आज के समय में कई बालिग पुरुष और महिलाएं बिना शादी किए अपनी सहमति से एक साथ रहते हैं। ऐसे रिलेशनशिप को लिव-इन रिलेशनशिप कहा जाता है। इसमें दोनों लोग साथ रहते हैं और अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेते हैं।
लेकिन अगर इस रिलेशनशिप में महिला को मारपीट, धमकी, मानसिक परेशानी, आर्थिक समस्या या घर से निकालने जैसी स्थिति का सामना करना पड़े, तो उसके मन में यह सवाल आता है कि क्या कानून उसे कोई सुरक्षा देता है? इसका जवाब है, हां, कुछ परिस्थितियों में महिला को कानून के तहत सुरक्षा, रहने का अधिकार और आर्थिक सहायता जैसी राहत मिल सकती है।
भारत में लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी स्तिथि
भारतीय कानून दो बालिग व्यक्तियों को अपनी इच्छा और सहमति से साथ रहने के निर्णय का सम्मान करता है। केवल इसलिए कि कोई पुरुष और महिला बिना विवाह के साथ रह रहे हैं, उनके रिलेशनशिप को अपने-आप अपराध नहीं माना जा सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सर्वोच्च कोर्ट ने भी कई मामलों में वयस्क व्यक्ति की पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकार किया है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए।
लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी रूप से स्वीकार होना और उसे विवाह के समान मानना अलग-अलग बातें हैं।
हर लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह नहीं माना जाता। इसलिए महिला को पति की पत्नी के समान सभी अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होते। फिर भी, कुछ परिस्थितियों में कानून महिला को विशेष संरक्षण देता है।
किन लिव-इन रिलेशनशिप को कानून में विशेष माना जाता है?
हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी जैसा नहीं माना जाता। लेकिन अगर पुरुष और महिला लंबे समय से एक साथ रह रहे हैं और उनका जीवन पति-पत्नी जैसा है, तो कुछ मामलों में कानून उन्हें शादी जैसी प्रकृति वाले रिलेशनशिप के रूप में देख सकता है।
ऐसा रिलेशनशिप था या नहीं, यह तय करते समय कोर्ट कई बातों को देख सकता है, जैसे—
- दोनों कितने समय से साथ रह रहे थे।
- क्या दोनों एक ही घर में रहते थे।
- क्या वे घर के खर्च और जिम्मेदारियां साथ निभाते थे।
- क्या दोनों एक-दूसरे की आर्थिक मदद करते थे।
- क्या परिवार या समाज में उन्हें पति-पत्नी की तरह माना जाता था।
- क्या उनके बच्चे हैं।
- क्या दोनों का साथ रहने का उद्देश्य लंबे समय तक परिवार की तरह रहना था।
इसलिए केवल कुछ समय तक साथ रहने से हर रिलेशनशिप को शादी जैसा नहीं माना जाएगा। कोर्ट पूरे मामले की परिस्थितियों को देखकर तय करता है कि महिला को कानून के तहत कौन-सी राहत दी जा सकती है।
घरेलू हिंसा से महिला को क्या संरक्षण मिल सकता है?
यदि लिव-इन रिलेशनशिप आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा करता है, तो महिला घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राहत मांग सकती है। घरेलू हिंसा केवल मारपीट तक सीमित नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार इसमें—
- शारीरिक हिंसा
- मानसिक उत्पीड़न
- मौखिक अपमान
- धमकी
- आर्थिक उत्पीड़न
- जबरदस्ती
- लगातार अपमानजनक व्यवहार
जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं। यदि पुरुष महिला को मारता है, लगातार धमकाता है, उसके आवश्यक खर्च रोकता है या उसे डराकर नियंत्रित करता है, तो महिला उपलब्ध कानूनी सुरक्षा का सहारा ले सकती है।
घरेलू हिंसा होने पर प्रोटेक्शन आर्डर
यदि महिला को पार्टनर से हिंसा या गंभीर धमकी का सामना करना पड़ रहा है, तो वह सक्षम कोर्ट के सामने आवेदन कर सकती है। कोर्ट परिस्थितियों के अनुसार प्रोटेक्शन आर्डर जारी कर सकता है। इसका उद्देश्य महिला को आगे होने वाली हिंसा या उत्पीड़न से बचाना होता है। परिस्थितियों के अनुसार पार्टनर को—
- हिंसा करने
- धमकी देने
- महिला को परेशान करने
- उसके कार्यस्थल या निवास पर जाकर उत्पीड़न करने से रोका जा सकता है।
यदि कोर्ट के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया जाता है, तो उसके विरुद्ध आगे कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
क्या महिला को शेयर्ड हाउसहोल्ड में रहने का अधिकार मिल सकता है?
यह लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि महिला और उसका पार्टनर किसी ऐसे घर में घरेलू जीवन जी रहे थे जिसे कानून के अनुसार शेयर्ड हाउसहोल्ड माना जा सकता है, तो महिला कुछ परिस्थितियों में निवास संबंधी राहत मांग सकती है। लेकिन यहां यह अंतर समझना जरूरी है— घर में रहने का अधिकार और घर का मालिक बनने का अधिकार अलग-अलग हैं।
यदि मकान पुरुष के नाम है, तो केवल लिव-इन रिलेशनशिप के कारण महिला उसकी मालिक नहीं बन जाती। लेकिन यदि रिलेशनशिप घरेलू हिंसा कानून के अंतर्गत आता है, तो महिला अपने निवास की सुरक्षा के लिए उचित राहत मांग सकती है। कोर्ट परिस्थितियों के अनुसार उसी घर में रहने या वैकल्पिक आवास जैसी राहत पर विचार कर सकता है।
क्या महिला मेंटेनेंस मांग सकती है?
लिव-इन रिलेशनशिप में महिला को हर परिस्थिति में स्वतः भरण-पोषण नहीं मिलता। लेकिन कुछ परिस्थितियों में वह आर्थिक सहायता या भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
विशेष रूप से घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आर्थिक राहत का प्रावधान है। कोर्ट सामान्यतः मामले की वास्तविक परिस्थितियों को देख सकता है, जैसे—
- महिला की आर्थिक स्थिति
- पुरुष की आय
- रिलेशनशिप की प्रकृति
- रिलेशनशिप की अवधि
- महिला की आवश्यकताएं
- बच्चों की जिम्मेदारी
- दोनों पक्षों की आर्थिक परिस्थितियां।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर लिव-इन रिलेशनशिप में महिला को निश्चित राशि का भरण-पोषण मिलेगा। राहत हमेशा मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।
आर्थिक सहायता तय करते समय किन बातों को देखा जा सकता है?
कोर्ट आर्थिक राहत तय करते समय कई बातों को देख सकता है।
- महिला की आय यदि महिला स्वयं कमाती है, तो उसकी आय और आर्थिक जरूरतों को देखा जा सकता है।
- पुरुष की आय पुरुष की नौकरी, व्यवसाय और अन्य आय के स्रोत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
- बच्चों की जिम्मेदारी यदि बच्चे हैं, तो उनकी शिक्षा, चिकित्सा, भोजन और अन्य खर्च भी महत्वपूर्ण होंगे।
- रिलेशनशिप की अवधि लंबे समय तक साथ रहने वाले रिलेशनशिप की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
- जीवन स्तर साथ रहते समय दोनों किस प्रकार का जीवन जी रहे थे, यह भी परिस्थितियों के अनुसार प्रासंगिक हो सकता है।
आर्थिक उत्पीड़न क्या है?
घरेलू हिंसा के मामलों में आर्थिक उत्पीड़न भी महत्वपूर्ण हो सकता है। उदाहरण के लिए—
- आवश्यक घरेलू खर्च के लिए पैसा न देना;
- महिला के पैसे पर अनुचित नियंत्रण करना;
- महिला के आवश्यक आर्थिक संसाधनों को रोकना;
- घर के जरूरी खर्चों से जानबूझकर इनकार करना;
- महिला को आर्थिक रूप से पूरी तरह निर्भर बनाने की कोशिश करना।
ऐसी स्थिति में महिला को अपने आर्थिक लेन-देन के प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए। बैंक विवरण, भुगतान की रसीदें, धन हस्तांतरण और अन्य आर्थिक दस्तावेज आगे कानूनी कार्यवाही में उपयोगी हो सकते हैं।
मानसिक या भावनात्मक उत्पीड़न होने पर क्या करें?
हर चोट दिखाई नहीं देती। लगातार अपमान, धमकी, डराना या नियंत्रित करना भी गंभीर समस्या हो सकती है। महिला को ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण बातचीत और धमकियों का प्रमाण सुरक्षित रखना चाहिए। जैसे—
- संदेश
- ई-मेल
- पत्र
- अन्य इलेक्ट्रॉनिक बातचीत
- चिकित्सकीय दस्तावेज, यदि आवश्यक हों।
यदि स्थिति गंभीर है, तो महिला को पहले अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए और उसके बाद उचित कानूनी सहायता लेनी चाहिए।
क्या लिव-इन पार्टनर के खिलाफ पुलिस शिकायत की जा सकती है?
हां, लेकिन केवल रिलेशनशिप टूटने के कारण आपराधिक मामला नहीं बनता। यदि पार्टनर—
- मारपीट करता है
- गंभीर धमकी देता है
- हमला करता है
- पीछा करता है
- जबरदस्ती करता है
- किसी अन्य वास्तविक आपराधिक कृत्य में शामिल होता है
तो परिस्थितियों के अनुसार पुलिस शिकायत की जा सकती है। महिला को शिकायत में केवल वास्तविक घटनाएं और उपलब्ध प्रमाणों पर आधारित आरोप ही रखने चाहिए।
यदि पार्टनर महिला को अचानक घर से निकाल दे तो क्या करें?
यदि महिला को अचानक घर से निकाल दिया जाता है, तो उसे सबसे पहले अपनी सुरक्षा और आवश्यक दस्तावेजों की चिंता करनी चाहिए। उसे—
- पहचान पत्र सुरक्षित रखने चाहिए
- आवश्यक व्यक्तिगत सामान लेना चाहिए
- साझा निवास का प्रमाण सुरक्षित करना चाहिए
- आर्थिक लेन-देन के प्रमाण रखने चाहिए
- हिंसा या धमकी हुई हो तो उसका प्रमाण सुरक्षित करना चाहिए।
यदि मामला घरेलू हिंसा से संबंधित है, तो महिला उपलब्ध निवास और अन्य राहतों के लिए कानूनी कार्यवाही पर विचार कर सकती है। गंभीर खतरे की स्थिति में पुलिस सहायता भी ली जा सकती है।
लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे के अधिकार
माता-पिता का विवाह हुआ है या नहीं, बच्चे की मूल जरूरतें समाप्त नहीं हो जातीं। बच्चे की शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, देखभाल, भरण-पोषण, सुरक्षित वातावरण से संबंधित आवश्यकताओं को कानून संरक्षण देता है।
यदि माता-पिता अलग हो जाते हैं, तो बच्चे के खर्च के लिए उचित आर्थिक सहायता का प्रश्न उठ सकता है। कोर्ट बच्चे के हित और कल्याण को प्राथमिकता देता है।
बच्चे की कस्टडी किसे मिल सकती है?
यह मानना सही नहीं है कि बच्चा हमेशा मां को ही मिलेगा। कोर्ट मुख्य रूप से बच्चे के कल्याण (Best Interest of Child) को देखता है। इसके लिए बच्चे की उम्र, स्वास्थ्य, शिक्षा, वर्तमान देखभाल, दोनों माता-पिता की आर्थिक स्थिति, भावनात्मक जरूरत, सुरक्षित वातावरण जैसी परिस्थितियों पर विचार किया जा सकता है। परिस्थितियों के अनुसार दूसरे माता-पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया जा सकता है।
क्या लिव-इन रिलेशनशिप में महिला को पुरुष की प्रॉपर्टी में हिस्सा मिल सकता है?
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने मात्र से महिला को पुरुष की प्रॉपर्टी में अपने-आप हिस्सा नहीं मिल जाता। अगर घर या जमीन केवल पुरुष के नाम है, तो सिर्फ उसके साथ रहने के कारण महिला उस प्रॉपर्टी की मालिक नहीं बन जाती। इसलिए यह मानना सही नहीं है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को पार्टनर की प्रॉपर्टी का आधा हिस्सा जरूर मिलेगा।
लेकिन अगर महिला ने उस प्रॉपर्टी को खरीदने में अपने पैसे लगाए हैं, घर की किस्त भरी है या प्रॉपर्टी खरीदने के लिए कोई बड़ी रकम दी है, तो मामला अलग हो सकता है। ऐसे मामले में महिला के आर्थिक योगदान को देखा जा सकता है और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उसके लिए उचित कानूनी उपाय तलाशे जा सकते हैं।
इसलिए महिला को अपने बैंक भुगतान, किस्तों की रसीद, पैसे भेजने के प्रमाण, प्रॉपर्टी से जुड़े कागजात और अन्य जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। भविष्य में विवाद होने पर ये दस्तावेज यह साबित करने में मदद कर सकते हैं कि महिला ने प्रॉपर्टी में कितना आर्थिक योगदान दिया था।
क्या महिला पार्टनर की प्रॉपर्टी में हिस्सा मांग सकती है?
यह पूरी तरह मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। कोर्ट के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकते हैं—
- प्रॉपर्टी किसके नाम है?
- खरीद के समय पैसा किसने दिया?
- महिला का योगदान कितना था?
- क्या कोई लिखित समझौता था?
- लोन की किस्त किसने चुकाई?
इसलिए केवल यह कहना कि “मैं उसकी पार्टनर थी, इसलिए प्रॉपर्टी में मेरा हिस्सा है” पर्याप्त नहीं है।
संयुक्त बैंक खाता और आर्थिक लेन-देन
लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान दोनों लोग संयुक्त खाता या साझा आर्थिक व्यवस्था रख सकते हैं। रिलेशनशिप समाप्त होने पर यही लेन-देन विवाद का कारण बन सकते हैं। इसलिए महिला को अपने—
- बैंक विवरण
- धन हस्तांतरण
- लोन भुगतान
- किराये के भुगतान
- घरेलू खर्च
- बड़ी खरीदारी
के प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए। यदि महिला ने पार्टनर की प्रॉपर्टी या लोन में महत्वपूर्ण रकम लगाई है, तो उसका प्रमाण आगे बहुत उपयोगी हो सकता है।
यदि पुरुष पहले से शादीशुदा है तो महिला के अधिकार क्या होंगे?
यदि पुरुष पहले से विवाहित है और उसका पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है, तो उसके साथ दूसरे महिला का लिव-इन रिलेशनशिप एक अलग कानूनी स्थिति हो सकता है। इसे स्वतः दूसरी शादी नहीं माना जा सकता। ऐसे मामले में यह देखा जा सकता है—
- पुरुष की पहली शादी की स्थिति
- महिला को पहली शादी की जानकारी थी या नहीं
- रिलेशनशिप कितने समय से चल रहा था
- दोनों किस प्रकार साथ रहते थे
- क्या घरेलू जीवन पति-पत्नी जैसा था।
इसलिए पहले से विवाहित व्यक्ति के साथ रिलेशनशिप के मामलों में विशेष कानूनी जांच आवश्यक होती है।
यदि पुरुष ने अपनी पहली शादी छिपाई हो
यदि पुरुष ने जानबूझकर अपनी पहली शादी छिपाकर महिला को रिलेशनशिप में आने के लिए प्रेरित किया, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। महिला को ऐसे मामले में पहली शादी का प्रमाण, विवाह प्रमाणपत्र, बातचीत, झूठे दावे, अन्य संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।
किसी विशेष आपराधिक अपराध के लिए जिम्मेदारी बनेगी या नहीं, यह पुरुष की मंशा, वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध प्रमाण पर निर्भर करेगा।
यदि पार्टनर शादी का वादा करके बाद में मुकर जाए
हर शादी का वादा पूरा न होने पर आपराधिक मामला नहीं बनता। इसमें यह देखना महत्वपूर्ण हो सकता है कि रिलेशनशिप शुरू करते समय पुरुष की वास्तविक मंशा क्या थी। यदि शुरू से ही धोखा देने के उद्देश्य से झूठा वादा किया गया था, तो मामला अलग हो सकता है।
इसलिए महिला को मैसेज, बातचीत, शादी के वादे, परिस्थितियां, रिलेशनशिप की शुरुआत से संबंधित प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए।
क्या महिला कानूनी नोटिस भेज सकती है?
हां। परिस्थितियों के अनुसार कानूनी नोटिस उपयोगी हो सकता है। इसके माध्यम से महिला—
- अपना सामान वापस मांग सकती है;
- बकाया रकम की मांग कर सकती है;
- आर्थिक सहायता की मांग रख सकती है;
- उत्पीड़न रोकने की मांग कर सकती है;
- किसी विवाद के समाधान का प्रस्ताव दे सकती है।
- नोटिस में केवल वास्तविक और प्रमाणित दावे रखने चाहिए।
सबूत कैसे सुरक्षित करें?
कानूनी विवाद में सबूत बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। महिला को महत्वपूर्ण संदेश मिटाने से बचना चाहिए। केवल तस्वीरें रखने के बजाय संभव हो तो मूल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखना चाहिए। उसे—
- बैंक विवरण डाउनलोड करके रखना चाहिए
- जरूरी दस्तावेजों की प्रतियां बनानी चाहिए
- महत्वपूर्ण संदेश सुरक्षित रखने चाहिए
- आवश्यक तस्वीरों और दस्तावेजों का अलग संग्रह रखना चाहिए
झूठे या बनाए हुए सबूत कभी नहीं बनाने चाहिए।
मेडिएशन और समझौते का विकल्प
हर विवाद को तुरंत मुकदमे में बदलना जरूरी नहीं है। यदि दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार हैं, तो मेडिएशन के माध्यम से आर्थिक भुगतान, व्यक्तिगत सामान, निवास, बच्चों की देखभाल, बच्चों का खर्च, मिलने का अधिकार जैसे मुद्दों पर समाधान खोजा जा सकता है। किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले उसका कानूनी प्रभाव समझना जरूरी है।
यदि पार्टनर धमकी दे या परेशान करे तो क्या करें?
धमकी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। महिला को—
1. धमकी वाले संदेश सुरक्षित रखने चाहिए;
2. आवश्यक प्रमाण सुरक्षित रखने चाहिए;
3. भरोसेमंद व्यक्ति को जानकारी देनी चाहिए;
4. गंभीर स्थिति में पुलिस सहायता लेनी चाहिए;
5. आवश्यकता होने पर कोर्ट से उचित संरक्षण मांगना चाहिए।
गंभीर खतरे की स्थिति में अकेले पार्टनर का सामना करने से बचना चाहिए।
क्या महिला लिव-इन पार्टनर के खिलाफ सिविल केस फाइल कर सकती है?
हां, कुछ परिस्थितियों में महिला अपने लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दीवानी मुकदमा कर सकती है। लेकिन केवल साथ रहने के आधार पर कोई मुकदमा अपने-आप नहीं बनता। सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि महिला का विवाद किस चीज को लेकर है—पैसे, प्रॉपर्टी, निजी सामान, रहने का अधिकार या किसी लिखित समझौते को लेकर।
किन मामलों में महिला कानूनी दावा कर सकती है?
| स्थिति | महिला के लिए संभावित उपाय |
| महिला ने पार्टनर की प्रॉपर्टी में पैसा लगाया | आर्थिक योगदान के आधार पर दावा |
| महिला ने प्रॉपर्टी की किस्तें भरीं | भुगतान के प्रमाण के आधार पर दावा |
| पार्टनर ने महिला के पैसे वापस नहीं किए | धन की वसूली का दावा |
| महिला का सामान पार्टनर के पास है | सामान वापस लेने की कानूनी मांग |
| प्रॉपर्टी बेचने या नुकसान पहुंचाने का डर है | न्यायालय से रोक लगाने का आदेश |
| दोनों के बीच लिखित समझौता है | समझौते के आधार पर कानूनी दावा |
महिला को किन गलतियों से बचना चाहिए?
महिला को—
- केवल मौखिक वादों पर भरोसा नहीं करना चाहिए;
- महत्वपूर्ण संदेश नहीं मिटाने चाहिए;
- आर्थिक योगदान का रिकॉर्ड रखना चाहिए;
- बिना पढ़े समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए;
- निजी विवाद सामाजिक माध्यमों पर सार्वजनिक नहीं करना चाहिए;
- पार्टनर की वैवाहिक स्थिति की जांच करनी चाहिए;
- बिना प्रमाण गंभीर आरोप नहीं लगाने चाहिए;
- समय पर कानूनी सहायता लेनी चाहिए।
निष्कर्ष
लिव-इन रिलेशनशिप को हर स्थिति में शादी के बराबर नहीं माना जाता। केवल लंबे समय तक साथ रहने से महिला को पत्नी का दर्जा या साथी की प्रॉपर्टी में अपने-आप हिस्सा नहीं मिलता। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि महिला के पास कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है। कुछ परिस्थितियों में वह घरेलू हिंसा से सुरक्षा, रहने का अधिकार, आर्थिक सहायता और बच्चों से जुड़े अधिकारों के लिए कानूनी मदद ले सकती है।
किसी विवाद की स्थिति में महिला को अपने रिलेशनशिप की प्रकृति, साथी की वैवाहिक स्थिति, साथ रहने के प्रमाण, आर्थिक योगदान और जरूरी दस्तावेजों को सुरक्षित रखना चाहिए। समय पर सही कानूनी सलाह लेने से महिला अपने लिए उपलब्ध उचित कानूनी उपाय को समझ सकती है और अपने अधिकारों की बेहतर तरीके से रक्षा कर सकती है।
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FAQs
1. क्या भारत में लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी है?
हां, दो बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा और सहमति से साथ रह सकते हैं। लेकिन हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के बराबर कानूनी दर्जा नहीं मिलता।
2. क्या लिव-इन रिलेशनशिप में महिला भरण-पोषण मांग सकती है?
कुछ परिस्थितियों में महिला भरण-पोषण या आर्थिक सहायता मांग सकती है। यह रिलेशनशिप की प्रकृति, अवधि और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।
3. क्या घरेलू हिंसा कानून लिव-इन रिलेशनशिप में महिला की मदद कर सकता है?
हां, यदि रिलेशनशिप कानून के अनुसार शादी जैसी प्रकृति का माना जाता है, तो महिला घरेलू हिंसा से सुरक्षा, रहने की जगह और आर्थिक सहायता जैसी राहत मांग सकती है।
4. क्या महिला को लिव-इन साथी की प्रॉपर्टी में हिस्सा मिलता है?
सिर्फ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने से महिला को साथी की प्रॉपर्टी में अपने-आप हिस्सा नहीं मिलता। लेकिन यदि उसने प्रॉपर्टी खरीदने में आर्थिक योगदान दिया है, तो उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कानूनी दावा किया जा सकता है।
5. लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने के बाद महिला क्या कर सकती है?
महिला अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद अपने सामान, रहने की जगह, आर्थिक योगदान और बच्चों से जुड़े अधिकारों की जांच कर सकती है। जरूरत के अनुसार कानूनी नोटिस, घरेलू हिंसा की कार्यवाही, धन या प्रॉपर्टी की वसूली और अन्य कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं।



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