क्या बच्चे को अडॉप्ट करने पर भी मैटरनिटी लीव मिलती है? जानिए कानूनी नियम

Do you still get maternity leave after adopting a child Learn the legal rules.

आज के समय में परिवार बनाने के तरीके बदल रहे हैं। बहुत-सी महिलाएँ किसी कारणवश एडॉप्शन का रास्ता चुनती हैं। कई बार यह निर्णय भावनात्मक, सामाजिक और कानूनी रूप से बहुत महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जैसे ही कोई वर्किंग वूमेन बचे को अडॉप्ट करने का निर्णय लेती है, उसके मन में एक बहुत व्यावहारिक सवाल आता है – क्या अडॉप्ट करने वाली महिलाएँ को भी उतनी ही कानूनी सुरक्षा मिलती है, जितनी जन्म देने वाली मां को मिलती है?

भारत में माता-पिता बनने का सिर्फ एक पारंपरिक तरीका ही नहीं है। अब परिवार कई अलग-अलग तरीकों से बनते हैं, और कानून भी धीरे-धीरे इन बदलती परिस्थितियों को ज्यादा न्यायपूर्ण और संवेदनशील तरीके से समझने लगा है। जब कोई महिला किसी बच्चे की पूरी कानूनी और भावनात्मक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेती है, तो उस बच्चे की देखभाल, नए माहौल में सामंजस्य और मां-बच्चे के बीच जुड़ाव उतना ही जरूरी होता है। ऐसे में कामकाजी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण है।

इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला एक बड़ा और जरूरी कानूनी बदलाव लेकर आया है, जिसने कामकाजी महिलाओं के मैटरनिटी अधिकारों को लेकर कानून की सोच को और स्पष्ट और न्यायसंगत बनाया है।

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मैटरनिटी लीव कब मिलती है?

मैटरनिटी लीव उस समय दी जाती है जब एक महिला अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरे दौर में प्रवेश करती है, यानी जब वह किसी बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेती है और उसे अपने कार्यस्थल से कानूनी, भावनात्मक और शारीरिक सहयोग की जरूरत होती है।

आसान शब्दों में समझें तो, मैटरनिटी लीव सिर्फ ऑफिस से छुट्टी नहीं है। यह एक कानूनी अधिकार है, ताकि महिला बिना अपनी नौकरी, सैलरी या करियर की चिंता किए, बच्चे और अपनी नई जिम्मेदारियों पर ध्यान दे सके।

आमतौर पर लोग मैटरनिटी लीव को सिर्फ प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म से जोड़कर देखते हैं, क्योंकि उस समय महिला को डिलीवरी से पहले और बाद में आराम, इलाज, रिकवरी और नवजात बच्चे की देखभाल के लिए समय चाहिए होता है।

लेकिन भारतीय कानून में मैटरनिटी लीव का मतलब सिर्फ बच्चे को जन्म देना नहीं है। कानून यह भी मानता है कि जब कोई बच्चा किसी महिला की जिंदगी में एडॉप्शन या सरोगेसी के जरिए आता है, तब भी उतनी ही देखभाल, समय, जुड़ाव और जिम्मेदारी की जरूरत होती है।

आम तौर पर मैटरनिटी लीव इन स्थितियों में मिलती है:

  1. प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म के समय: जब महिला को डिलीवरी से पहले और बाद में छुट्टी की जरूरत होती है।
  2. बच्चा अडॉप्ट लेने के बाद: जब बच्चे का कानूनी हैंडओवर हो जाता है और मां को बच्चे के साथ समय बिताने, जुड़ाव बनाने और देखभाल करने की जरूरत होती है।
  3. सरोगेसी में बच्चा मिलने के बाद: जब कमीशनिंग मदर को बच्चे की पूरी जिम्मेदारी मिलती है और उसे भी बच्चे के साथ समय और देखभाल की जरूरत होती है।
  4. मैटरनिटी से जुड़ी अन्य कानूनी या मेडिकल स्थितियों में: जहां कानून महिला को विशेष सुरक्षा देता है।

महत्वपूर्ण बात: मैटरनिटी लीव को हमेशा एम्प्लॉयर की मेहरबानी नहीं, बल्कि महिला का कानूनी अधिकार समझना चाहिए।

बच्चे को अडॉप्ट करने पर मैटरनिटी लीव पर कौन सा कानून लागू होता है?

मैटरनिटी लीव पर मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 की धारा 5(4) और कोड ऑफ़ सोशल सिक्योरिटी एक्ट, 2020 की धारा 60 (4), यह दोनों कानून लागू होते थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने के हालिया महत्वपूर्ण निर्णय लिया कि यह कानून असंवैधानिक है। इन दोनों में यह प्रावधान था कि:

अडॉप्ट करने वाली महिला को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव तभी मिलेगी, जब वह 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को कानूनी रूप से गोद ले।

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पुराने कानून में समस्या क्या थी? 

यह शर्त व्यवहारिक रूप से सही नहीं थी, क्योंकि:

  • बहुत से बच्चों को 3 महीने के बाद कानूनी रूप से अडॉप्ट किया जाता है,
  • बच्चा चाहे 3 महीने से बड़ा हो, फिर भी उसकी देखभाल और मां-बच्चे का जुड़ाव उतना ही जरूरी होता है,
  • नए परिवार में आने के बाद बच्चे और मां दोनों को समय और सामंजस्य की जरूरत होती है,
  • कई बार थोड़ा बड़े बच्चे को नए घर और नए माहौल में ढलने के लिए और भी ज्यादा भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।

इसी वजह से इस 3 महीने वाली शर्त को गलत और अनुचित माना गया, और बाद में इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला (2026) – एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव

17 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हंसानंदिनी नंदूरी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया, 2026 के मामले में एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि गोद लेने वाली मां को सिर्फ इसलिए मैटरनिटी लीव से वंचित नहीं किया जा सकता कि बच्चा 3 महीने से ज्यादा उम्र का है।

यानी, बच्चे की उम्र के आधार पर मैटरनिटी लीव रोकना असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट ने कोड ऑफ़ सोशल सिक्योरिटी एक्ट, 2020 की धारा 60 (4), को इस हद तक गलत माना, जहाँ यह 3 महीने की उम्र की शर्त लगाती थी।

कोर्ट ने साफ कर दिया कि: अडॉप्ट करने वाली महिला को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलेगी, चाहे बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो या उससे बड़ा। यह लीव बच्चे के कानूनी हैंडओवर (सौंपे जाने) की तारीख से शुरू होगी।

यह फैसला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? 

यह फैसला पुराने कानून की सबसे अनुचित और भेदभावपूर्ण शर्त को हटा देता है। पहले कई महिलाओं को सिर्फ इसलिए मैटरनिटी लीव नहीं मिलती थी क्योंकि उन्होंने 3 महीने से ज्यादा उम्र के बच्चे को गोद लिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मां बनने का अधिकार और बच्चे की देखभाल की जरूरत सिर्फ बच्चे की उम्र से तय नहीं होती।

मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 की धारा 5(4) पर कानूनी प्रभाव 

व्यवहारिक और कानूनी रूप से इसका बहुत महत्वपूर्ण असर पड़ेगा। हाल की रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर कोड ऑफ़ सोशल सिक्योरिटी एक्ट, 2020 की धारा 60 (4) में मौजूद 3 महीने वाली शर्त को गलत माना है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यही भेदभावपूर्ण शर्त मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 की धारा 5(4) में भी थी।

यानी, इस धारा में भी पहले यह कहा गया था कि – अडॉप्ट करने वाली महिला को मैटरनिटी लीव तभी मिलेगी, जब गोद लिया गया बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो।

अब इस फैसले के बाद सही कानूनी स्थिति क्या मानी जाएगी?

3 महीने की उम्र वाली शर्त अब वैध नहीं मानी जानी चाहिए, और अडॉप्ट करने वाली महिला को बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, मैटरनिटी लीव दी जानी चाहिए, बशर्ते गोद लेना कानूनी और वैध हो, और बाकी जरूरी पात्रता शर्तें पूरी होती हों।

कौन-कौन से संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ?

1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार

  • अनुच्छेद 14 हर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार देता है। इसका मतलब है कि कानून किसी के साथ मनमाना, अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता।
  • सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सिर्फ बच्चे की उम्र के आधार पर अडॉप्ट करने वाली महिला को मैटरनिटी लीव से वंचित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण है।

2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 – जीवन और गरिमा का अधिकार

  • अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। इसमें सिर्फ जीवित रहना ही नहीं, बल्कि गरिमा, परिवारिक जीवन, मैटरनिटी का सम्मान, और अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लेने की स्वतंत्रता भी शामिल है।
  • कोर्ट ने माना कि मैटरनिटी केवल बच्चे को जन्म देने तक सीमित नहीं है। अगर कोई महिला कानूनी रूप से बच्चे को गोद लेकर उसकी पूरी जिम्मेदारी लेती है, तो उसे भी सम्मानजनक मैटरनिटी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
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क्या यह मैटरनिटी लीव पेड होती है?

यह मैटरनिटी बेनिफिट है, इसलिए सामान्य रूप से यह पेड लीव होती है, बशर्ते महिला कानून के अनुसार योग्य हो।

मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 के तहत मैटरनिटी बेनिफिट सिर्फ साधारण छुट्टी नहीं है।
यह एक कानूनी अधिकार है, जिसमें महिला को छुट्टी के साथ-साथ सैलरी की सुरक्षा भी मिलती है।

अगर महिला बाकी सभी जरूरी कानूनी शर्तें पूरी करती है,:

  • तो इस छुट्टी को अनपेड लीव नहीं माना जाना चाहिए,
  • एम्प्लॉयर महिला को मजबूर नहीं कर सकता कि वह पहले अपनी earned leave / casual leave इस्तेमाल करे, 
  • कानून के अनुसार छुट्टी के दौरान सैलरी मिलता रहना चाहिए।

क्या कानूनी तरीके से अडॉप्ट करना ज़रूरी है?

हाँ, बिल्कुल जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का लाभ उसी महिला को मिलेगा, जिसने बच्चे को कानूनी रूप से अडॉप्ट किया हो। यानी सिर्फ बच्चे की देखभाल करना या अपने पास रखना काफी नहीं है। अडॉप्ट करना कानून के अनुसार वैध होना चाहिए।

यह बात क्यों बहुत महत्वपूर्ण है?

मैटरनिटी लीव का यह लाभ तभी मिलेगा, जब एडॉप्शन सही कानूनी प्रक्रिया से हुआ हो। आम तौर पर गोद लेना इन कानूनों / प्रक्रियाओं के तहत वैध माना जाता है:

  • जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015
  • हिन्दू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956 (जहाँ लागू हो)
  • CARA (सेंट्रल एडॉप्शन रेगुलेटरी अथॉरिटी) के माध्यम से की गई मान्यता प्राप्त प्रक्रिया

किस स्तिथी में मैटरनिटी लीव नहीं मिलेगी? 

सिर्फ ये बातें अपने-आप में पर्याप्त नहीं मानी जाएंगी:

  • अगर बच्चा बिना कानूनी एडॉप्शन की प्रक्रिया के सिर्फ आपके साथ रह रहा है,
  • अगर बच्चे को निजी तरीके से या पारिवारिक सहमति से अपने पास रखा गया है, लेकिन सही कानूनी दस्तावेज नहीं हैं,
  • अगर आप केवल बच्चे के गार्डियन है, लेकिन आपने उसे कानूनी रूप से गोद नहीं लिया है,

यदि मैटरनिटी लीव देने से मना कर दिया जाए, तो कौन-से कानूनी उपाय उपलब्ध हैं?

1. कंपनी में लिखित शिकायत

सबसे पहले महिला को HR, रिपोर्टिंग मैनेजर, कम्प्लायंस टीम या सीनियर मैनेजमेंट को लिखित रूप में आवेदन देना चाहिए। इसमें साफ बताना चाहिए कि उसने बच्चे को कानूनी रूप से अडॉप्ट किया है और उसे कानून के अनुसार मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए।

2. वकील के माध्यम से लीगल नोटिस

अगर कंपनी लिखित शिकायत के बाद भी लीव नहीं देती, तो महिला वकील के जरिए लीगल नोटिस भेज सकती है। इस नोटिस में मैटरनिटी लीव मंजूर करने, वेतन सहित लाभ देने, गलत कार्रवाई रोकने और भेदभाव न करने की कानूनी मांग की जा सकती है।

3. लेबर विभाग या संबंधित प्राधिकरण में शिकायत

अगर एम्प्लायर कानून का पालन नहीं करता, तो महिला संबंधित लेबर विभाग, इंस्पेक्टर या सक्षम प्राधिकरण के पास शिकायत कर सकती है। यह कदम खासतौर पर तब उपयोगी होता है जब कंपनी लगातार मैटरनिटी बेनिफिट देने से मना कर रही हो।

4. हाई कोर्ट या सर्विस लॉ के तहत कानूनी कार्रवाई

अगर मामला सरकारी नौकरी, पब्लिक सेक्टर या किसी वैधानिक संस्था से जुड़ा है, तो महिला हाई कोर्ट में रिट पिटिशन दाखिल कर सकती है। जहां संवैधानिक अधिकारों, समानता या मातृत्व अधिकारों का उल्लंघन हो, वहां यह मजबूत कानूनी उपाय माना जाता है।

क्या इस दौरान महिला को टर्मिनेट किया जा सकता है?

नहीं, सामान्य रूप से ऐसा करना कानूनन गलत माना जा सकता है। मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य महिला कर्मचारी को मैटरनिटी के समय सुरक्षा देना है। इसलिए अगर महिला मैटरनिटी लीव मांगती है या लेती है, तो इस कारण उसके खिलाफ गलत कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

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उदाहरण के लिए, अगर एम्प्लायर महिला से जबरदस्ती इस्तीफा दिलवाए, नौकरी से निकाल दे, वेतन रोक दे, पद घटा दे, या सिर्फ मैटरनिटी लीव लेने की वजह से खराब प्रदर्शन रिपोर्ट दे, तो ऐसी कार्रवाई कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।

निष्कर्ष

भारत में अडॉप्ट करने वाली महिला की मैटरनिटी लीव को लेकर कानून में अब एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव आया है। पहले कानून में यह शर्त थी कि मैटरनिटी बेनिफिट तभी मिलेगा जब अडॉप्ट किया गया बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो। लेकिन 17 मार्च 2026 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले ने इस शर्त को असंवैधानिक मानते हुए साफ कर दिया कि सिर्फ बच्चे की उम्र 3 महीने से ज्यादा होने के आधार पर मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं किया जा सकता।

अब सही कानूनी स्थिति यह है कि अगर किसी महिला ने बच्चे को कानूनी रूप से अडॉप्ट किया है, तो उसे बच्चा सौंपे जाने की तारीख से 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए, बशर्ते बाकी कानूनी शर्तें पूरी हों। यह फैसला सिर्फ गोद लेने वाली माताओं के लिए राहत नहीं है, बल्कि यह भी दिखाता है कि मां बनने का मतलब सिर्फ जन्म देना नहीं, बल्कि देखभाल, जिम्मेदारी और सम्मान भी है।

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FAQs

1. क्या भारत में कोई प्राइवेट कंपनी कानूनी गोद लेने के बाद मैटरनिटी लीव देने से मना कर सकती है?

नहीं, अगर महिला कर्मचारी बाकी कानूनी शर्तें पूरी करती है और गोद लेना कानूनी रूप से वैध है, तो प्राइवेट कंपनी को मैटरनिटी लीव देने से मना नहीं करना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद सिर्फ इसलिए लीव रोकना कि बच्चा 3 महीने से बड़ा है, कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है।

2. गोद लेने वाली मां को मैटरनिटी लीव लेने के लिए नियोक्ता को कौन-कौन से दस्तावेज देने चाहिए?

गोद लेने वाली मां को आमतौर पर कानूनी एडॉप्शन आर्डर, बच्चा सौंपे जाने का प्रमाण, लीव एप्लीकेशन, पहचान पत्र, और मान्यता प्राप्त एडॉप्शन एजेंसी या अथॉरिटी के जरूरी दस्तावेज देने चाहिए, ताकि लीव में देरी या गलत तरीके से मना होने की संभावना कम हो।

3. क्या गोद लेने वाली मां की मैटरनिटी लीव पर सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू होगा?

हाँ, यह फैसला एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत तय करता है और कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है। इसलिए सरकारी विभाग, पब्लिक अथॉरिटी और सरकारी संस्थान भी इस फैसले का पालन करने के लिए बाध्य हैं और पुरानी असंवैधानिक उम्र-आधारित शर्त का सहारा नहीं ले सकते।

4. क्या एम्प्लायर अडॉप्ट करने वाली महिला को मैटरनिटी लीव की जगह अनपेड लीव लेने के लिए मजबूर कर सकता है?

नहीं, अगर महिला कानूनी रूप से मैटरनिटी बेनिफिट की हकदार है, तो एम्प्लायर उसे अनपेड लीव लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

5. अगर गोद लेने के बाद मैटरनिटी लीव गलत तरीके से मना कर दी जाए, तो क्या कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं?

अगर मैटरनिटी लीव गलत तरीके से मना की जाती है, तो महिला पहले HR को लिखित शिकायत दे सकती है। इसके बाद जरूरत होने पर लीगल नोटिस, लेबर अथॉरिटी में शिकायत, और गंभीर मामलों में हाई कोर्ट का सहारा भी लिया जा सकता है।

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