलांगता के कारण ऐसा व्यवहार किया जाए जिससे उसे अपमान, डर, मानसिक तनाव या भेदभाव का सामना करना पड़े। ऐसा व्यवहार कर्मचारी के सम्मान, काम करने की क्षमता और करियर पर भी बुरा असर डाल सकता है। उदाहरण के लिए—

  • कर्मचारी की विकलांगता का मजाक उड़ाना।
  • अपमानजनक शब्दों या गलत नामों से बुलाना।
  • बार-बार सबके सामने बेइज्जत करना या नीचा दिखाना।
  • महत्वपूर्ण मीटिंग, प्रोजेक्ट या ऑफिस की गतिविधियों से जानबूझकर बाहर रखना।
  • केवल विकलांगता के कारण प्रमोशन या अन्य अवसरों से वंचित करना।
  • कर्मचारी की जरूरत के अनुसार उचित सुविधाएं उपलब्ध न कराना।
  • आवश्यक सुविधाएं देने से इंकार करने के बाद ऐसा काम देना, जिसे कर्मचारी सामान्य रूप से पूरा नहीं कर सकता।
  • विकलांगता के कारण नौकरी से निकालने की धमकी देना।
  • ऐसा माहौल बनाना, जिसमें कर्मचारी खुद को असुरक्षित, अपमानित या अलग-थलग महसूस करे।

वर्कप्लेस हरस्मेंट केवल एक बार होने वाली घटना नहीं होती। यदि ऐसा व्यवहार बार-बार किया जाए या लंबे समय तक चलता रहे, तो यह भी हरस्मेंट माना जा सकता है।

भारत में लागू प्रमुख कानून

विकलांग कर्मचारियों को वर्कप्लेस पर भेदभाव, हरस्मेंट और अनुचित व्यवहार से बचाने के लिए भारत में कई महत्वपूर्ण कानून लागू हैं। यदि किसी कर्मचारी के साथ उसकी विकलांगता के कारण गलत व्यवहार किया जाता है, तो वह इन कानूनों के तहत अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है।

राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज एक्ट, 2016 (RPwD Act)

यह भारत का मुख्य कानून है, जो विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें समान अवसर दिलाने के लिए बनाया गया है।

धारा 3 – समानता और गैर-भेदभाव

इस धारा के अनुसार प्रत्येक विकलांग व्यक्ति को समानता का अधिकार है। केवल विकलांगता के आधार पर उसके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और उसे सम्मान के साथ व्यवहार पाने का अधिकार है।

धारा 20 – रोजगार में गैर-भेदभाव

इस धारा के अनुसार किसी कर्मचारी के साथ उसकी विकलांगता के कारण नौकरी में भेदभाव नहीं किया जा सकता। एम्प्लायर का दायित्व है कि वह विकलांग कर्मचारियों को समान अवसर दे और कानून के अनुसार आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करे।

धारा 21 – समान अवसर नीति

इस धारा के तहत प्रत्येक उपयुक्त इस्टैब्लिशमेंट को समान अवसर नीति तैयार करनी चाहिए। इस नीति में यह बताया जाता है कि वर्कप्लेस पर विकलांग कर्मचारियों को समान अवसर, आवश्यक सुविधाएं और निष्पक्ष व्यवहार कैसे दिया जाएगा।

धारा 23 – ग्रीवांस रेड्रेसल अफसर

कई इस्टैब्लिशमेंट में शिकायतों के समाधान के लिए ग्रीवांस रेड्रेसल अफसर नियुक्त करना आवश्यक होता है। यदि किसी विकलांग कर्मचारी के साथ भेदभाव या हरस्मेंट होता है, तो वह अपनी शिकायत इस अधिकारी के पास कर सकता है।

भारतीय संविधान

भारतीय संविधान भी प्रत्येक व्यक्ति को समानता, सम्मान और भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार देता है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण प्राप्त है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान या अन्य आधारों पर भेदभाव करने से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर देने की बात करता है।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।
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सेक्सशुअल हरस्मेंट ऑफ़ वूमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रेड्रेसल) एक्ट, 2013

यदि किसी विकलांग महिला कर्मचारी के साथ वर्कप्लेस पर सेक्शुअल हरैस्मेंट होता है, तो यह कानून लागू हो सकता है।

इस कानून के तहत कई एम्प्लायर के लिए इंटरनल समिति (IC) का गठन करना आवश्यक होता है, ताकि महिला कर्मचारी अपनी शिकायत दर्ज करा सके और उसकी निष्पक्ष जांच हो सके।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS)

यदि हरस्मेंट का मामला गंभीर हो और उसमें आपराधिक अपराध शामिल हो, तो परिस्थितियों के अनुसार भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के विभिन्न प्रावधान लागू हो सकते हैं। उदाहरण के लिए—

  • महिला की गरिमा का अपमान करना।
  • आपराधिक धमकी देना।
  • हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना।
  • स्टॉकिंग करना।
  • सेक्शुअल हरैस्मेंट से जुड़े अपराध करना।
  • अश्लील संदेश, फोटो या अन्य आपत्तिजनक सामग्री भेजना। यदि ऐसा डिजिटल माध्यम से किया गया है, तो अन्य संबंधित कानून भी लागू हो सकते हैं।

ध्यान दें: BNS की कौन-सी धारा लागू होगी, यह हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले अनुभवी वकील से सलाह लेना उचित रहता है।

रिज़नेबल अकोमोडेशन क्या है?

रिज़नेबल अकोमोडेशन का मतलब है कि एम्प्लायर विकलांग कर्मचारी की जरूरतों के अनुसार वर्कप्लेस या काम करने के तरीके में ऐसे उचित बदलाव या सुविधाएं उपलब्ध कराए, जिससे वह अपना काम आसानी, सुरक्षित तरीके और सम्मान के साथ कर सके। यह सुविधा तभी दी जाती है, जब इससे एम्प्लायर पर असंगत या अत्यधिक आर्थिक या प्रशासनिक बोझ न पड़े। उदाहरण के लिए—

  • व्हीलचेयर से आने-जाने योग्य ऑफिस या रैंप की व्यवस्था।
  • आंखों से कम देखने वाले कर्मचारियों के लिए स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराना।
  • आवश्यकता के अनुसार फ्लेक्सिबल वर्किंग टाइम देना।
  • कर्मचारी की जरूरत के अनुसार वर्क स्टेशन में आवश्यक बदलाव करना।
  • सुनने या बोलने में कठिनाई वाले कर्मचारियों के लिए साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर की व्यवस्था करना।
  • दिव्यांग कर्मचारियों के लिए सुलभ शौचालय उपलब्ध कराना।
  • आवश्यक असिस्टिव टेक्नोलॉजी या अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराना।

यदि किसी विकलांग कर्मचारी को ऐसी उचित सुविधाएं देने की आवश्यकता होने के बावजूद एम्प्लायर बिना किसी उचित कारण के उन्हें देने से इंकार करता है, तो इसे कई मामलों में भेदभाव माना जा सकता है और कर्मचारी कानून के तहत उचित कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

यदि वर्कप्लेस पर हरस्मेंट हो रहा है, तो तुरंत क्या करें?

यदि आपके साथ वर्कप्लेस पर आपकी विकलांगता के कारण हरस्मेंट, भेदभाव या गलत व्यवहार हो रहा है, तो घबराने के बजाय समय रहते सही कदम उठाना बहुत महत्वपूर्ण है।

स्टेप 1: हर घटना का लिखित रिकॉर्ड रखें

हर घटना की तारीख, समय, स्थान, क्या हुआ, किसने किया और वहां कौन मौजूद था, इसकी पूरी जानकारी लिखकर सुरक्षित रखें। यह रिकॉर्ड भविष्य में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकता है।

स्टेप 2: सभी साक्ष्य सुरक्षित रखें

ईमेल, व्हाट्सएप चैट, संदेश, फोटो, दस्तावेज और अन्य संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। यदि कानून इसकी अनुमति देता हो, तो उपलब्ध रिकॉर्डिंग भी साक्ष्य के रूप में उपयोगी हो सकती है।

स्टेप 3: अपने रिपोर्टिंग मैनेजर या HR डिपार्टमेंट को जानकारी दें

घटना की जानकारी अपने रिपोर्टिंग मैनेजर, HR डिपार्टमेंट या कंपनी के संबंधित अधिकारी को जल्द से जल्द दें, ताकि समय रहते उचित कार्रवाई की जा सके।

स्टेप 4: लिखित शिकायत करें

केवल मौखिक शिकायत करने के बजाय अपनी शिकायत लिखित रूप में दें। शिकायत की एक प्रति और उसे जमा करने का प्रमाण भी अपने पास सुरक्षित रखें।

स्टेप 5: यदि कार्रवाई न हो तो कानूनी सलाह लें

यदि एम्प्लायर आपकी शिकायत पर उचित कार्रवाई नहीं करता या हरस्मेंट लगातार जारी रहता है, तो किसी अनुभवी वकील से कानूनी सलाह लें और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाएं।

क्या कर्मचारी को केवल विकलांगता के कारण नौकरी से निकाला जा सकता है?

नहीं। केवल इस आधार पर कि कोई कर्मचारी विकलांग है, एम्प्लायर उसे नौकरी से नहीं निकाल सकता। किसी कर्मचारी के साथ उसकी विकलांगता के कारण भेदभाव करना या बिना कानूनी कारण के उसकी नौकरी समाप्त करना कानून के विरुद्ध हो सकता है।

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यदि किसी कर्मचारी को नौकरी के दौरान विकलांगता हो जाती है, तो एम्प्लायर की जिम्मेदारी है कि वह राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज एक्ट, 2016 के प्रावधानों का पालन करे।

एम्प्लायर को परिस्थितियों के अनुसार—

  • कर्मचारी को रिज़नेबल अकोमोडेशन देने पर विचार करना चाहिए।
  • कर्मचारी को कानून के अनुसार उपलब्ध सुरक्षा और अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
  • केवल विकलांगता के आधार पर जल्दबाजी में नौकरी समाप्त करने का निर्णय नहीं लेना चाहिए।

यदि किसी विकलांग कर्मचारी को केवल उसकी विकलांगता के कारण नौकरी से निकाला जाता है या उसके साथ भेदभाव किया जाता है, तो वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संबंधित प्राधिकरण, न्यायालय या अन्य उपलब्ध कानूनी मंच का सहारा ले सकता है।

विकलांग कर्मचारियों के लिए उपलब्ध कानूनी उपाय

यदि किसी विकलांग कर्मचारी के साथ वर्कप्लेस पर भेदभाव, हरस्मेंट या कानून के विरुद्ध व्यवहार किया जाता है, तो वह मामले की परिस्थितियों के अनुसार निम्न कानूनी उपाय अपना सकता है—

1. कंपनी के अंदर शिकायत दर्ज करना

सबसे पहले कर्मचारी अपने एम्प्लायर, HR डिपार्टमेंट, ग्रीवांस रेड्रेसल अफसरया कंपनी की अन्य संबंधित समिति के समक्ष लिखित शिकायत दर्ज कर सकता है। कई मामलों में शिकायत का समाधान कंपनी के स्तर पर ही हो जाता है।

2. संबंधित प्राधिकरण के समक्ष शिकायत करना

यदि कंपनी उचित कार्रवाई नहीं करती, तो कर्मचारी कानून के अनुसार संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।

3. चीफ कमिश्नर या स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज के समक्ष शिकायत

RPwD Act, 2016 के तहत कर्मचारी चीफ कमिश्नर या स्टेट कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज के समक्ष भी शिकायत कर सकता है। ये प्राधिकरण विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और शिकायतों के समाधान के लिए बनाए गए हैं।

4. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में पिटीशन

यदि मामले में मौलिक या कानूनी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है और परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं, तो कर्मचारी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 के तहत संबंधित हाई कोर्ट में रिट पिटीशन दायर कर सकता है।

5. कंपनसेशन की मांग

यदि कर्मचारी को हरस्मेंट, भेदभाव या अन्य गैर-कानूनी कार्यों के कारण आर्थिक या अन्य प्रकार की हानि हुई है, तो कानून के अनुसार उपयुक्त मामलों में कंपनसेशन की मांग भी की जा सकती है।

6. नौकरी से संबंधित अन्य राहत

यदि कर्मचारी को गलत तरीके से नौकरी से निकाला गया है, पदावनत किया गया है या उसके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया है, तो मामले के तथ्यों के अनुसार वह नौकरी पर दोबारा बहाली (Reinstatement) या अन्य उपयुक्त रोजगार संबंधी राहत की मांग भी कर सकता है।

हर मामले के तथ्य अलग-अलग होते हैं। इसलिए कोई भी कानूनी कार्रवाई करने से पहले अनुभवी वकील से सलाह लेना उचित रहता है।

कर्मचारी को कौन-कौन सी अंतरिम राहत मिल सकती है?

यदि किसी विकलांग कर्मचारी के साथ वर्कप्लेस पर हरस्मेंट, भेदभाव या अन्याय हुआ है, तो कोर्ट या संबंधित प्राधिकरण अंतिम निर्णय आने तक कर्मचारी के अधिकारों की सुरक्षा के लिए मामले की परिस्थितियों के अनुसार अंतरिम राहत (Interim Relief) दे सकता है।

उदाहरण के लिए—

1. दूसरे विभाग या वर्कप्लेस में ट्रांसफर 

यदि पीड़ित कर्मचारी और आरोपी एक ही विभाग या टीम में काम कर रहे हैं, तो निष्पक्ष जांच और कर्मचारी की सुरक्षा के लिए कर्मचारी या आरोपी का दूसरे विभाग में अस्थायी ट्रांसफर किया जा सकता है।

2. आरोपी को अस्थायी रूप से हटाना 

यदि प्रथम दृष्टया आरोप (Prime facie allegation) गंभीर प्रतीत होते हैं, तो जांच पूरी होने तक आरोपी कर्मचारी या अधिकारी को अस्थायी रूप से उसके पद या जिम्मेदारियों से हटाया जा सकता है, ताकि जांच निष्पक्ष रूप से हो सके।

3. वेतन और अन्य सेवा लाभ जारी रखने का आदेश 

यदि जांच के दौरान कर्मचारी किसी कारणवश काम नहीं कर पा रहा है या उसे अस्थायी रूप से कार्य से दूर रखा गया है, तो परिस्थितियों के अनुसार कोर्ट या संबंधित प्राधिकरण वेतन या अन्य सेवा लाभ जारी रखने का आदेश दे सकता है।

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4. अवकाश की अनुमति 

यदि हरस्मेंट या भेदभाव के कारण कर्मचारी मानसिक तनाव, स्वास्थ्य संबंधी समस्या या अन्य कठिनाई का सामना कर रहा है, तो उसे आवश्यक अवकाश देने का निर्देश दिया जा सकता है।

5. रेटालिएशन पर रोक 

केवल शिकायत करने के कारण एम्प्लायर कर्मचारी के खिलाफ बदले की भावना से कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। जैसे—नौकरी से निकालना, वेतन कम करना, पदावनति करना, अनुचित ट्रांसफर करना या किसी अन्य प्रकार से परेशान करना। ऐसी कार्रवाई पर कोर्ट या संबंधित प्राधिकरण रोक लगाने का आदेश दे सकता है। ध्यान रखें कि अंतरिम राहत प्रत्येक मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित कानून के आधार पर दी जाती है।

V. Surendra Mohan v. Union of India (2014) 14 SCC 222

इस मामले में एक दृष्टिबाधित (Visually Impaired) अभ्यर्थी ने सिविल जज की भर्ती से जुड़े नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि केवल दृष्टि संबंधी विकलांगता के आधार पर उन्हें नियुक्ति से वंचित करना भेदभाव है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समानता एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन किसी खास पद के लिए योग्यता उस पद से जुड़े कामों की प्रकृति पर निर्भर करती है। कोर्ट ने उस मामले में भर्ती के नियमों को सही ठहराया, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि दिव्यांग लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए और उन्हें किसी ठोस कानूनी आधार के बिना बाहर नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने दृष्टि या सुनने की अक्षमता वाले उम्मीदवारों के लिए न्यायिक नियुक्तियों को 40% से 50% की दिव्यांगता सीमा तक सीमित करने की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि न्यायिक कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन करने के लिए उचित स्तर की दृष्टि का होना ज़रूरी है।

इस निर्णय का महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किसी विकलांग व्यक्ति के साथ केवल उसकी विकलांगता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि किसी विशेष पद के लिए कोई शारीरिक या अन्य क्षमता उस पद के आवश्यक कार्यों के लिए वास्तव में जरूरी है, तो ऐसी शर्तें कानूनी रूप से वैध हो सकती हैं। इसलिए प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और संबंधित पद की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है।

निष्कर्ष

हर कर्मचारी को वर्कप्लेस पर सम्मान, समान अवसर और सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए। विकलांगता के आधार पर भेदभाव, उत्पीड़न या अधिकारों से वंचित करना गलत है। भारतीय कानून विकलांग कर्मचारियों के लिए रिज़नेबल अकोमोडेशन और समान संरक्षण सुनिश्चित करता है। यदि हरस्मेंट हो, तो तुरंत शिकायत करें, साक्ष्य सुरक्षित रखें और कानूनी सलाह लें। इससे न केवल व्यक्तिगत अधिकार सुरक्षित होते हैं, बल्कि वर्कप्लेस अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनता है।

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FAQs

1. भारत में विकलांग कर्मचारियों को वर्कप्लेस पर भेदभाव से कौन-सा कानून सुरक्षा देता है?

विकलांग कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए मुख्य कानून Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 है। इसके अलावा भारतीय संविधान और अन्य लागू कानून भी कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।

2. रिज़नेबल अकोमोडेशन क्या होता है?

रिज़नेबल अकोमोडेशन का मतलब है कि एम्प्लायर विकलांग कर्मचारी की जरूरत के अनुसार वर्कप्लेस या काम करने के तरीके में आवश्यक और उचित बदलाव या सुविधाएं उपलब्ध कराए, ताकि वह अपना काम प्रभावी ढंग से कर सके।

3. क्या एम्प्लायर केवल विकलांगता के कारण किसी कर्मचारी को नौकरी से निकाल सकता है?

नहीं। केवल विकलांगता के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। एम्प्लायर को Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 के तहत उपलब्ध कानूनी सुरक्षा और अधिकारों का पालन करना होता है।

4. वर्कप्लेस पर हरस्मेंट के मामले में कर्मचारी को कौन-कौन से साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए?

कर्मचारी को ईमेल, व्हाट्सएप चैट, अन्य संदेश, लिखित शिकायतें, कार्य प्रदर्शन से जुड़े रिकॉर्ड, विकलांगता प्रमाणपत्र, गवाहों की जानकारी तथा अन्य सभी संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए, जो उसके मामले को साबित करने में मदद कर सकें।

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