डाइवोर्स के बाद बच्चे की कस्टडी – माता या पिता के लिए कानूनी अधिकार

Child Custody After Divorce – Legal Rights for a Parent

तलाक होने के बाद पति-पत्नी का वैवाहिक संबंध समाप्त हो सकता है, लेकिन माता-पिता की जिम्मेदारियां समाप्त नहीं होतीं। तलाक के बाद भी बच्चे की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की रहती है। जब बच्चे की कस्टडी को लेकर विवाद होता है, तो अदालत यह नहीं देखती कि मां या पिता में से कौन बेहतर है, बल्कि यह देखती है कि बच्चे के हित और भविष्य के लिए कौन-सी व्यवस्था सबसे उचित होगी।

चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामले भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील होते हैं, क्योंकि इनमें केवल कानूनी अधिकार ही नहीं बल्कि माता-पिता और बच्चे के रिश्ते भी जुड़े होते हैं। इसलिए अदालत ऐसे मामलों में बहुत सावधानी से निर्णय लेती है।

अदालत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे को ऐसा सुरक्षित और अच्छा माहौल मिले, जहां उसका शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक विकास सही तरीके से हो सके।

यदि माता-पिता को चाइल्ड कस्टडी से जुड़े कानून और अपने अधिकारों की सही जानकारी हो, तो वे बेहतर निर्णय ले सकते हैं और अनावश्यक विवादों से बच सकते हैं।

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चाइल्ड कस्टडी क्या होती है?

चाइल्ड कस्टडी का मतलब बच्चे की देखभाल, परवरिश और उसके भविष्य से जुड़े फैसले लेने का कानूनी अधिकार होता है। तलाक या अलगाव के बाद यदि माता-पिता के बीच विवाद हो,:

  • तो अदालत यह तय करती है कि बच्चा किसके साथ रहेगा।
  • बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले कौन लेगा।
  • दूसरे माता-पिता को बच्चे से मिलने (Visitation Rights) का कितना और किस प्रकार का अधिकार मिलेगा।

चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामलों में अदालत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चे के हित और उसके बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करना होता है।

भारत में चाइल्ड कस्टडी से जुड़े कानून

  • भारत में चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामलों का मुख्य कानून गार्डियन एंड वार्डस एक्ट, 1890 है। यह कानून अदालत को यह तय करने का अधिकार देता है कि बच्चे के हित में कस्टडी किसे दी जानी चाहिए।
  • इसके अलावा, धर्म के आधार पर कुछ अन्य कानून भी लागू हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदू परिवारों में हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 भी लागू होता है।
  • हालांकि, चाहे कोई भी कानून लागू हो, अदालत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य हमेशा बच्चे के हित, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लेना होता है।

चाइल्ड कस्टडी के प्रकार

  • फिजिकल कस्टडी फिजिकल कस्टडी में बच्चा मुख्य रूप से एक माता-पिता के साथ रहता है और उसकी रोजमर्रा की देखभाल वही करता है। दूसरे माता-पिता को आमतौर पर बच्चे से मिलने, समय बिताने या निर्धारित समय पर मुलाकात करने का अधिकार दिया जाता है।
  • जॉइंट कस्टडी जॉइंट कस्टडी में दोनों माता-पिता बच्चे की परवरिश और देखभाल की जिम्मेदारी साझा करते हैं। अदालत द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार बच्चा दोनों के साथ समय बिता सकता है ताकि उसे दोनों माता-पिता का प्यार और सहयोग मिल सके।
  • लीगल कस्टडी लीगल कस्टडी में किसी एक माता-पिता या दोनों को बच्चे की पढ़ाई, इलाज, धार्मिक शिक्षा और भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार दिया जाता है। यह कस्टडी बच्चे के जीवन से जुड़े बड़े निर्णयों पर केंद्रित होती है।
  • थर्ड-पार्टी कस्टडी कुछ विशेष परिस्थितियों में, जब माता-पिता बच्चे की उचित देखभाल करने में सक्षम नहीं होते, तब अदालत बच्चे की कस्टडी दादा-दादी, अन्य रिश्तेदार या किसी उपयुक्त अभिभावक को दे सकती है, यदि यह बच्चे के हित में हो।

चाइल्ड कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत

भारत में चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामलों में अदालत हमेशा एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत को मानती है The welfare of the child is paramount.” (बच्चे के लिए क्या सबसे अच्छा है।)

  • इसका मतलब है कि बच्चे का हित माता-पिता के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
  • अदालत यह नहीं देखती कि मां या पिता में से कौन जीत रहा है, बल्कि यह देखती है कि बच्चे के लिए क्या बेहतर है।
  • बच्चे की मानसिक, भावनात्मक, शैक्षणिक और शारीरिक भलाई को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है।
  • केवल आर्थिक रूप से सक्षम होना ही कस्टडी पाने का आधार नहीं होता, बल्कि बच्चे को प्यार, देखभाल और सुरक्षित वातावरण मिलना भी जरूरी है।

महत्वपूर्ण फैसला – गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल, 2009

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चाइल्ड कस्टडी के मामलों में माता-पिता के कानूनी अधिकार सबसे महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि बच्चे का कल्याण और उसका बेहतर भविष्य सर्वोपरि होता है। कोर्ट ने कहा कि कस्टडी तय करते समय बच्चे की खुशी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह फैसला आज भी चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में माना जाता है और अदालतें इसी आधार पर निर्णय देती हैं।

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क्या कानून हमेशा मां को ही बच्चे की कस्टडी देता है?

आज के समय में अदालत केवल इस आधार पर बच्चे की कस्टडी मां को नहीं देती कि वह मां है। अदालत हर मामले की परिस्थितियों को देखकर यह तय करती है कि बच्चे के हित में क्या बेहतर है।

हालांकि, यदि बच्चा बहुत छोटा है, विशेष रूप से 5 वर्ष से कम उम्र का है, तो सामान्य रूप से अदालत यह मानती है कि बच्चे की देखभाल के लिए मां अधिक उपयुक्त हो सकती है। इसलिए ऐसे मामलों में अक्सर बच्चे की कस्टडी मां को दी जाती है। लेकिन यह कोई कठोर नियम नहीं है। यदि परिस्थितियां अलग हों और बच्चे के हित में कुछ और बेहतर हो, तो अदालत पिता या किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति को भी कस्टडी दे सकती है।

इस संबंध में हिन्दू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 में भी यह कहा गया है कि सामान्य रूप से 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी मां के पास रहना बेहतर माना जाता है। फिर भी, हर मामले में अदालत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चे का हित, सुरक्षा और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना होता है।

बच्चे की कस्टडी तय करते समय अदालत किन बातों पर विचार करती है?

1. बच्चे की उम्र (Age of the Child) अदालत बच्चे की उम्र को महत्वपूर्ण मानती है। बहुत छोटे बच्चों को अक्सर मां की देखभाल की अधिक आवश्यकता होती है, जबकि बड़े बच्चों के मामले में अन्य परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया जाता है।

2. बच्चे की इच्छा (Wishes of the Child) यदि बच्चा पर्याप्त समझ और परिपक्वता रखता है, तो अदालत उसकी राय भी सुन सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय हमेशा बच्चे के हित को ध्यान में रखकर लिया जाता है।

3. शिक्षा की आवश्यकता (Educational Needs) अदालत यह देखती है कि कौन-सा माता-पिता बच्चे की पढ़ाई, स्कूलिंग और शैक्षणिक विकास के लिए अधिक स्थिर और बेहतर वातावरण उपलब्ध करा सकता है।

4. माता-पिता के साथ भावनात्मक जुड़ाव (Emotional Bond with Parents) बच्चे का किस माता-पिता के साथ अधिक भावनात्मक लगाव है और किसके साथ वह सुरक्षित एवं सहज महसूस करता है, यह भी महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

5. स्वास्थ्य और सुरक्षा (Health and Safety Concerns) अदालत यह सुनिश्चित करती है कि बच्चे को सुरक्षित वातावरण मिले। बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाता है।

6. आर्थिक क्षमता (Financial Capacity) माता-पिता की आर्थिक स्थिति पर भी विचार किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक जरूरतें पूरी हो सकें।

7. नैतिक और सामाजिक वातावरण (Moral and Social Environment) अदालत यह देखती है कि बच्चे को किस घर में बेहतर संस्कार, सामाजिक वातावरण और स्वस्थ जीवनशैली मिल सकती है, जिससे उसका समग्र विकास हो सके।

8. माता-पिता का व्यवहार (Parental Conduct) माता-पिता का व्यवहार, जिम्मेदारी निभाने की क्षमता और बच्चे के प्रति उनका रवैया भी महत्वपूर्ण होता है। अदालत यह देखती है कि कौन बच्चे के सर्वोत्तम हित में कार्य कर सकता है।

विज़िटेशन राइट्स क्या होते हैं?

जब बच्चे की कस्टडी एक माता-पिता को दी जाती है, तब दूसरे माता-पिता को बच्चे से मिलने और उसके साथ समय बिताने का अधिकार दिया जा सकता है। इसे विज़िटेशन राइट्स कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे का दोनों माता-पिता के साथ भावनात्मक रिश्ता बना रहे।

विज़िटेशन राइट्स के सामान्य प्रकार

  • वीकेंड मुलाकात – माता-पिता सप्ताहांत में बच्चे से मिल सकते हैं।
  • छुट्टियों में मुलाकात – स्कूल की छुट्टियों या त्योहारों के दौरान बच्चे के साथ समय बिताने की अनुमति मिल सकती है।
  • वैकेशन एक्सेस – गर्मी या अन्य लंबी छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए बच्चा दूसरे माता-पिता के साथ रह सकता है।
  • वीडियो कॉल – बच्चे से वीडियो कॉल के माध्यम से नियमित बातचीत की जा सकती है।
  • फोन पर बातचीत – माता-पिता बच्चे से फोन पर संपर्क बनाए रख सकते हैं।

क्या विज़िटेशन राइट्स से इंकार किया जा सकता है?

सामान्य रूप से अदालत बच्चे और दोनों माता-पिता के बीच संपर्क बनाए रखने को प्रोत्साहित करती है। हालांकि, यदि अदालत को लगता है कि किसी माता-पिता से मिलने से बच्चे की सुरक्षा, स्वास्थ्य या भलाई पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है, तो विशेष परिस्थितियों में विज़िटेशन राइट्स सीमित या अस्वीकार किए जा सकते हैं।

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अदालत का मुख्य उद्देश्य हमेशा बच्चे के सर्वोत्तम हित और उसके खुशहाल भविष्य को सुरक्षित रखना होता है।

यदि कोई माता-पिता कस्टडी ऑर्डर का पालन नहीं करता तो क्या होता है?

यदि किसी माता-पिता द्वारा अदालत के कस्टडी ऑर्डर या विज़िटेशन ऑर्डर का पालन नहीं किया जाता, तो प्रभावित माता-पिता फैमिली कोर्ट में दावा कर सकते है और अदालत से आदेश को लागू कराने की मांग कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि एक माता-पिता बच्चे से मिलने नहीं दे रहा है, विज़िटेशन राइट्स में बाधा डाल रहा है, या अदालत के आदेश के विपरीत बच्चे को अपने पास रख रहा है, तो दूसरा माता-पिता अदालत में शिकायत कर सकता है।

ऐसी स्थिति में अदालत मामले की सुनवाई करके संबंधित पक्ष को आदेश का पालन करने का निर्देश दे सकती है। गंभीर मामलों में अदालत कस्टडी व्यवस्था में बदलाव करने, अतिरिक्त निर्देश जारी करने या अन्य उचित कानूनी कदम उठाने पर भी विचार कर सकती है।

अदालत का मुख्य उद्देश्य हमेशा बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना होता है कि दोनों माता-पिता अदालत के आदेशों का सम्मान करें।

क्या कस्टडी आर्डर को बाद में बदला जा सकता है?

बच्चे की कस्टडी से जुड़ा अदालत का आदेश हमेशा स्थायी नहीं होता। यदि समय के साथ परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव आता है और वह बदलाव बच्चे के हित को प्रभावित करता है, तो कोई भी पक्ष फैमिली कोर्ट में कस्टडी ऑर्डर में बदलाव की मांग कर सकता है।

अदालत हर मामले में यह देखती है कि कस्टडी में बदलाव करना बच्चे के सर्वोत्तम हित में है या नहीं। यदि अदालत को लगता है कि नई परिस्थितियों में बच्चे की भलाई के लिए कस्टडी व्यवस्था बदलना आवश्यक है, तो वह पहले दिए गए आदेश में संशोधन कर सकती है।

किन परिस्थितियों में कस्टडी बदलने की मांग की जा सकती है?

  • माता-पिता का दूसरे शहर या देश में जाना यदि कस्टडी रखने वाला माता-पिता किसी दूसरे शहर या देश में शिफ्ट हो जाता है और इसका प्रभाव बच्चे की पढ़ाई, देखभाल या दूसरे माता-पिता से मिलने के अधिकार पर पड़ता है, तो अदालत कस्टडी व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।
  • बच्चे की शिक्षा से जुड़ी जरूरतें यदि बच्चे की पढ़ाई और भविष्य के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण की आवश्यकता हो, तो अदालत नई परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कस्टडी में बदलाव कर सकती है।
  • बच्चे की सुरक्षा या भलाई से जुड़ी चिंता यदि बच्चे की सुरक्षा, स्वास्थ्य या मानसिक विकास को लेकर गंभीर चिंता हो, तो अदालत बच्चे के हित में कस्टडी बदलने पर विचार कर सकती है।
  • बच्चे की उचित देखभाल न होना यदि यह साबित हो जाए कि बच्चे की सही देखभाल नहीं हो रही है या उसकी आवश्यक जरूरतों की अनदेखी की जा रही है, तो अदालत कस्टडी बदल सकती है।
  • आर्थिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव यदि किसी माता-पिता की आर्थिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आ गया हो और उसका असर बच्चे की परवरिश पर पड़ रहा हो, तो यह भी अदालत के विचार का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। कस्टडी से जुड़े हर मामले में अदालत का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चे की खुशहाली, सुरक्षा और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना होता है।

चाइल्ड मेंटेनेंस की जिम्मेदारी किसकी होती है?

बच्चे का खर्च उठाने की जिम्मेदारी केवल एक माता-पिता की नहीं होती। कानून के अनुसार, बच्चे की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक जरूरतों का ध्यान रखना दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी है। यदि माता-पिता अलग रह रहे हैं या उनका डाइवोर्स हो चुका है, तो अदालत मामले की परिस्थितियों को देखते हुए एक या दोनों माता-पिता को बच्चे के खर्च में योगदान देने का निर्देश दे सकती है। अदालत आमतौर पर निम्न बातों पर विचार करती है:

  • माता-पिता की आय और आर्थिक स्थिति
  • बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक जरूरतें
  • बच्चे का जीवन स्तर और भविष्य की आवश्यकताएं
  • प्रत्येक माता-पिता की जिम्मेदारियां और परिस्थितियां

बच्चे के खर्च का निर्धारण करते समय अदालत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चे की जरूरतें पूरी हों और उसके विकास पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

क्या बच्चे को विदेश ले जाने के लिए अनुमति जरूरी है?

सामान्य रूप से, यदि बच्चे की कस्टडी, गार्जियनशिप या विज़िटेशन से जुड़ा मामला अदालत में लंबित है या अदालत द्वारा कोई कस्टडी ऑर्डर पारित किया जा चुका है, तो एक माता-पिता द्वारा बच्चे को दूसरे माता-पिता की सहमति के बिना विदेश ले जाना कानूनी विवाद पैदा कर सकता है।

भारत में ऐसे मामलों पर मुख्य रूप से गार्डियन एंड वार्डस एक्ट, 1890 और संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के सिद्धांत लागू होते हैं। अदालत हमेशा यह देखती है कि बच्चे को विदेश ले जाना उसके सर्वोत्तम हित (Welfare of the Child) में है या नहीं।

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यदि किसी कस्टडी ऑर्डर में यात्रा पर प्रतिबंध है या बच्चे को विदेश ले जाने से दूसरे माता-पिता के मिलने के अधिकार (Visitation Rights) प्रभावित होते हैं, तो अदालत की अनुमति लेना आवश्यक हो सकता है। बिना अनुमति बच्चे को विदेश ले जाने पर दूसरा माता-पिता अदालत से हस्तक्षेप की मांग कर सकता है।

महत्वपूर्ण निर्णय

नित्या आनंद राघवन बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) 2017 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे को विदेश ले जाने या वापस लाने से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात बच्चे का सर्वोत्तम हित (Welfare of the Child) है। केवल माता-पिता के अधिकारों के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता।

यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य, 2020 सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बच्चे का दोनों माता-पिता से संपर्क बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यदि बच्चा विदेश में रह रहा हो, तब भी दूसरे माता-पिता के मिलने और संपर्क के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।

व्यावहारिक रूप से क्या करना चाहिए? 

यदि आप बच्चे को विदेश ले जाना चाहते हैं, तो निम्न कदम सुरक्षित माने जाते हैं:

  • दूसरे माता-पिता की लिखित सहमति प्राप्त करें।
  • यदि कस्टडी डिस्प्यूट चल रहा है, तो फैमिली कोर्ट से अनुमति लें।
  • यात्रा का उद्देश्य, अवधि और बच्चे की वापसी की योजना स्पष्ट रखें।
  • अदालत के किसी मौजूदा कस्टडी या विज़िटेशन ऑर्डर का उल्लंघन न करें।

अदालत ऐसे मामलों में हमेशा यह देखती है कि बच्चे को विदेश ले जाने से उसकी शिक्षा, सुरक्षा, भावनात्मक विकास और दूसरे माता-पिता से उसके संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। बच्चे का हित ही सबसे महत्वपूर्ण विचार होता है।

माता-पिता के लिए Dos & Don’ts

क्या करें

  • बच्चे के हित को प्राथमिकता दें
  • सभी दस्तावेज सुरक्षित रखें
  • अदालत के आदेशों का पालन करें
  • कानूनी सलाह लें

क्या न करें

  • बच्चे को विवाद में न घसीटें
  • झूठे आरोप न लगाएँ
  • विजिटेशन अधिकार न रोकें
  • भावनात्मक दबाव न बनाएं

निष्कर्ष

डाइवोर्स के बाद बच्चे की कस्टडी का फैसला केवल माता या पिता के अधिकारों के आधार पर नहीं होता, बल्कि बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of Child) के आधार पर किया जाता है। अदालत बच्चे की आयु, उसकी इच्छा, माता-पिता की आर्थिक और मानसिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करती है। इसलिए यह मान लेना कि हमेशा माता को या हमेशा पिता को कस्टडी मिलेगी, सही नहीं है।

यदि आप कस्टडी विवाद का सामना कर रहे हैं, तो समय पर कानूनी सलाह लेना, सही दस्तावेज तैयार रखना और बच्चे के हितों को प्राथमिकता देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उचित कानूनी रणनीति, मजबूत साक्ष्य और फैमिली कोर्ट की प्रक्रिया का सही पालन करके माता या पिता दोनों अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं और बच्चे के लिए सुरक्षित तथा स्थिर भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।

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FAQs

Q1. भारत में डाइवोर्स के बाद बच्चे की कस्टडी कैसे तय की जाती है?

अदालत बच्चे की कस्टडी तय करते समय सबसे पहले बच्चे के हित और भलाई को देखती है। बच्चे की उम्र, पढ़ाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, भावनात्मक जुड़ाव और बेहतर भविष्य जैसी बातों को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाता है।

Q2. क्या डाइवोर्स के बाद पिता को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है?

हाँ। यदि अदालत को लगता है कि बच्चे का हित और बेहतर देखभाल पिता के साथ रहने में है, तो पिता को भी बच्चे की कस्टडी दी जा सकती है।

Q3. डाइवोर्स के बाद बच्चे की कस्टडी के मामले में मां के क्या अधिकार होते हैं?

मां बच्चे की कस्टडी, मिलने के अधिकार (Visitation Rights) और बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य तथा परवरिश से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में भाग लेने का अधिकार रखती है।

Q4. क्या डाइवोर्स के बाद बच्चे की कस्टडी का आदेश बदला जा सकता है?

हाँ। यदि बाद में परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आ जाए और उसका असर बच्चे की भलाई पर पड़ रहा हो, तो कोई भी माता-पिता अदालत से कस्टडी आदेश में बदलाव की मांग कर सकता है।

Q5. क्या दादा-दादी बच्चे की कस्टडी या मिलने का अधिकार मांग सकते हैं?

हाँ। विशेष परिस्थितियों में दादा-दादी भी अदालत में आवेदन कर सकते हैं। यदि अदालत को लगता है कि यह बच्चे के हित में है, तो उन्हें बच्चे से मिलने या कस्टडी से जुड़े अधिकार दिए जा सकते हैं।

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