भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 351 क्या है? जानिए कानून क्या कहता है

What is Section 351 of the Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023? Learn what the law says.

हर आपराधिक मामला हमेशा मारपीट या शारीरिक हिंसा से शुरू नहीं होता। कई बार कानून उससे पहले ही लागू हो जाता है, जब किसी व्यक्ति को डराया जाता है, दबाव डाला जाता है, या धमकी देकर उसकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने के लिए मजबूर किया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी में धमकी का इस्तेमाल अक्सर फेमिली डिस्प्यूट, प्रॉपर्टी झगड़े डिस्प्यूट बिजनेस डिस्प्यूट, नौकरी में दबाव, कर्ज वसूली की परेशानियां, और ऑनलाइन मैसेज या कॉल के जरिए भी किया जाता है। बहुत से लोग सोचते हैं कि जब तक कोई शारीरिक नुकसान न हो, तब तक मामला आपराधिक नहीं बनता, लेकिन भारतीय आपराधिक कानून यह मानता है कि गंभीर धमकी भी अपने आप में अपराध हो सकती है, क्योंकि इससे व्यक्ति की शांति, सुरक्षा और कानूनी अधिकार प्रभावित होते हैं।

इसी कारण भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 एक बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान है। आज के समय में ऐसी धमकी सिर्फ आमने-सामने नहीं दी जाती, बल्कि फोन कॉल, व्हाट्सएप मैसेज, सोशल मीडिया, ईमेल, या परिवार की बदनामी की धमकी के रूप में भी दी जा सकती है।

यह धारा आज के समय में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल शारीरिक खतरे से ही नहीं, बल्कि डर दिखाकर परेशान करने, जबरदस्ती दबाव बनाने, और गैरकानूनी तरीके से किसी को कंट्रोल करने से भी सुरक्षा देती है। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि हर गुस्से में कही गई बात या हर बहस आपराधिक मामला नहीं बनती। कानून यह देखता है कि क्या दी गई धमकी वास्तव में गंभीर थी, जानबूझकर दी गई थी, और क्या उससे सामने वाले व्यक्ति में सचमुच डर या घबराहट पैदा हो सकती थी।

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BNS की धारा 351 क्या कहती है?

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 में आपराधिक धमकी के अपराध के बारे में बताया गया है। इसे क्रिमिनल इंटिमीडेशन भी कहा जाता है।

सरल भाषा में समझें तो, अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को धमकी देता है, और वह धमकी इस इरादे से दी जाती है कि सामने वाला डर जाए, घबरा जाए, या दबाव में आकर कुछ करने या न करने पर मजबूर हो जाए, तो यह मामला धारा 351 के तहत आ सकता है।

यह धमकी इन चीजों से जुड़ी हो सकती है:

  • उस व्यक्ति के शरीर को नुकसान पहुँचाने की धमकी
  • उस व्यक्ति की इज्जत / प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की धमकी
  • उस व्यक्ति की प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने की धमकी
  • या ऐसे किसी व्यक्ति के शरीर, प्रतिष्ठा या प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने की धमकी, जिससे वह व्यक्ति जुड़ा हो जैसे पति / पत्नी, बच्चा, माता-पिता, भाई-बहन, करीबी रिश्तेदार, या कुछ मामलों में व्यापारिक साझेदार भी

अगर यह धमकी इस मकसद से दी गई हो कि:

  • सामने वाले में डर या घबराहट पैदा हो, या
  • उसे ऐसा काम करने के लिए मजबूर किया जाए, जो वह कानूनन करने के लिए बाध्य नहीं है, या
  • उसे ऐसा काम करने से रोका जाए, जो वह कानूनन करने का हक रखता है,

तो ऐसी स्थिति में यह आपराधिक धमकी मानी जा सकती है और धारा 351 BNS लागू हो सकती है।

उदाहरण: अगर A, B को यह धमकी देता है कि अगर उसने सिविल मुकदमा दायर किया या आगे बढ़ाया, तो वह B का घर जला देगा, और यह धमकी B को केस करने से रोकने के लिए दी गई है, तो ऐसी स्थिति में A ने आपराधिक धमकी का अपराध किया है।

क्या हर धमकी को आपराधिक धमकी माना जाता है?

नहीं। यह बात समझना बहुत जरूरी है। हर गुस्से में कही गई बात, गाली-गलौज, या बहस अपने आप आपराधिक मामला नहीं बनती।

ऐसी बातें जो हर बार आपराधिक धमकी नहीं मानी जातीं:

  • गुस्से में अचानक बोल दी गई बात, जिसमें सच में डराने का इरादा न हो
  • सिर्फ गाली-गलौज, लेकिन कोई साफ और गंभीर धमकी न हो
  • बहुत बढ़ा-चढ़ाकर या अस्पष्ट बात, जिससे वास्तव में डर पैदा न हो
  • ऐसी बात, जिसे कोई सामान्य समझ वाला व्यक्ति गंभीरता से न ले
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कोर्ट आमतौर पर यह देखती है: इरादा और परिस्थिति क्या थी और उस बात का असर सामने वाले पर क्या पड़ा।

BNS की धारा 351 की अन्य उप-धाराएँ

धारा 351(2) BNS –आपराधिक धमकी की सजा

धारा 351(2) के तहत अगर कोई व्यक्ति इस धारा के तहत दोषी पाया जाता है, तो उसे 2 साल तक की सजा, या जुर्माना, या दोनो हो सकते हैं।

इसके अलावा, इस धारा के तहत अपराध की प्रकृति इस प्रकार है:

  • यह नॉन कॉग्निजेबल ऑफेंस है, यानी पुलिस आमतौर पर सीधे FIR दर्ज करके तुरंत गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
  • यह बेल योग्य अपराध है, यानी आरोपी को बेल मिलने का कानूनी अधिकार होता है।
  • इस मामले की सुनवाई किसी भी मजिस्ट्रेट की अदालत में हो सकती है।

धारा 351(3) BNS – गंभीर आपराधिक धमकी की सजा

धारा 351(3) में ज्यादा गंभीर और खतरनाक प्रकार की आपराधिक धमकी की सजा बताई गई है। यह धारा तब लागू होती है जब धमकी बहुत गंभीर हो, जैसे:

  • किसी को जान से मारने की धमकी,
  • गंभीर चोट पहुँचाने की धमकी,
  • आग लगाकर प्रॉपर्टी नष्ट करने की धमकी,
  • ऐसा अपराध करने की धमकी, जिसकी सजा मृत्युदंड, आजीवन कारावास, या 7 साल तक की कैद हो सकती है,
  • किसी महिला की इज्जत / चरित्र / प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की धमकी,

अगर कोई व्यक्ति इस धारा के तहत दोषी पाया जाता है, तो उसे 7 साल तक की सजा, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

उदाहरण: अगर A, B से कहता है, “अगर तुमने पुलिस में शिकायत की, तो मैं तुम्हें जान से मार दूँगा और तुम्हारा घर जला दूँगा।” यह गंभीर आपराधिक धमकी है, जो धारा 351(3) BNS के तहत आ सकती है।

धारा 351(4) BNS – गुमनाम तरीके से दी गई आपराधिक धमकी

धारा 351(4) उस स्थिति पर लागू होती है, जब कोई व्यक्ति गुमनाम तरीके से या अपनी पहचान छिपाकर धमकी देता है। यानि अगर धमकी अनजान / गुमनाम व्यक्ति के नाम से दी जाए, या ऐसे तरीके से दी जाए कि धमकी देने वाले की पहचान छिपी रहे, तो यह मामला ज्यादा गंभीर माना जाता है।

ऐसी धमकी को कानून ज्यादा गंभीर इसलिए मानता है, क्योंकि इससे:

  • सामने वाले में ज्यादा डर पैदा होता है,
  • आरोपी को पकड़ना मुश्किल हो जाता है,
  • मानसिक दबाव और बढ़ जाता है,
  • और आजकल इसका गलत इस्तेमाल फर्जी नंबर, फर्जी ईमेल, फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट, या बिना नाम के पत्र के जरिए भी होता है।

अगर कोई व्यक्ति गुमनाम तरीके से आपराधिक धमकी देता है, तो उसे आपराधिक धमकी की सामान्य सजा, और उसके अलावा अतिरिक्त सजा दी जा सकती है।

पुराने कानून धारा 507 IPC के अनुसार, ऐसी स्थिति में आपराधिक धमकी की सजा, और 2 साल तक की अतिरिक्त कैद हो सकती थी।

उदाहरण: अगर किसी महिला को फर्जी मोबाइल नंबर या फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट से मैसेज आता है कि “अगर तुमने शिकायत की, तो तुम्हारी बदनामी कर दूँगा”, तो यह गुमनाम आपराधिक धमकी मानी जा सकती है और धारा 351(4) BNS लागू हो सकती है।

धारा 351(3) और धारा 351(4) BNS के तहत अपराध की प्रकृति इस प्रकार है:

  • यह नॉन कॉग्निजेबल ऑफेंस है, यानी पुलिस आमतौर पर सीधे FIR दर्ज करके तुरंत गिरफ्तारी नहीं कर सकती।
  • यह बेल योग्य अपराध है, यानी आरोपी को बेल मिलने का कानूनी अधिकार होता है।
  • इन मामलों की सुनवाई फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की अदालत में होती है।

धारा 351 BNS के तहत अपराध साबित होने के लिए जरूरी बातें

किसी भी मामले को आपराधिक धमकी मानने के लिए सिर्फ गुस्से में कही गई बात काफी नहीं होती। इसके लिए कुछ जरूरी कानूनी बातें होना जरूरी है।

1. सबसे पहले, धमकी होना जरूरी है

सबसे पहले यह जरूरी है कि कोई ऐसी बात, मैसेज, हरकत या तरीका हो, जिससे साफ लगे कि सामने वाले को धमकी दी गई है। यह धमकी कई तरीकों से दी जा सकती है, जैसे मौखिक रूप से कही गई बात, लिखित संदेश, फोन कॉल या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म के द्वारा।

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2. धमकी किसी नुकसान से जुड़ी होनी चाहिए

धमकी सिर्फ गुस्से में कही गई बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह किसी वास्तविक नुकसान से जुड़ी होनी चाहिए। यह नुकसान व्यक्ति के शरीर, इज्जत / प्रतिष्ठा, प्रॉपर्टी, या उसके किसी करीबी व्यक्ति के शरीर, इज्जत या प्रॉपर्टी को लेकर हो सकता है, जैसे मारपीट, जान से मारने की धमकी, बदनामी करना, या घर-दुकान को नुकसान पहुँचाने की धमकी।

3. डर पैदा करने का इरादा होना जरूरी है

यह इस अपराध की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है। कानून हर गुस्से में कही गई बात या भावनाओं में बोले गए शब्दों को अपराध नहीं मानता। यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी का इरादा था सामने वाले को डराना, उस पर मानसिक दबाव डालना, उसे असुरक्षित महसूस कराना या उसके व्यवहार / फैसले को कंट्रोल करना।

4. धमकी के पीछे दबाव या जबरदस्ती का मकसद हो सकता है

अक्सर धमकी किसी मांग, जबरदस्ती, या गैरकानूनी दबाव से जुड़ी होती है। जैसे:

  • “पैसे दे दो, नहीं तो तुम्हारी बदनामी कर दूँगा।”
  • “FIR वापस ले लो, नहीं तो जान से मार दूँगा।”
  • “मुझसे शादी करो, नहीं तो तुम्हारी फोटो वायरल कर दूँगा।”
  • “इस्तीफा दे दो, नहीं तो तुम्हारे खिलाफ झूठे केस कर दूँगा।”

ऐसी बातें दिखाती हैं कि धमकी सिर्फ गुस्से में नहीं दी गई, बल्कि किसी को मजबूर करने के लिए दी गई है।

5. पूरा मामला और परिस्थिति बहुत मायने रखती है

कोर्ट सिर्फ शब्द नहीं देखती, बल्कि पूरा संदर्भ भी देखती है। कोर्ट आमतौर पर यह जांचती है:

  • दोनों पक्षों के बीच पहले से क्या रिश्ता या विवाद था
  • बोले गए शब्द कितने गंभीर थे
  • धमकी किस परिस्थिति में दी गई
  • आरोपी का व्यवहार कैसा था
  • क्या पीड़ित वास्तव में डर गया / घबरा गया
  • क्या वह धमकी सच में डर पैदा करने लायक थी

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय

विक्रम जौहर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 2019 SC 2109)

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में साफ कहा कि सिर्फ गाली-गलौज करना या गंदे / अश्लील शब्द बोलना मात्र से आपराधिक धमकी का अपराध नहीं बनता। यानी हर झगड़ा या गुस्से में कही गई गलत बात धारा 351 BNS के तहत अपराध नहीं मानी जाएगी।

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक धमकी साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है:

  • आरोपी ने किसी व्यक्ति को धमकी दी हो,
  • वह धमकी उस व्यक्ति, उसकी इज्जत, उसकी प्रॉपर्टी, या उसके किसी करीबी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने से जुड़ी हो,
  • और आरोपी का इरादा डर पैदा करना हो, ताकि सामने वाला कोई ऐसा काम करे जो वह कानूनन करने के लिए बाध्य नहीं है, या कोई ऐसा काम छोड़ दे जो करने का उसे कानूनी अधिकार है।

माणिक तनेजा बनाम कर्नाटक राज्य ((2015) 7 SSC 423)

  • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 351 BNS (पुरानी धारा 503 IPC) लगाने के लिए आरोपी का इरादा देखना बहुत जरूरी है।
  • कोर्ट ने यह भी कहा कि फेसबुक एक पब्लिक फोरम है, और अगर कोई व्यक्ति पुलिस के बुरे व्यवहार के बारे में फेसबुक पर टिप्पणी करता है, तो सिर्फ इतना भर आपराधिक धमकी नहीं माना जाएगा।

धारा 351 BNS के तहत क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है?

1. पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज करें

यदि किसी ने आपको जान, परिवार, प्रॉपर्टी या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी है, तो सबसे पहले नजदीकी पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दें और घटना का पूरा विवरण स्पष्ट रूप से लिखें।

2. FIR दर्ज करवाने की मांग करें

यदि धमकी गंभीर हो, बार-बार दी जा रही हो, या वास्तविक खतरा महसूस हो रहा हो, तो पुलिस से FIR दर्ज करने की मांग करें ताकि मामले की औपचारिक आपराधिक जांच शुरू हो सके।

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3. सभी सबूत सुरक्षित रखें

व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग, स्क्रीनशॉट, CCTV फुटेज, ईमेल, सोशल मीडिया मैसेज, और गवाहों की जानकारी सुरक्षित रखें। ये सबूत पुलिस जांच और अदालत में आपका केस मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

4. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत करें

यदि थाना स्तर पर पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है, तो आप ACP, DCP, SP या कमिश्नर को लिखित शिकायत भेज सकते हैं। इससे मामले में दबाव बनता है और जांच आगे बढ़ सकती है।

5. मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल शिकायत दायर करें

यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो आप मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल कंप्लेंट / आवेदन दायर कर सकते हैं। अदालत पुलिस को जांच के निर्देश दे सकती है या सीधे कार्यवाही शुरू कर सकती है।

6. ऑनलाइन धमकी पर साइबर सेल में शिकायत करें

यदि धमकी व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ईमेल या अन्य डिजिटल माध्यम से दी गई है, तो आप स्थानीय साइबर सेल या ऑनलाइन साइबर क्राइम पोर्टल पर भी शिकायत कर सकते हैं।

7. पुलिस सुरक्षा या प्रोटेक्शन मांगें

यदि धमकी के कारण आपको या आपके परिवार को वास्तविक खतरा है, तो आप पुलिस से प्रोटेक्शन की मांग कर सकते हैं, ताकि आगे किसी गंभीर घटना को रोका जा सके।

8. जरूरत हो तो सिविल कोर्ट का सहारा लें

यदि धमकी प्रॉपर्टी, रास्ता, कब्जा, या पड़ोसी डिस्प्यूट से जुड़ी है, तो आप सिविल कोर्ट में इन्जंक्शन या स्टे आर्डर के लिए आवेदन करके सामने वाले को रोकने की कानूनी कोशिश कर सकते हैं।

निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 एक बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी कानूनी प्रावधान है, जो लोगों को धमकी, डर, दबाव और जबरदस्ती से सुरक्षा देता है। कानून यह मानता है कि नुकसान सिर्फ मारपीट या शारीरिक हिंसा से ही नहीं होता, बल्कि कई बार सिर्फ गंभीर धमकी भी किसी व्यक्ति की मानसिक शांति खत्म कर सकती है, उसे डराकर मजबूर कर सकती है, या उसकी आवाज दबा सकती है। चाहे धमकी सीधे बोलकर, फोन कॉल, डिजिटल मैसेज, या परिवार, इज्जत या प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने के रूप में दी जाए, अगर उसका मकसद डर पैदा करना है, तो कानून कार्रवाई कर सकता है।

लेकिन साथ ही, कानून यह भी साफ करता है कि हर झगड़ा, गुस्से में कही गई बात, या गाली-गलौज अपने-आप आपराधिक मामला नहीं बन जाती। कोर्ट हर मामले में इरादा, परिस्थिति, धमकी की गंभीरता, और उपलब्ध सबूत को ध्यान से देखती है, और उसके बाद ही तय करती है कि धारा 351 BNS का अपराध बनता है या नहीं।

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FAQs

1. भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 351 क्या है?

धारा 351 BNS आपराधिक धमकी से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति किसी को उसकी जान, प्रॉपर्टी, प्रतिष्ठा या परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर डराता है या दबाव बनाता है, तो यह धारा लागू हो सकती है।

2. क्या व्हाट्सएप पर जान से मारने की धमकी देना अपराध है?

हाँ, व्हाट्सएप मैसेज, वॉइस नोट, स्क्रीनशॉट या चैट के जरिए दी गई गंभीर धमकी भी धारा 351 BNS के तहत अपराध बन सकती है, यदि उसका उद्देश्य डराना या दबाव बनाना हो।

3. अगर पुलिस धमकी की शिकायत पर FIR दर्ज न करे तो क्या करें?

पहले SHO को लिखित शिकायत दें, फिर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को भेजें। यदि फिर भी कार्रवाई न हो, तो आप मजिस्ट्रेट कोर्ट में क्रिमिनल शिकायत/आवेदन दायर कर सकते हैं और पुलिस जांच का आदेश मांग सकते हैं।

4. धारा 351 के झूठे केस में आरोपी खुद को कैसे बचाए?

आरोपी को पूरी चैट, कॉल रिकॉर्ड, गवाह, CCTV, और संदर्भ सुरक्षित रखना चाहिए। जरूरत पड़ने पर एंटीसिपेटरी बेल, लिखित प्रतिवेदन, और अनुभवी क्रिमिनल वकील की मदद से अपना कानूनी बचाव तुरंत शुरू करना चाहिए।

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