प्रॉपर्टी खरीदना, बेचना या उस पर निर्माण करवाना किसी भी व्यक्ति के लिए एक बड़ा आर्थिक फैसला होता है। इसलिए लोग अपने हितों की सुरक्षा के लिए लिखित एग्रीमेंट करते हैं। इसमें दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां और शर्तें साफ-साफ लिखी होती हैं। ऐसे एग्रीमेंट फ्लैट खरीदने, जमीन खरीदने, बिल्डिंग बनवाने, जॉइंट डेवलपमेंट या लीज से जुड़े हो सकते हैं।
लेकिन कई बार एग्रीमेंट साइन होने के बाद भी डिस्प्यूट हो जाता है। कई बार प्रॉपर्टी एग्रीमेंट पढ़ते समय लोगों को उसमें एक ऐसी शर्त मिलती है, जिसमें लिखा होता है कि एग्रीमेंट से जुड़ा कोई भी डिस्प्यूट होने पर मामला आर्बिट्रेशन में भेजा जाएगा। इस वजह से लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या वे सीधे सिविल कोर्ट जा सकते हैं या नहीं।
ऐसी स्थिति में क्या खरीदार सीधे सिविल कोर्ट में केस कर सकता है? या पहले उसे आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया अपनानी होगी?
इसका जवाब हर मामले में एक जैसा नहीं होता। एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन की शर्त होना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति के पास कानून के तहत मिलने वाले सभी दूसरे रास्ते बंद हो जाते हैं। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि डिस्प्यूट किस तरह का है और उस पर कौन-सा कानून लागू होता है।
प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज क्या होता है?
आर्बिट्रेशन क्लॉज एग्रीमेंट में लिखी गई एक ऐसी शर्त होती है, जिसमें दोनों पक्ष इस बात पर सहमत होते हैं कि एग्रीमेंट से जुड़े कुछ विवादों का फैसला सामान्य कोर्ट में केस चलाने के बजाय आर्बिट्रेशन के जरिए किया जाएगा।
आर्बिट्रेशन डिस्प्यूट सुलझाने का एक निजी तरीका है। इसमें एक स्वतंत्र व्यक्ति को नियुक्त किया जाता है, जिसे आर्बिट्रेटर कहते हैं। वह दोनों पक्षों की बात सुनता है और अपना फैसला देता है। इस फैसले को आर्बिट्रल अवॉर्ड कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में ऐसी शर्त लिखी हो सकती है: “इस एग्रीमेंट से जुड़े किसी भी डिस्प्यूट को आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 के तहत आर्बिट्रेशन के लिए भेजा जाएगा। आर्बिट्रेटर का फैसला दोनों पक्षों पर लागू होगा।”
इसका मतलब है कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि एग्रीमेंट में शामिल विवादों को कानून के अनुसार आर्बिट्रेशन के जरिए सुलझाया जाएगा।
प्रॉपर्टी से जुड़े इन एग्रीमेंट्स में आमतौर पर आर्बिट्रेशन क्लॉज होता है:
- प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने का एग्रीमेंट।
- बिल्डर और खरीदार के बीच एग्रीमेंट।
- डेवलपमेंट एग्रीमेंट।
- जमीन से जुड़े जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट।
- कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्ट।
- कमर्शियल प्रॉपर्टी का लीज एग्रीमेंट।
- जमीन के मालिक और डेवलपर के बीच एग्रीमेंट।
हालांकि, सिर्फ एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन शब्द लिख देने से यह जरूरी नहीं हो जाता कि हर तरह के डिस्प्यूट का फैसला आर्बिट्रेटर ही कर सकता है। कुछ डिस्प्यूट ऐसे भी होते हैं, जिनका फैसला कानून के अनुसार केवल कोर्ट या संबंधित अथॉरिटी ही कर सकती है।
आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 क्या कहता है?
भारत में आर्बिट्रेशन से जुड़े मामलों को मुख्य रूप से आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 के तहत देखा जाता है। अगर किसी प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज दिया गया है, तो इस कानून की कुछ धाराएं बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
धारा 7 – आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट
धारा 7 में बताया गया है कि आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट क्या होता है। इस धारा के तहत दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि उनके कानूनी संबंध से जुड़े सभी या कुछ विवादों का फैसला आर्बिट्रेशन के जरिए किया जाएगा। इसके लिए एग्रीमेंट का लिखित रूप में होना जरूरी है। आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट इन तरीकों से हो सकता है:
- दोनों पक्षों के साइन किया हुआ अलग एग्रीमेंट।
- मुख्य प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में शामिल आर्बिट्रेशन क्लॉज।
- दोनों पक्षों के बीच लिखित बातचीत या कम्युनिकेशन, जिसमें आर्बिट्रेशन के लिए सहमति दर्ज हो, जैसा कि धारा 7 में बताया गया है।
इसलिए, अगर प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में सही तरीके से आर्बिट्रेशन क्लॉज शामिल किया गया है और वह कानूनी रूप से वैध है, तो उस क्लॉज के दायरे में आने वाले विवादों के लिए दोनों पक्षों को आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया अपनानी पड़ सकती है।
धारा 8 – कोर्ट द्वारा डिस्प्यूट को आर्बिट्रेशन में भेजने का अधिकार
जब किसी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के बावजूद एक पक्ष सिविल कोर्ट में केस दायर कर देता है, तब धारा 8 महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर कोई पक्ष ऐसे डिस्प्यूट को लेकर कोर्ट जाता है, जो वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के दायरे में आता है, तो दूसरा पक्ष कोर्ट में आवेदन देकर मामले को आर्बिट्रेशन में भेजने की मांग कर सकता है।
आमतौर पर यह आवेदन डिस्प्यूट के मुख्य मुद्दों पर अपना पहला लिखित जवाब जमा करने की तारीख से पहले या उसी समय तक करना होता है। कोर्ट शुरुआती जांच में यह देखता है कि वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट मौजूद है या नहीं। अगर कोर्ट को लगता है कि ऐसा एग्रीमेंट मौजूद है, तो वह दोनों पक्षों को आर्बिट्रेशन के लिए भेज सकता है।
धारा 9 – कोर्ट से तुरंत सुरक्षा या राहत मांगना
कई लोगों को लगता है कि अगर एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज है, तो वे किसी भी स्थिति में कोर्ट नहीं जा सकते। लेकिन ऐसा नहीं है।
आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 9 के तहत कोई पक्ष आर्बिट्रेशन शुरू होने से पहले, प्रक्रिया के दौरान या कुछ परिस्थितियों में फैसला आने के बाद भी कोर्ट से अस्थायी सुरक्षा या राहत मांग सकता है। इसके लिए कानून में दी गई शर्तों को पूरा करना जरूरी है।
उदाहरण के लिए: अगर खरीदार को डर है कि आर्बिट्रेशन का मामला चलते समय बिल्डर डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी किसी दूसरे व्यक्ति को बेच देगा, तो खरीदार कोर्ट से तुरंत सुरक्षा मांग सकता है।
मामले की परिस्थितियों के अनुसार कोर्ट ये अंतरिम आदेश दे सकता है:
- डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी को बेचने या किसी दूसरे के नाम ट्रांसफर करने पर रोक लगाना।
- डिस्प्यूटेड प्रॉपर्टी से जुड़े ऐसे कामों पर रोक लगाना, जिनसे मामले पर असर पड़ सकता है।
- उचित मामले में रिसीवर नियुक्त करना।
- कानून के तहत मिलने वाली दूसरी अस्थायी राहत देना।
धारा 9 तब उपयोगी होती है, जब किसी पक्ष को तुरंत सुरक्षा की जरूरत हो और आर्बिट्रेशन का अंतिम फैसला आने तक इंतजार करने से उसे बड़ा नुकसान हो सकता हो।
धारा 16 – आर्बिट्रेटर का अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला लेने का अधिकार
धारा 16 के तहत आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को अपने अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवालों पर फैसला लेने का अधिकार दिया गया है। इसमें आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के मौजूद होने या उसकी वैधता पर उठाए गए सवाल भी शामिल हैं।
इसका मतलब है कि अगर कोई पक्ष यह कहता है कि आर्बिट्रेटर को किसी खास डिस्प्यूट का फैसला करने का अधिकार नहीं है, तो आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल इस आपत्ति की जांच कर सकता है और उस पर फैसला दे सकता है।
प्रॉपर्टी से जुड़े कौन-से डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में भेजे जा सकते हैं?
प्रॉपर्टी से जुड़े हर डिस्प्यूट का फैसला आर्बिट्रेशन में नहीं हो सकता। हालांकि, दो पक्षों के बीच एग्रीमेंट से जुड़े कई डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं। इसके कुछ उदाहरण हैं:
प्रॉपर्टी बेचने के एग्रीमेंट से जुड़े डिस्प्यूट अगर विक्रेता एग्रीमेंट करने के बाद प्रॉपर्टी बेचने से मना कर देता है, तो खरीदार आर्बिट्रेशन के जरिए एग्रीमेंट पूरा करवाने या दूसरी कानूनी राहत मांग सकता है।
बिल्डर और खरीदार के बीच डिस्प्यूट इन मामलों में आर्बिट्रेशन का सहारा लिया जा सकता है:
- फ्लैट का कब्जा देने में देरी।
- निर्माण पूरा न करना।
- एग्रीमेंट की शर्तों का पालन न करना।
- जमा की गई रकम वापस न करना।
- एग्रीमेंट तोड़ने पर मुआवजे की मांग।
हालांकि, खरीदार को रियल एस्टेट या कंज्यूमर कानून के तहत भी राहत मिल सकती है।
डेवलपमेंट एग्रीमेंट से जुड़े डिस्प्यूट अगर जमीन का मालिक और डेवलपर एग्रीमेंट की शर्तों को लेकर डिस्प्यूट में हैं, जैसे डेवलपर का तय फ्लैट न देना, तो वैध आर्बिट्रेशन क्लॉज होने पर मामला आर्बिट्रेशन में जा सकता है।
पेमेंट और एग्रीमेंट तोड़ने से जुड़े डिस्प्यूट बकाया किस्तों, निर्माण के खर्च, मुआवजे और दूसरी आर्थिक जिम्मेदारियों से जुड़े डिस्प्यूट भी आर्बिट्रेशन में भेजे जा सकते हैं, अगर वे आर्बिट्रेशन क्लॉज के दायरे में आते हैं।
ध्यान रखें: यह देखना जरूरी है कि डिस्प्यूट एग्रीमेंट से जुड़े अधिकारों का है या ऐसा मामला है, जिसका फैसला कानून के अनुसार केवल कोर्ट या सरकारी अथॉरिटी ही कर सकती है।
प्रॉपर्टी से जुड़े कौन-से डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में नहीं सुलझाए जा सकते?
प्रॉपर्टी से जुड़े कई एग्रीमेंट के डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं, लेकिन कुछ ऐसे मामले भी होते हैं जिनका फैसला आर्बिट्रेटर नहीं कर सकता।
ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ विवादों में उन लोगों के अधिकार भी शामिल होते हैं, जिन्होंने एग्रीमेंट पर साइन नहीं किया है। ऐसे मामलों में कोर्ट या संबंधित सरकारी अथॉरिटी का फैसला जरूरी हो सकता है। इसके कुछ उदाहरण हैं:
- तीसरे व्यक्ति के मालिकाना हक से जुड़े डिस्प्यूट अगर दो लोगों के बीच प्रॉपर्टी का एग्रीमेंट है, लेकिन कोई तीसरा व्यक्ति भी उसी प्रॉपर्टी पर अपना मालिकाना हक जताता है, तो डिस्प्यूट का फैसला कोर्ट को करना पड़ सकता है।
- मॉर्गेज से जुड़े कुछ डिस्प्यूट मॉर्गेज वाली प्रॉपर्टी को बेचकर कर्ज वसूलने या मॉर्गेज खत्म करने से जुड़े मामलों का फैसला आमतौर पर कोर्ट करता है।
- संयुक्त प्रॉपर्टी के बंटवारे से जुड़े डिस्प्यूट अगर प्रॉपर्टी के बंटवारे से ऐसे कई सह-मालिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, जो आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट का हिस्सा नहीं हैं, तो मामला कोर्ट में जा सकता है।
- रेंट कंट्रोल कानून से जुड़े डिस्प्यूट अगर विशेष रेंट कंट्रोल कानून के तहत किसी खास कोर्ट या अथॉरिटी को डिस्प्यूट सुलझाने का अधिकार दिया गया है, तो आर्बिट्रेशन क्लॉज के जरिए उस व्यवस्था से बचा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने विद्या डरोलिया बनाम दुर्गा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन मामले में इस बारे में स्पष्ट किया है।
- सरकारी अथॉरिटी के अधिकार वाले डिस्प्यूट अगर किसी विशेष कानून के तहत किसी सरकारी अथॉरिटी को डिस्प्यूट का फैसला करने का अधिकार दिया गया है, तो आर्बिट्रेशन क्लॉज उस अधिकार को अपने आप आर्बिट्रेटर को नहीं दे सकता।
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय
बूज़ एलन एंड हैमिल्टन इनकॉर्पोरेशन बनाम SBI होम फाइनेंस लिमिटेड (2011)
यह आर्बिट्रेशन से जुड़ा सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला है। इस मामले में सवाल था कि क्या मॉर्गेज वाली प्रॉपर्टी को बेचकर कर्ज वसूलने से जुड़े डिस्प्यूट को आर्बिट्रेशन में भेजा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि दो पक्षों के बीच एग्रीमेंट से जुड़े व्यक्तिगत अधिकारों के डिस्प्यूट (Rights in Personam) आमतौर पर आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं। लेकिन ऐसे अधिकार, जो पूरी दुनिया के खिलाफ लागू होते हैं (Rights in Rem), आमतौर पर कोर्ट या संबंधित ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रॉपर्टी बेचने के एग्रीमेंट को पूरा करवाने जैसे डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं। लेकिन मॉर्गेज वाली प्रॉपर्टी को बेचकर कर्ज वसूलने से जुड़े डिस्प्यूट आमतौर पर आर्बिट्रेशन में नहीं भेजे जा सकते।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है? इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि हर प्रॉपर्टी डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में नहीं सुलझाया जा सकता। यह देखना जरूरी है कि डिस्प्यूट किस तरह के अधिकार से जुड़ा है और कानून के अनुसार उसका फैसला कौन कर सकता है।
विद्या डरोलिया बनाम दुर्गा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन (2021)
यह प्रॉपर्टी और किराएदारी से जुड़े विवादों में आर्बिट्रेशन की सीमा तय करने वाला सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला है। इस मामले में सवाल था कि क्या मकान मालिक और किराएदार के बीच होने वाले डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रांफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 के तहत आने वाले सामान्य मकान मालिक-किराएदार डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं, बशर्ते दोनों पक्षों के बीच वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट हो।
लेकिन अगर डिस्प्यूट किसी विशेष रेंट कंट्रोल कानून के तहत आता है और उस कानून के अनुसार किसी खास कोर्ट या अथॉरिटी को फैसला करने का अधिकार दिया गया है, तो ऐसे डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में नहीं भेजे जा सकते।
कोर्ट ने यह भी बताया कि जिन विवादों में तीसरे व्यक्तियों के अधिकार प्रभावित होते हैं, सार्वजनिक या सरकारी अधिकारों का मामला होता है, या किसी कानून के तहत आर्बिट्रेशन पर रोक है, उन्हें आर्बिट्रेशन में नहीं सुलझाया जा सकता।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है? इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि सिर्फ एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने से हर डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में नहीं जाता। डिस्प्यूट की प्रकृति, लागू कानून और संबंधित कोर्ट या अथॉरिटी के अधिकार को देखना जरूरी है।
प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के बावजूद क्या आप कोर्ट जा सकते हैं?
हाँ, कुछ खास परिस्थितियों में आप कोर्ट जा सकते हैं।
एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने का मतलब यह नहीं है कि कोर्ट के अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट के तहत भी कोर्ट को आर्बिट्रेशन से जुड़े कुछ मामलों में फैसला लेने का अधिकार दिया गया है। आपको इन परिस्थितियों में कोर्ट या संबंधित अथॉरिटी के पास जाना पड़ सकता है:
- जब तुरंत सुरक्षा की जरूरत हो: धारा 9 के तहत प्रॉपर्टी को सुरक्षित रखने या उसे बेचे जाने से रोकने के लिए कोर्ट से अंतरिम राहत मांगी जा सकती है।
- जब डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन के दायरे में न आता हो: अगर कानून के अनुसार डिस्प्यूट का फैसला केवल कोर्ट या सरकारी अथॉरिटी कर सकती है, तो वहां केस किया जा सकता है।
- जब आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट वैध न हो: अगर वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट नहीं है या डिस्प्यूट उसकी शर्तों में शामिल नहीं है, तो कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
- जब विशेष कानून के तहत अलग उपाय उपलब्ध हो: अगर किसी कानून में विशेष कोर्ट या अथॉरिटी को डिस्प्यूट सुलझाने का अधिकार दिया गया है, तो उस कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि, अगर डिस्प्यूट वैध आर्बिट्रेशन क्लॉज के दायरे में आता है और आर्बिट्रेशन में सुलझाया जा सकता है, तो केवल अपनी पसंद के कारण सिविल कोर्ट में केस नहीं किया जा सकता।
आर्बिट्रेशन और कोर्ट प्रॉपर्टी डिस्प्यूट के लिए कौन-सा रास्ता बेहतर है?
इसका कोई एक जवाब नहीं है। आर्बिट्रेशन और कोर्ट, दोनों के अपने फायदे और कुछ सीमाएं हैं।
| आधार | आर्बिट्रेशन | कोर्ट |
| फैसला कौन करता है? | आर्बिट्रेटर या आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल | जज |
| प्रक्रिया | आमतौर पर ज्यादा आसान और लचीली | कोर्ट के तय नियमों के अनुसार |
| गोपनीयता | सुनवाई आमतौर पर निजी होती है | सुनवाई आमतौर पर सार्वजनिक होती है |
| समय | कुछ मामलों में जल्दी फैसला हो सकता है, लेकिन देरी भी हो सकती है | केस में काफी समय लग सकता है |
| खर्च | आर्बिट्रेटर और संस्थान की फीस देनी पड़ सकती है | कोर्ट फीस और केस का खर्च लगता है |
| फैसले को चुनौती | आर्बिट्रल अवॉर्ड को केवल कानून में दिए गए सीमित आधारों पर चुनौती दी जा सकती है | लागू कानून के अनुसार अपील की जा सकती है |
| किस तरह के मामले? | दो पक्षों के बीच कई तरह के एग्रीमेंट से जुड़े डिस्प्यूट | ऐसे डिस्प्यूट जो आर्बिट्रेशन में नहीं सुलझाए जा सकते या जिनका फैसला कोर्ट के अधिकार में है |
प्रॉपर्टी डिस्प्यूट शुरू करने से पहले आपको क्या करना चाहिए?
अगर आपका प्रॉपर्टी डिस्प्यूट है और एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज मौजूद है, तो बिना एग्रीमेंट को ठीक से समझे तुरंत केस फाइल न करें। इसके लिए ये जरूरी कदम उठाएं:
स्टेप 1: पूरा एग्रीमेंट ध्यान से पढ़ें
आर्बिट्रेशन क्लॉज को ध्यान से देखें। समझें कि इसमें कौन-से डिस्प्यूट शामिल हैं, आर्बिट्रेटर की नियुक्ति कैसे होगी और क्या किसी खास जगह या संस्था का नाम दिया गया है।
स्टेप 2: डिस्प्यूट की सही वजह समझें
देखें कि डिस्प्यूट पेमेंट, एग्रीमेंट तोड़ने, कब्जा देने में देरी, एग्रीमेंट पूरा करवाने, मालिकाना हक या प्रॉपर्टी के बंटवारे से जुड़ा है।
स्टेप 3: जांचें कि डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझ सकता है या नहीं
वकील की मदद से पता करें कि डिस्प्यूट केवल दोनों पक्षों के बीच एग्रीमेंट से जुड़े अधिकारों का है या इसमें किसी तीसरे व्यक्ति के अधिकार या सरकारी अथॉरिटी के अधिकार भी शामिल हैं।
स्टेप 4: जरूरत पड़ने पर लीगल नोटिस भेजें
लीगल नोटिस के जरिए दूसरे पक्ष को उसकी गलती बताई जा सकती है और एग्रीमेंट की शर्तें पूरी करने की मांग की जा सकती है। नोटिस भेजना जरूरी है या नहीं, यह एग्रीमेंट और लागू कानून पर निर्भर करता है।
स्टेप 5: तुरंत कानूनी सुरक्षा की जरूरत देखें
अगर डिस्प्यूट के दौरान प्रॉपर्टी बेचे जाने, ट्रांसफर होने या उसमें बदलाव किए जाने का खतरा है, तो धारा 9 के तहत कोर्ट से अंतरिम राहत लेने पर विचार करें।
स्टेप 6: सही कानूनी रास्ता चुनें
अगर डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाया जा सकता है, तो एग्रीमेंट और कानून के अनुसार आर्बिट्रेशन शुरू करें। अगर डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन के दायरे में नहीं आता या किसी विशेष कोर्ट या अथॉरिटी के अधिकार में है, तो वहां कानूनी कार्रवाई करें।
किसी भी कानूनी सहायता के लिए लीड इंडिया से संपर्क करें। हमारे पास लीगल एक्सपर्ट की पूरी टीम है, जो आपकी हर संभव सहायता करेगी।
FAQs
Q1. अगर मेरे प्रॉपर्टी एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन क्लॉज है, तो क्या मैं सिविल कोर्ट में केस कर सकता हूं?
हां, कानून में दी गई कुछ परिस्थितियों में आप कोर्ट जा सकते हैं। लेकिन अगर डिस्प्यूट वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के दायरे में आता है और आर्बिट्रेशन में सुलझाया जा सकता है, तो दूसरा पक्ष आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 8 के तहत मामले को आर्बिट्रेशन में भेजने की मांग कर सकता है।
Q2. क्या बिल्डर और खरीदार के बीच डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में भेजा जा सकता है?
बिल्डर और खरीदार के बीच एग्रीमेंट से जुड़े कुछ डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं। हालांकि, खरीदार को RERA और कंज्यूमर प्रोटेक्शन कानून के तहत भी राहत मिल सकती है। इन कानूनी उपायों पर आर्बिट्रेशन क्लॉज का क्या असर होगा, यह अलग से देखना जरूरी है।
Q3. क्या आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के बावजूद मैं कोर्ट से रोक लगाने का आदेश मांग सकता हूं?
हां। आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 9 के तहत दोनों पक्ष कानून की शर्तों के अनुसार कोर्ट से अंतरिम राहत मांग सकते हैं।
Q4. क्या आर्बिट्रेटर प्रॉपर्टी के मालिकाना हक का फैसला कर सकता है?
आर्बिट्रेटर दोनों पक्षों के बीच प्रॉपर्टी से जुड़े कुछ एग्रीमेंट विवादों का फैसला कर सकता है। लेकिन अगर डिस्प्यूट में पूरी दुनिया के खिलाफ लागू होने वाले मालिकाना हक या किसी तीसरे व्यक्ति के अधिकार शामिल हैं, तो ऐसा मामला आर्बिट्रेशन में नहीं सुलझाया जा सकता।
Q5. क्या मकान मालिक और किराएदार के सभी डिस्प्यूट आर्बिट्रेशन में जाते हैं?
नहीं। ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत आने वाले सामान्य डिस्प्यूट वैध आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट होने पर आर्बिट्रेशन में सुलझाए जा सकते हैं। लेकिन विशेष रेंट कंट्रोल कानून के तहत आने वाले विवादों का फैसला संबंधित कोर्ट या अथॉरिटी ही कर सकती है।
Q6. क्या आर्बिट्रेशन का फैसला अंतिम और दोनों पक्षों पर लागू होता है?
हां। आर्बिट्रल अवॉर्ड दोनों पक्षों पर लागू होता है। हालांकि, आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 34 के तहत इसे कानून में दिए गए सीमित आधारों पर चुनौती दी जा सकती है। यह सामान्य अपील की तरह नहीं होती, जिसमें पूरे मामले पर दोबारा सुनवाई की जाती है।


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